जब मन फैसला कर लेता है, तब सच भी छोटा लगने लगता है
"अगर मेरी हर बात पर शक ही करना है... तो आज के बाद मैं सफाई नहीं दूँगा। लेकिन जिस दिन सच सामने आएगा, उस दिन शायद आपका भरोसा वापस न लौटे।"
रोहित की आवाज़ बिल्कुल शांत थी। उसने न गुस्सा किया, न ऊँची आवाज़ में बोला। लेकिन उसके शब्द इतने भारी थे कि बैठक में बैठे सभी लोग एकदम चुप हो गए।
सामने सोफे पर बैठी उसकी पत्नी कविता की आँखें लाल थीं। वह रातभर सो नहीं पाई थी। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन उससे भी ज्यादा बेचैनी थी।
उसकी सास सरोज देवी ने गुस्से में कहा,
"अब सीधा हमें ही गलत साबित कर दो। सारी गलती हमारी ही है, है ना?"
रोहित ने माँ की तरफ देखा, फिर धीरे से बोला,
"माँ, मैं किसी को गलत साबित नहीं कर रहा। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि बिना सच जाने किसी पर शक करना सबसे बड़ा अन्याय होता है।"
कविता अचानक बोल पड़ी।
"तो क्या मैं झूठ बोल रही हूँ?"
"मैंने ऐसा कब कहा?" रोहित ने शांत स्वर में पूछा।
कविता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"कहने की जरूरत नहीं है। तुम्हारा हर जवाब यही बता रहा है।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
कोने में बैठे रोहित के पिता गोपाल जी सब कुछ सुन रहे थे। उनकी उम्र साठ साल से ऊपर थी। उन्होंने अपने जीवन में कई झगड़े देखे थे, लेकिन आज उन्हें पहली बार अपने ही घर की नींव हिलती हुई महसूस हो रही थी।
उन्होंने धीरे से कहा,
"पहले कोई मुझे पूरी बात बताएगा भी, या सब अपने-अपने फैसले सुनाते रहेंगे?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
कुछ देर बाद कविता ने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया।
"तीन महीने पहले तक मुझे लगता था कि मैं दुनिया की सबसे खुश लड़की हूँ। मुझे अच्छा पति मिला, अच्छा परिवार मिला। मैं सोचती थी कि भगवान ने मुझे सब कुछ दे दिया।"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि इस घर में कुछ बातें मुझसे छुपाई जाती हैं।"
रोहित ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।
"कौन-सी बातें?"
कविता ने धीरे से सिर झुकाते हुए कहा, "यही तो मुझे नहीं पता।"
सरोज देवी बीच में बोलीं,
"जब पता ही नहीं, तो फिर शक किस बात का?"
कविता चुप हो गई।
गोपाल जी ने इशारे से सरोज देवी को शांत रहने को कहा।
"उसे बोलने दो।"
कविता ने गहरी साँस ली।
"शुरू में मैंने खुद को समझाया कि शायद मैं ही ज्यादा सोच रही हूँ। लेकिन फिर छोटी-छोटी बातें होने लगीं।"
"जैसे?" रोहित ने पूछा।
कविता ने रोहित की ओर देखते हुए कहा,
"जब भी मैं कमरे में आती, कई बार आप और माँ जी बात बदल देते थे। मुझे लगता था कि मेरी मौजूदगी में आप लोग कुछ छिपा रहे हैं।"
रोहित हल्का-सा मुस्कुराया।
"क्योंकि कई बार हम तुम्हारे जन्मदिन की तैयारी कर रहे थे... और तुम्हें सरप्राइज देना चाहते थे।"
कविता कुछ पल के लिए चुप रह गई।
उसे वह दिन याद आ गया।
सचमुच उसका जन्मदिन बहुत अच्छे से मनाया गया था।
लेकिन उसके मन में जो शक बैठ चुका था, उसने उस याद को भी धुंधला कर दिया था।
उसने फिर कहा,
"एक-दो बार ऐसा हुआ होगा। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था।"
रोहित ने कोई जवाब नहीं दिया।
गोपाल जी सब समझ रहे थे।
उन्हें लग रहा था कि असली समस्या किसी घटना में नहीं, बल्कि सोच में है।
उन्होंने पूछा,
"बहू, पहली बार तुम्हारे मन में ऐसा विचार कब आया?"
कविता ने धीरे-धीरे कहा,
"शायद... उस दिन।"
रोहित ने उत्सुक होकर पूछा, "कौन-सा दिन?"
कविता ने गहरी साँस ली और बोली, "जब मेरी मम्मी का फोन आया था।"
कमरे में बैठे सभी लोग उसकी ओर देखने लगे।
उसे वह दिन साफ-साफ याद था।
शादी को मुश्किल से डेढ़ महीना हुआ था।
वह रसोई में चाय बना रही थी।
तभी उसकी माँ सविता का फोन आया।
"कैसी है मेरी बेटी?"
कविता मुस्कुराकर बोली, "बहुत अच्छी हूँ, मम्मी।"
सविता कुछ पल चुप रहीं। फिर गंभीर स्वर में बोलीं, "सच बता, बेटी। दिल से बता, तू सच में खुश है?"
कविता हल्के से हँस पड़ी।
"सच में अच्छी हूँ।"
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर सविता ने धीरे से कहा,
"देख बेटी... मैं तुझे डराना नहीं चाहती। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना।"
"क्या?" कविता ने मुस्कुराते हुए पूछा।
सविता ने कुछ पल चुप रहकर कहा,
"बेटी, ससुराल में किसी पर आँख बंद करके भरोसा मत करना।"
कविता हँस पड़ी।
"मम्मी, आप भी ना..."
लेकिन सविता गंभीर थीं।
"मैं मजाक नहीं कर रही। दुनिया बहुत बदल गई है। लोग सामने कुछ और होते हैं, पीछे कुछ और।"
कविता ने बात टाल दी।
लेकिन माँ के शब्द उसके मन में कहीं बैठ गए।
कुछ दिनों बाद एक शाम उसने देखा कि रोहित और उसके पिताजी कमरे में धीरे-धीरे बात कर रहे हैं।
जैसे ही वह अंदर गई, दोनों चुप हो गए।
बस वही एक पल...
और उसके मन में माँ की बात फिर गूँज उठी—
"लोग सामने कुछ और होते हैं, पीछे कुछ और।"
उसने खुद को समझाया।
"नहीं... मैं बेवजह सोच रही हूँ।"
लेकिन मन आसानी से कहाँ मानता है।
अगले दिन उसने अपनी माँ को यह बात बता दी।
सविता ने बिना एक पल रुके कहा,
"देखा... मैंने पहले ही कहा था।"
"लेकिन मम्मी, हो सकता है कोई जरूरी बात हो।"
सविता ने गंभीर आवाज़ में कहा,
"जरूरी बात अगर परिवार की है, तो बहू से क्यों छुपाई?"
कविता चुप हो गई।
उस दिन पहली बार उसके मन में यह सवाल पैदा हुआ—
"आखिर मुझसे क्या छुपाया जा रहा है?"
यही सवाल धीरे-धीरे उसकी आदत बन गया।
अब वह हर छोटी बात पर ध्यान देने लगी।
कौन किससे क्या कह रहा है...
कौन किसे देखकर चुप हो गया...
किसके फोन पर कौन मुस्कुराया...
हर बात उसे किसी छिपे हुए राज का हिस्सा लगने लगी।
उधर रोहित बिल्कुल अनजान था।
उसे लगता था कि उसकी पत्नी घर में अच्छी तरह घुल-मिल रही है।
उसे पता ही नहीं था कि उसके मन में धीरे-धीरे अविश्वास की एक दीवार खड़ी हो रही है।
एक दिन दोपहर में रोहित ऑफिस चला गया था।
गोपाल जी बैंक गए हुए थे।
घर में सिर्फ सरोज देवी और कविता थीं।
तभी दरवाजे पर एक कुरियर आया।
सरोज देवी ने जल्दी से लिफाफा लिया और अपने कमरे में रख दिया।
कविता ने बस इतना ही देखा।
लेकिन उसके मन ने कहानी बना ली।
"जरूर कोई ऐसी बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है।"
शाम को उसने माँ को फोन किया।
सविता ने फिर वही कहा,
"बेटी... अब भी नहीं समझेगी तो बहुत देर हो जाएगी। धीरे-धीरे सब पता कर।"
कविता पूरी रात सो नहीं सकी।
उसे नहीं मालूम था कि उस लिफाफे में क्या था।
लेकिन उसके मन ने पहले ही फैसला सुना दिया था।
"कुछ न कुछ गलत जरूर है।"
उसे यह नहीं पता था कि उस लिफाफे में उसकी ही पढ़ाई से जुड़ा एक फॉर्म था।
रोहित और उसके ससुर चाहते थे कि वह आगे पढ़े।
वे उसे सरप्राइज देना चाहते थे।
लेकिन सरप्राइज बनने से पहले ही...
शक ने अपने कदम घर के अंदर जमा लिए थे।
अगली सुबह घर में सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था।
सरोज देवी रसोई में नाश्ता बना रही थीं। गोपाल जी अख़बार पढ़ रहे थे। रोहित ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था।
लेकिन कविता के भीतर कुछ भी सामान्य नहीं था।
रातभर वह उसी लिफाफे के बारे में सोचती रही।
"अगर उसमें मेरे लिए कुछ अच्छा था... तो मुझसे छिपाया क्यों गया?"
और अगर अच्छा नहीं था...
तो फिर क्या था?
उसका मन बार-बार यही सवाल पूछ रहा था।
रोहित ने मुस्कुराकर कहा,
"कविता, आज शाम जल्दी तैयार रहना।"
कविता ने चौंककर पूछा,
"क्यों?"
रोहित ने कहा...
"अभी नहीं बताऊँगा।"
वह मुस्कुराया और ऑफिस चला गया।
लेकिन कविता के चेहरे पर मुस्कान नहीं आई।
उसने मन ही मन सोचा—
"फिर कोई बात छिपा रहे हैं।"
दोपहर में उसकी माँ सविता का फोन आया।
"क्या हुआ बेटी? कुछ पता चला?"
कविता ने धीमी आवाज़ में कहा,
"नहीं मम्मी... लेकिन लगता है कुछ बड़ा है।"
"देख, अब चुप मत रहना। जितनी जल्दी सच पता चलेगा, उतना अच्छा रहेगा।"
कविता ने हिचकिचाते हुए पूछा, "लेकिन अगर मैं गलत निकली तो?"
सविता ने तुरंत कहा,
"माँ कभी अपनी बेटी को गलत रास्ता नहीं दिखाती।"
कविता ने फोन रख दिया।
लेकिन उसके मन का डर अब और गहरा हो चुका था।
उधर ऑफिस में भी रोहित का मन काम में नहीं लग रहा था।
उसे पिछले कुछ दिनों से महसूस हो रहा था कि कविता पहले जैसी नहीं रही।
पहले वह हर छोटी बात पर हँस देती थी।
अब हर बात पर सवाल पूछती थी।
पहले उसके चेहरे पर अपनापन था।
अब हर समय बेचैनी दिखाई देती थी।
उसने सोचा—
"शायद नए घर में ढलने में समय लग रहा है। कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाएगा।"
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि समस्या उससे कहीं बड़ी हो चुकी है।
शाम को रोहित घर लौटा।
उसने खुशी से कहा,
"चलो कविता, जल्दी तैयार हो जाओ।"
कविता ने हैरानी से पूछा, "कहाँ जाना है?"
रोहित ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, "बस... पाँच मिनट और इंतज़ार।"
कुछ देर बाद उसने गाड़ी निकाली।
गोपाल जी और सरोज देवी भी साथ बैठ गए।
कविता पूरे रास्ते सोचती रही—
"आखिर ये लोग मुझे कहाँ ले जा रहे हैं?"
करीब बीस मिनट बाद गाड़ी एक कॉलेज के सामने रुकी।
कविता हैरान रह गई।
"यहाँ क्यों आए हैं?"
रोहित मुस्कुराया।
"क्योंकि तुम्हारा सपना अधूरा नहीं रहेगा।"
कविता कुछ समझ नहीं पाई।
गोपाल जी ने बैग से वही लिफाफा निकाला जिसे देखकर कविता कई दिनों से परेशान थी।
उन्होंने लिफाफा उसके हाथ में रखते हुए कहा,
"खोलो बेटा।"
कविता के हाथ काँप रहे थे।
उसने धीरे-धीरे लिफाफा खोला।
अंदर कॉलेज का एडमिशन फॉर्म था।
उस पर उसका नाम लिखा था।
साथ में फीस की रसीद भी थी।
वह कुछ पल तक कागज़ों को देखती रही।
उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
रोहित मुस्कुराकर बोला,
"तुमने शादी से पहले कहा था ना कि पढ़ाई पूरी करना चाहती हो।"
"मुझे याद था।"
"इसलिए हमने सोचा कि तुम्हें सरप्राइज देंगे।"
सरोज देवी ने प्यार से कहा,
"बेटा, बहू सिर्फ घर संभालने के लिए नहीं आती। उसके सपने भी हमारे अपने होते हैं।"
कविता की आँखें भर आईं।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके मन पर रखा भारी पत्थर थोड़ा-सा हटा दिया हो।
लेकिन पूरी तरह नहीं।
क्योंकि शक एक बार दिल में जगह बना ले, तो इतनी आसानी से नहीं जाता।
घर लौटते समय सब खुश थे।
लेकिन कविता अंदर ही अंदर खुद से लड़ रही थी।
"मैंने गलत सोचा..."
"लेकिन... हर बार क्या मैं ही गलत सोच रही हूँ?"
दो दिन बाद एक नई घटना हुई।
रात के करीब साढ़े दस बजे रोहित के फोन पर किसी का कॉल आया।
उसने फोन देखा और तुरंत बालकनी में चला गया।
करीब दस मिनट तक वह धीरे-धीरे बात करता रहा।
कविता कमरे में बैठी सब देखती रही।
उसका मन फिर बेचैन होने लगा।
रोहित वापस आया।
उसने सामान्य स्वर में कहा,
"सो जाओ, सुबह जल्दी उठना है।"
कविता खुद को रोक नहीं पाई।
"किसका फोन था?"
रोहित ने बिना घबराए जवाब दिया, "ऑफिस का।"
कविता ने भौंहें सिकोड़ लीं। वह धीमे लेकिन संदेह भरे स्वर में बोली, "ऑफिस वाले रात में दस बजे फोन करते हैं?"
रोहित ने शांत रहने की कोशिश की। उसने कहा, "हाँ... कभी-कभी ज़रूरी काम होता है।"
बस...
यहीं से फिर उसके मन ने कहानी बनानी शुरू कर दी।
अगली सुबह उसने फिर अपनी माँ को फोन किया।
सविता ने सब सुनने के बाद कहा,
"बेटी... मुझे तो बात ठीक नहीं लग रही।"
कविता ने झिझकते हुए पूछा, "लेकिन वह झूठ क्यों बोलेगा, माँ?"
सविता ने बिना एक पल रुके कहा, "सच छिपाने के लिए, बेटी।"
कविता ने धीरे से कहा, "लेकिन अगर सच में ऑफिस का ही काम हो तो?"
सविता ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, "अगर सच में ऑफिस का काम होता, तो वह कमरे में ही बात करता। बाहर जाकर धीमी आवाज़ में क्यों बोलता?"
कविता फिर चुप हो गई।
उसने एक बार भी यह नहीं सोचा कि शायद रोहित उसे परेशान नहीं करना चाहता होगा।
अब उसके मन में केवल एक ही आवाज़ थी—
"कुछ न कुछ छिपाया जा रहा है।"
उधर रोहित बिल्कुल अलग चिंता में था।
जिस फोन को लेकर कविता परेशान थी...
वह दरअसल उसके दोस्त अमित का फोन था।
अमित की पत्नी अचानक अस्पताल में भर्ती हो गई थी।
उसे पैसों की ज़रूरत थी।
रोहित नहीं चाहता था कि रात में यह बात सुनकर कविता परेशान हो जाए।
इसलिए वह बाहर जाकर बात करने लगा।
उसने अगले दिन चुपचाप अपने दोस्त की मदद भी कर दी।
लेकिन उसने घर में किसी को कुछ नहीं बताया।
उसे लगा—
"नेकी करके बताना जरूरी नहीं होता।"
उसे कहाँ पता था...
कि उसकी यही चुप्पी किसी और कहानी का रूप ले रही है।
तीन दिन बाद कविता अलमारी साफ कर रही थी।
उसे रोहित की एक पुरानी फाइल मिली।
उसमें बैंक की कुछ रसीदें थीं।
एक रसीद पर पचास हजार रुपये का ऑनलाइन ट्रांसफर लिखा था।
नाम देखकर वह चौंक गई।
"अमित..."
उसने तुरंत सोचा—
"मुझसे छिपाकर इतने पैसे किसे दिए?"
अब उसके मन का शक पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गया।
उसने तय कर लिया—
"आज सच पूछकर रहूँगी।"
उसे बिल्कुल पता नहीं था...
कि कभी-कभी आधा सच देखने वाला इंसान...
पूरा रिश्ता खोने के बहुत करीब पहुँच जाता है।
उस दिन शाम को कविता पूरे समय बेचैन रही।
रसोई में काम करते हुए भी उसका ध्यान बार-बार उसी बैंक की रसीद पर जा रहा था।
पचास हजार रुपये...
इतनी बड़ी रकम।
और उसे इसकी कोई जानकारी नहीं।
उसने मन ही मन तय कर लिया था कि आज वह चुप नहीं रहेगी।
रात को सबने साथ बैठकर खाना खाया।
सरोज देवी रोज़ की तरह सबको खाना परोस रही थीं।
गोपाल जी अख़बार की कोई खबर सुना रहे थे।
रोहित हँसते हुए बीच-बीच में बात कर रहा था।
लेकिन कविता बिल्कुल शांत थी।
उसकी चुप्पी रोहित से छिपी नहीं रही।
उसने धीरे से पूछा,
"क्या हुआ? सुबह से बहुत चुप हो।"
कविता ने बस इतना कहा,
"बात करनी है।"
रोहित ने सिर हिला दिया।
"ठीक है, खाना खाने के बाद बात करते हैं।"
दोनों कमरे में पहुँचे।
दरवाज़ा बंद हुआ।
कुछ पल तक दोनों चुप रहे।
फिर कविता ने अलमारी से वह रसीद निकाली और रोहित के सामने रख दी।
"ये क्या है?"
रोहित ने एक नज़र रसीद पर डाली।
फिर शांत स्वर में बोला,
"मैं बताता हूँ।"
लेकिन कविता ने बीच में ही कहा,
"पहले ये बताओ कि मुझसे छिपाकर पैसे क्यों दिए?"
रोहित ने उसकी ओर देखा।
"छिपाकर नहीं दिए। बस बताने का मौका नहीं मिला।"
कविता ने तीखे स्वर में पूछा, "या बताना ज़रूरी नहीं समझा?"
रोहित ने गहरी साँस ली।
"ऐसी बात नहीं है।"
कविता की आवाज़ ऊँची हो गई।
"तो कैसी बात है? पहले रात को छिपकर फोन... फिर पचास हजार रुपये... आखिर चल क्या रहा है?"
रोहित कुछ पल तक उसे देखता रहा।
फिर धीरे से बोला,
"अगर मैं सब बता दूँ... तो क्या तुम यकीन करोगी?"
कविता तुरंत बोली,
"अगर बात सच होगी तो क्यों नहीं?"
रोहित हल्का-सा मुस्कुराया।
"समस्या यही है कविता... तुम्हें पहले ही तय हो चुका है कि मैं गलत हूँ। अब सच भी तुम्हें बहाना ही लगेगा।"
यह सुनते ही कविता का चेहरा तमतमा गया।
"मतलब अब गलती मेरी है?"
रोहित ने थके हुए स्वर में कहा,
"मैंने ऐसा नहीं कहा।"
कविता ने तुरंत गुस्से में कहा, "लेकिन मतलब यही है।"
बातों की आवाज़ बाहर तक पहुँच गई।
गोपाल जी और सरोज देवी कमरे के बाहर आ गए।
गोपाल जी ने दरवाज़ा खटखटाया।
"बेटा... सब ठीक है?"
रोहित ने दरवाज़ा खोल दिया।
कविता की आँखों में आँसू थे।
गोपाल जी ने धीरे से पूछा,
"क्या हुआ?"
कविता ने रसीद उनकी तरफ बढ़ा दी।
"पिताजी... क्या आपको पता था कि रोहित ने किसी अमित को पचास हजार रुपये दिए हैं?"
गोपाल जी ने रसीद देखी।
फिर बहुत सामान्य आवाज़ में बोले,
"हाँ, पता था।"
कविता जैसे रुक गई।
"आपको... पता था?"
गोपाल जी ने शांत भाव से सिर हिलाया।
"हाँ, बेटा। मुझे सब पता था।"
"तो मुझे क्यों नहीं बताया?" कविता ने दुख और शिकायत भरी आवाज़ में पूछा।
गोपाल जी ने कुर्सी खींची और बैठ गए।
उन्होंने बहुत शांत स्वर में कहा,
"क्योंकि वो किसी का भला कर रहा था, कोई अपराध नहीं।"
कविता कुछ समझ नहीं पाई।
गोपाल जी ने धीरे-धीरे पूरी बात बतानी शुरू की।
"अमित, रोहित का बचपन का दोस्त है।"
"उसकी पत्नी की अचानक तबीयत खराब हो गई थी।"
"ऑपरेशन के लिए तुरंत पैसे चाहिए थे।"
"रोहित ने बिना सोचे अपनी बचत उसे दे दी।"
कविता चुपचाप सुनती रही।
गोपाल जी आगे बोले,
"उसने मुझे इसलिए बताया क्योंकि बैंक से पैसे निकालने में मेरी मदद चाहिए थी।"
"लेकिन उसने साफ कहा था कि घर में किसी को मत बताइए।"
"क्यों?" कविता ने पूछा।
"क्योंकि उसे लगता था कि किसी की मदद करके उसका ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
कविता के हाथ धीरे-धीरे काँपने लगे।
उसे पहली बार लगा कि उसने बिना पूरी बात जाने कितना बड़ा निष्कर्ष निकाल लिया था।
लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी था।
"अगर ऐसा था... तो मुझसे छिपाया क्यों?"
रोहित ने पहली बार थोड़ा दृढ़ होकर कहा,
"क्योंकि हर बात उसी समय बताना ज़रूरी नहीं होता।"
"रिश्ते का मतलब हर मिनट की रिपोर्ट देना नहीं होता।"
"मुझे लगा था, दो-चार दिन बाद आराम से बता दूँगा।"
"लेकिन उससे पहले ही तुमने फैसला कर लिया कि मैं कुछ गलत कर रहा हूँ।"
कविता की आँखें झुक गईं।
सरोज देवी अब तक चुप थीं।
उन्होंने पहली बार बहुत प्यार से कहा,
"बहू... एक बात पूछूँ?"
कविता ने सिर हिलाया।
"अगर रोहित तुमसे बिना पूछे अपनी माँ की दवाई खरीद देता... तो क्या वह गलत होता?"
कविता ने तुरंत कहा, "नहीं।"
सरोज देवी ने फिर पूछा, "अगर वह किसी दोस्त की जान बचाने के लिए मदद कर दे... तो?"
कविता के पास जवाब नहीं था।
उसी समय गोपाल जी ने एक ऐसी बात कही जिसने पूरे कमरे को शांत कर दिया।
"बहू... मुझे लगता है कि तुम्हें रोहित पर नहीं... दुनिया पर भरोसा करने में डर लगता है।"
कविता ने उनकी ओर देखा।
गोपाल जी बोले,
"जिस इंसान के मन में हर समय डर रहता है... उसे हर अच्छा काम भी छिपी हुई चाल लगता है।"
ये शब्द सीधे कविता के दिल में उतर गए।
उसे अपनी माँ की बातें याद आने लगीं।
"किसी पर भरोसा मत करना..."
"हर बात समझकर चलना..."
"लोग सामने कुछ और होते हैं..."
धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा कि वह हर घटना को उसी नज़र से देखने लगी थी।
उस रात कविता बहुत देर तक सो नहीं सकी।
रोहित उसकी तरफ पीठ करके लेटा था।
पहली बार दोनों के बीच सिर्फ चुप्पी नहीं...
एक दूरी भी थी।
कविता ने धीरे से कहा,
"रोहित..."
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
कुछ देर बाद उसने फिर पुकारा,
"सो गए क्या?"
रोहित ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,
"नहीं।"
कविता ने धीमे स्वर में पूछा,
"मुझसे नाराज़ हो?"
रोहित ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
"नाराज़ नहीं..."
"बस... थक गया हूँ।"
ये चार शब्द कविता के दिल में तीर की तरह लगे।
उसे पहली बार महसूस हुआ—
शक सिर्फ सामने वाले को नहीं तोड़ता...
वह भरोसा करने वाले इंसान को भी धीरे-धीरे थका देता है।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
लेकिन इस बार वे आँसू डर के नहीं...
पछतावे के थे।
उस रात के बाद घर में किसी ने झगड़ा नहीं किया।
लेकिन शांति भी नहीं थी।
रोहित रोज़ की तरह ऑफिस जाता, समय पर लौटता, सबसे सामान्य तरीके से बात करता। वह कविता से भी नाराज़ नहीं होता, लेकिन पहले जैसी गर्मजोशी उसके व्यवहार में नहीं रही।
कविता यह बदलाव हर दिन महसूस कर रही थी।
उसे अब समझ आने लगा था कि ऊँची आवाज़ से ज़्यादा दर्द कभी-कभी शांत व्यवहार देता है।
एक सुबह उसने देखा कि रोहित बिना उसे जगाए ही चाय बनाकर पी चुका था।
पहले वह हमेशा उसे आवाज़ देता था।
"कविता... उठो, साथ में चाय पीते हैं।"
आज उसने नहीं पुकारा।
कविता बिस्तर पर बैठी रह गई।
उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—
"क्या मैंने सचमुच उसे इतना दुख दिया है?"
नाश्ते के बाद गोपाल जी उसके पास आए।
उन्होंने प्यार से पूछा,
"बेटा, आज मायके हो आओ।"
कविता ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
"अचानक?"
गोपाल जी मुस्कुराए।
"कभी-कभी जवाब घर से बाहर मिलते हैं।"
कविता कुछ समझी नहीं, लेकिन उसने जाने का फैसला कर लिया।
दोपहर तक वह अपने मायके पहुँच गई।
दरवाज़ा उसकी माँ सविता ने खोला।
"अरे, अचानक? सब ठीक तो है?"
कविता ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"हाँ मम्मी... बस आपसे मिलने का मन था।"
सविता ने उसे गले लगा लिया।
लेकिन माँ होने के नाते वह समझ गईं कि बेटी के मन में कुछ चल रहा है।
चाय पीते समय सविता ने पूछा,
"रोहित ने कुछ कहा क्या?"
कविता ने धीरे से सिर हिलाया।
"नहीं।"
"फिर?"
कविता ने सारी बात बता दी।
अमित की मदद...
बैंक की रसीद...
गोपाल जी की बातें...
और रोहित का वह एक वाक्य—
"मैं थक गया हूँ।"
सब कुछ।
सविता कुछ देर तक चुप बैठी रहीं।
पहली बार उन्होंने तुरंत कोई सलाह नहीं दी।
कविता ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"मम्मी... एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"आप हमेशा मुझे यही क्यों कहती थीं कि किसी पर भरोसा मत करना?"
सविता का चेहरा अचानक बदल गया।
जैसे किसी ने उनके पुराने घाव पर हाथ रख दिया हो।
उन्होंने नज़रें झुका लीं।
काफी देर तक कमरे में खामोशी रही।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोलीं,
"क्योंकि... मैंने भरोसा किया था।"
कविता चौंक गई।
"क्या मतलब?"
सविता की आँखें भर आईं।
"आज तक मैंने तुझे ये बात कभी नहीं बताई।"
"तेरे नानाजी के जाने के बाद घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरे बड़े भाई ने संभाली थी।"
"मैं उन पर आँख बंद करके भरोसा करती थी।"
"उन्होंने कहा कि कुछ कागज़ों पर दस्तखत कर दो।"
"मैंने बिना पढ़े कर दिए।"
"कुछ महीनों बाद पता चला कि मेरे हिस्से की ज़मीन मेरे नाम से हट चुकी है।"
कविता स्तब्ध रह गई।
उसे इस घटना के बारे में कभी पता ही नहीं था।
सविता आगे बोलीं,
"उस दिन मेरा भरोसा टूट गया।"
"मुझे लगा कि अपने भी धोखा दे सकते हैं।"
"उसके बाद मैंने हर रिश्ते को शक की नज़र से देखना शुरू कर दिया।"
"और वही डर..."
उन्होंने रुककर बेटी की आँखों में देखा।
"...मैंने तुझे भी दे दिया।"
कविता की आँखें भर आईं।
"मम्मी..."
सविता रो पड़ीं।
"मैं तुझे बचाना चाहती थी।"
"लेकिन शायद मैं भूल गई कि हर इंसान एक जैसा नहीं होता।"
"जिस गलती का दर्द मैंने झेला..."
"उसी डर की सज़ा मैंने तेरे रिश्तों को दे दी।"
कविता अब तक रो रही थी।
उसे पहली बार समझ आया कि उसकी माँ बुरी नहीं थीं।
वे बस अपने पुराने दर्द से बाहर नहीं निकल पाई थीं।
उनका डर...
धीरे-धीरे बेटी की सोच बन गया।
शाम को दोनों बरामदे में बैठी थीं।
सूरज ढल रहा था।
सविता ने धीमे से कहा,
"बेटी..."
"हाँ मम्मी?"
"अगर हो सके... तो रोहित से माफ़ी माँग लेना।"
कविता ने हैरानी से उनकी ओर देखा।
"आप ये कह रही हैं?"
सविता हल्का-सा मुस्कुराईं।
"हाँ।"
"क्योंकि अब समझ आ गया है..."
"हर रिश्ते को मेरे अतीत की सज़ा नहीं मिलनी चाहिए।"
कविता ने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"मम्मी... क्या आप मेरे साथ चलेंगी?"
सविता ने हैरानी से पूछा, "कहाँ?"
कुछ पल रुककर कविता फिर बोली,
"ससुराल।"
"मैं चाहती हूँ... जो बातें आपने आज मुझसे कही हैं..."
"वो रोहित और मम्मी जी भी सुनें।"
सविता कुछ पल सोचती रहीं।
फिर बोलीं,
"चलूँगी।"
"इस बार बेटी का घर बचाने के लिए..."
"डर नहीं..."
"सच लेकर चलूँगी।"
उसी समय उधर रोहित अपने घर की छत पर अकेला बैठा था।
गोपाल जी उसके पास आए।
उन्होंने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।
"क्या सोच रहे हो?"
रोहित ने फीकी मुस्कान दी।
"यही कि क्या भरोसा वापस आ सकता है?"
गोपाल जी ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,
"बेटा..."
"शीशा टूट जाए तो जुड़ सकता है।"
"लेकिन निशान रह जाते हैं।"
"रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।"
"अगर दोनों लोग सचमुच जोड़ना चाहें..."
"तो निशानों के साथ भी जीवन बिताया जा सकता है।"
रोहित चुप रहा।
उसने पहली बार मन ही मन सोचा—
"अगर कविता सच में बदलना चाहती है... तो क्या मैं उसे एक और मौका दे पाऊँगा?"
उस सवाल का जवाब अभी किसी के पास नहीं था।
लेकिन अगले दिन...
एक ऐसी मुलाक़ात होने वाली थी...
जो सिर्फ़ एक घर नहीं...
तीन लोगों की सोच बदलने वाली थी।
अगली सुबह घर का माहौल बिल्कुल अलग था।
कविता पूरी रात सो नहीं पाई थी।
बार-बार उसे रोहित का वह वाक्य याद आ रहा था—
"मैं थक गया हूँ।"
उसे अब समझ में आ रहा था कि इंसान सिर्फ काम से नहीं थकता।
बार-बार खुद को सही साबित करते-करते भी थक जाता है।
सुबह उसने माँ सविता की तरफ देखा।
"चलें?"
सविता ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
दोनों एक साथ रोहित के घर के लिए निकल पड़ीं।
पूरे रास्ते किसी ने एक शब्द नहीं बोला।
दोनों अपने-अपने विचारों में खोई हुई थीं।
उधर रोहित ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
सरोज देवी ने दरवाज़ा खोला।
सामने कविता और सविता खड़ी थीं।
सरोज देवी कुछ पल के लिए चुप रह गईं।
उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।
"आइए..."
दोनों अंदर आ गईं।
घर में अजीब-सी खामोशी फैल गई।
गोपाल जी भी बाहर आ गए।
रोहित कमरे से निकलकर बैठक में आया।
उसने कविता को देखा।
फिर सविता को।
लेकिन कुछ नहीं बोला।
काफी देर तक कोई किसी से कुछ नहीं कह पाया।
आख़िर सविता ने ही चुप्पी तोड़ी।
"मुझे... आप सबसे कुछ कहना है।"
सभी उनकी ओर देखने लगे।
सविता की आवाज़ काँप रही थी।
"आज मैं अपनी बेटी की नहीं... अपनी गलती की बात करने आई हूँ।"
कविता की आँखें भर आईं।
सविता ने धीरे-धीरे अपनी पूरी कहानी सुनाई।
अपने भाई का विश्वासघात...
अपनी टूटी हुई उम्मीदें...
और फिर हर रिश्ते से डरने की आदत।
सब कुछ।
कमरे में बैठे हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।
फिर उन्होंने रोहित की तरफ देखा।
"बेटा..."
"मैंने तुम्हें जाने बिना ही गलत समझ लिया।"
"मैंने अपनी बेटी को हमेशा यही सिखाया कि दुनिया पर भरोसा मत करना।"
"लेकिन मैं यह भूल गई कि हर इंसान एक जैसा नहीं होता।"
"अगर मेरी बातों की वजह से तुम्हारे रिश्ते में ज़हर घुला है..."
"तो सबसे बड़ी दोषी मैं हूँ।"
इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई।
रोहित कुछ पल तक शांत खड़ा रहा।
फिर उसने धीरे से कहा,
"माँ जी..."
"गलती आपकी भी थी..."
"लेकिन सिर्फ आपकी नहीं।"
सबने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
वह आगे बोला—
"मेरी भी गलती थी।"
कविता ने आश्चर्य से पूछा,
"तुम्हारी?"
रोहित ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"मैं हमेशा सोचता रहा कि समय आने पर सब बता दूँगा।"
"मैंने कभी यह नहीं समझा कि मेरी चुप्पी तुम्हारे मन में सवाल पैदा कर रही है।"
"अगर मैं पहले ही खुलकर बातें करता..."
"तो शायद बात यहाँ तक नहीं पहुँचती।"
गोपाल जी मुस्कुरा दिए।
"यही तो रिश्ता होता है बेटा।"
"एक की गलती से झगड़ा शुरू होता है..."
"लेकिन दोनों की समझदारी से खत्म होता है।"
अब कविता की बारी थी।
वह धीरे-धीरे रोहित के सामने आकर खड़ी हो गई।
उसके हाथ काँप रहे थे।
आँसू लगातार बह रहे थे।
"रोहित..."
"मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया।"
"मैं हर बात में डर ढूँढती रही।"
"तुम्हारी चुप्पी में धोखा देखा..."
"तुम्हारी अच्छाई में भी शक देखा।"
"मुझे माफ़ कर दो।"
रोहित कुछ नहीं बोला।
कविता ने आगे कहा—
"अगर तुम मुझे एक मौका दोगे..."
"तो मैं वादा करती हूँ..."
"अब जो समझ नहीं आएगा..."
"उस पर आरोप नहीं लगाऊँगी।"
"पहले तुमसे पूछूँगी।"
पूरा कमरा शांत था।
हर कोई रोहित के जवाब का इंतज़ार कर रहा था।
रोहित ने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया।
कविता ने आँसू भरी आँखों से उसकी ओर देखा।
रोहित बोला—
"एक शर्त है।"
"क्या?"
"आज के बाद..."
"हम दोनों मन की बात छिपाएँगे नहीं।"
"अगर डर लगेगा..."
"तो बताएँगे।"
"अगर गुस्सा होगा..."
"तो कहेंगे।"
"अगर कोई बात समझ नहीं आएगी..."
"तो पूछेंगे।"
"लेकिन..."
"शक को कभी फैसला नहीं बनने देंगे।"
कविता ने बिना देर किए उसका हाथ पकड़ लिया।
"मैं वादा करती हूँ।"
सरोज देवी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
उन्होंने आगे बढ़कर कविता को गले लगा लिया।
"बहू..."
"आज से यह घर सिर्फ हमारा नहीं..."
"तुम्हारा भी उतना ही है।"
"अगर कभी कोई बात समझ न आए..."
"तो सबसे पहले मेरे पास आना।"
"दिल में मत रखना।"
कविता फूट-फूटकर रो पड़ी।
सविता यह सब देख रही थीं।
उनके चेहरे पर पहली बार सुकून दिखाई दे रहा था।
उन्होंने गोपाल जी की ओर देखकर कहा,
"समधी जी..."
"आज आपने मेरा भी एक डर खत्म कर दिया।"
गोपाल जी मुस्कुराए।
"डर अँधेरे की तरह होता है।"
"जैसे ही विश्वास का दीपक जलता है..."
"वह अपने आप चला जाता है।"
उस दिन कोई बड़ा उत्सव नहीं हुआ।
कोई मिठाई नहीं बँटी।
कोई शोर नहीं हुआ।
लेकिन उस घर में एक बहुत बड़ी बात हुई।
चार लोगों ने अपने-अपने अहंकार से बड़ा रिश्ता चुना।
समय बीतने लगा।
धीरे-धीरे घर फिर पहले जैसा हँसने लगा।
अब अगर किसी बात पर कविता के मन में सवाल आता...
तो वह चुपचाप कहानी नहीं बनाती।
सीधे रोहित से पूछ लेती।
और रोहित भी अब हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करने लगा।
एक दिन अमित अपनी पत्नी के साथ घर आया।
उसकी पत्नी पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी।
उसने कविता से कहा,
"अगर उस रात रोहित जी मदद न करते..."
"तो शायद आज मैं आपके सामने खड़ी न होती।"
कविता की आँखें भर आईं।
उसने मन ही मन सोचा—
"जिस काम को मैंने गलत समझा था... वही किसी की ज़िंदगी बचाने का कारण था।"
कुछ महीनों बाद सविता फिर बेटी से मिलने आईं।
इस बार उन्होंने कोई सलाह नहीं दी।
सिर्फ इतना पूछा,
"खुश है ना?"
कविता मुस्कुराई।
"हाँ मम्मी।"
"अब मुझे समझ आ गया है..."
"भरोसा आँख बंद करके नहीं किया जाता।"
"लेकिन हर किसी पर शक करके भी कोई रिश्ता नहीं निभाया जाता।"
सविता ने बेटी का माथा चूम लिया।
शाम को पूरा परिवार आँगन में बैठा था।
हल्की हवा चल रही थी।
गोपाल जी ने चाय का कप हाथ में लेते हुए मुस्कुराकर कहा,
"जीवन ने मुझे एक बात सिखाई है।"
सब उनकी ओर देखने लगे।
उन्होंने कहा—
"रिश्ते कभी एक दिन में नहीं टूटते।"
"वे तब टूटते हैं, जब हम सवाल पूछना छोड़ देते हैं और मन ही मन फैसले सुनाने लगते हैं।"
"और रिश्ते फिर उसी दिन जुड़ने लगते हैं, जब हम आरोप छोड़कर संवाद शुरू कर देते हैं।"
सबके चेहरों पर मुस्कान थी।
उस दिन किसी ने कोई वादा नहीं लिखा।
लेकिन हर दिल में एक बात हमेशा के लिए दर्ज हो गई—
डर विरासत बन सकता है... लेकिन भरोसा भी।
हम आने वाली पीढ़ी को क्या देंगे, यह फैसला हर दिन हमारे व्यवहार से होता है।

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