मायका कभी पराया नहीं होता
"जिस बहू से कहा गया था— 'अब तुम्हारा मायका सिर्फ मेहमान बनकर जाने की जगह है'... उसी बहू के एक फैसले ने पूरे परिवार को समझा दिया कि बेटी शादी के बाद अपने रिश्ते नहीं छोड़ती, सिर्फ जिम्मेदारियाँ बाँटती है।"
रीमा की शादी को डेढ़ साल हो चुका था। वह अपने ससुराल में सभी का सम्मान करती थी। घर में सास सुशीला जी, ससुर रामप्रसाद जी, पति अमित और देवर मोहित रहते थे।
रीमा पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। उसने हमेशा यही कोशिश की कि किसी को उससे शिकायत न हो। सुबह से रात तक वह पूरे मन से घर के काम करती, सबका ध्यान रखती और हर रिश्ते को निभाने की कोशिश करती।
लेकिन एक बात उसके मन को हमेशा चुभती थी।
शादी के बाद जब भी वह अपनी माँ से मिलने मायके जाने की बात करती, सुशीला जी मुस्कुराते हुए कह देतीं, "बहू, अब वही सब छोड़ दो। शादी के बाद लड़की का असली घर ससुराल होता है। मायके बार-बार जाना अच्छा नहीं लगता।"
रीमा हर बार चुप हो जाती।
वह अपनी माँ से फोन पर हँसकर बातें करती, लेकिन कभी अपने मन का दर्द नहीं बताती।
उधर उसकी माँ भी समझ जाती थीं कि बेटी सब कुछ छिपा रही है, फिर भी कहतीं, "बेटा, खुश रहना। हमारी चिंता मत करना।"
एक दिन रीमा की छोटी बहन का फोन आया।
"दीदी... पापा की तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर ने कुछ दिन आराम करने को कहा है। अगर हो सके तो एक बार आ जाओ।"
रीमा की आँखें भर आईं।
उसने हिम्मत करके सास से कहा, "मम्मी जी, मैं एक दिन के लिए पापा से मिल आऊँ?"
सुशीला जी ने बिना उसकी ओर देखे कहा, "इतनी-सी बात पर मायके जाने की आदत मत डालो। तुम्हारी बहन है न, वह देख लेगी।"
रीमा ने धीरे से "जी" कहा और अपने कमरे में चली गई।
उस रात वह बहुत रोई।
अमित सब देख रहा था, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
समय बीतता गया।
कुछ महीनों बाद घर में खुशखबरी आई।
रीमा माँ बनने वाली थी।
पूरा परिवार खुश था।
सुशीला जी उसकी पसंद का खाना बनवातीं, दवाइयों का ध्यान रखतीं और बार-बार आराम करने को कहतीं।
सातवाँ महीना शुरू हुआ तो एक दिन उन्होंने बड़े प्यार से कहा,
"बहू, अपने पापा को फोन कर दो। अगले हफ्ते आकर तुम्हें ले जाएँ। पहली डिलीवरी मायके में ही होती है।"
रीमा ने शांत होकर उनकी तरफ देखा।
फिर बोली,
"मम्मी जी, एक बात पूछूँ?"
"हाँ, पूछो।"
"जब मैं अपने बीमार पापा से मिलने जाना चाहती थी, तब आपने कहा था कि मायका पराया हो गया है। आज अचानक वही घर अपना कैसे हो गया?"
पूरा कमरा शांत हो गया।
सुशीला जी के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
उसी समय रीमा का फोन बजा।
माँ का फोन था।
रीमा ने जैसे ही फोन उठाया, उधर से आवाज़ आई,
"बेटा, अगर तुम्हें आने में कोई परेशानी हो तो मत आना। हमें तुम्हारी चिंता है, तुम्हें किसी मुश्किल में नहीं डालना चाहते।"
रीमा की आँखें भर आईं।
अमित पहली बार अपनी पत्नी का दर्द समझ रहा था।
उसने फोन रीमा के हाथ से लिया और बोला,
"माँ जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं कल खुद रीमा को लेकर आऊँगा।"
फोन रखते ही उसने अपनी माँ की तरफ देखा।
"माँ, क्या मैं कुछ कह सकता हूँ?"
सुशीला जी चुप रहीं।
अमित बोला,
"अगर बेटी का मायका पराया हो जाता है, तो डिलीवरी के समय वही अपना क्यों हो जाता है?"
"माँ, जब बेटी अपने माता-पिता से मिलने जाना चाहे, तब मायका पराया कहलाता है... लेकिन जब उसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी निभाने की बात आती है, तब वही मायका अपना कैसे हो जाता है? आखिर यह कैसा नियम है?"
"रिश्ते सुविधा देखकर नहीं बदलते।"
सुशीला जी की आँखें झुक गईं।
उन्हें पहली बार अपनी गलती का एहसास हुआ।
दो दिन बाद रीमा के माता-पिता घर आए।
वे बहुत संकोच में थे।
रीमा की माँ बोलीं,
"बेटी, अगर तुम्हारा मन हो तो चलना। नहीं तो हम तुम्हें मजबूर नहीं करेंगे।"
रीमा कुछ कह पाती, उससे पहले सुशीला जी आगे बढ़ीं।
उन्होंने रीमा की माँ का हाथ पकड़ लिया।
"समधन जी, गलती मेरी थी। मैंने बेटी का दर्द देर से समझा।"
फिर रीमा की तरफ देखकर बोलीं,
"बेटी, आज से तुम्हें मायके जाने के लिए किसी की इजाजत नहीं लेनी पड़ेगी। वह घर भी तुम्हारा है और यह घर भी तुम्हारा है।"
रीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने अपनी सास को गले लगा लिया।
घर का माहौल भावुक हो गया।
रीमा कुछ दिन मायके रही।
वहाँ उसके माता-पिता ने पूरे प्यार से उसकी देखभाल की।
कुछ समय बाद अमित उसे वापस अपने घर ले आया।
दोनों परिवार बराबर मिलते रहे।
कुछ महीनों बाद रीमा ने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया।
जब सुशीला जी ने अपने पोते को गोद में लिया, तो उन्होंने पूरे परिवार के सामने कहा,
"आज मैं एक वचन देती हूँ। मैं कभी किसी बेटी से यह नहीं कहूँगी कि शादी के बाद उसका मायका पराया हो जाता है। बेटी के दो घर हो सकते हैं, लेकिन उसका कोई भी घर पराया नहीं होता।"
रीमा के पिता की आँखों में खुशी के आँसू थे।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"रिश्ते वहीं मजबूत होते हैं, जहाँ सम्मान और अपनापन दोनों साथ रहते हैं।"
पूरा कमरा मुस्कुराहटों से भर गया।
सीख: बेटी शादी के बाद अपने माता-पिता से रिश्ता नहीं तोड़ती। उसका मायका हमेशा उसका अपना रहता है। ससुराल भी तभी अपना बनता है, जब वहाँ उसे सम्मान, प्यार और बराबरी का अधिकार मिले।

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