डर के उस पार

 

Emotional Indian mother comforting her son as he overcomes his fear of marriage and learns to trust again


“कभी-कभी इंसान रिश्तों से नहीं, रिश्तों में मिले किसी पुराने घाव से डरता है। उसे लगता है कि अगर उसने दोबारा भरोसा किया, तो वही दर्द फिर लौट आएगा। लेकिन हर नया रिश्ता पुरानी कहानी नहीं होता।”


कमला देवी अपने तीन बेटों में सबसे छोटे बेटे निखिल को लेकर हमेशा चिंतित रहती थीं।


दो बड़े बेटे अपनी-अपनी गृहस्थी में खुश थे। बड़े बेटे राकेश की पत्नी सुनीता घर को संभालती थी और उनका एक बेटा था। दूसरे बेटे महेश की पत्नी कविता भी नौकरी करती थी और उनके दो बच्चे थे।


दोनों बेटों की शादियाँ हुए कई साल बीत चुके थे। घर में बहुओं की आवाजें थीं, बच्चों की शरारतें थीं और रिश्तेदारों का आना-जाना भी लगा रहता था।


लेकिन कमला देवी की नजर बार-बार एक ही कमरे के दरवाजे पर चली जाती थी।


वह कमरा निखिल का था।


निखिल घर का सबसे छोटा बेटा था और पढ़ाई में शुरू से ही बहुत तेज था। उसने मेहनत करके विदेश की एक बड़ी कंपनी में नौकरी हासिल कर ली थी। अच्छी कमाई थी, अपना सुंदर घर था और समाज में सम्मान भी था।


पर उसकी जिंदगी में एक चीज नहीं थी—जीवनसाथी।


कमला देवी ने कई बार बात छेड़ी थी।


“बेटा, अब तेरी उम्र भी कम नहीं रही। अगर कोई लड़की पसंद हो तो हमें बता दे। हम अपनी तरफ से कोई दबाव नहीं डालेंगे।”


निखिल हर बार एक ही जवाब देता।


“माँ, मुझे शादी नहीं करनी।”


कमला देवी ने हैरानी से उसकी ओर देखते हुए पूछा, “क्यों बेटा?”


निखिल ने नजरें झुका लीं और धीमे से जवाब दिया, “बस नहीं करनी, माँ।”


कमला देवी उसके चेहरे को देखतीं और चुप हो जातीं।


उन्हें मालूम था कि यह केवल शादी से इंकार नहीं था। इसके पीछे कोई गहरी वजह जरूर थी।


लेकिन निखिल कभी उस वजह के बारे में बात नहीं करता था।


एक दिन घर में रिश्तेदारों की मौजूदगी में किसी ने मजाक करते हुए कह दिया—


“निखिल तो अब हमेशा कुंवारा ही रहेगा। इतनी अच्छी नौकरी और इतना अच्छा चेहरा है, फिर भी शादी से भागता है!”


सब हँस पड़े।


निखिल भी हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन उसकी आँखों की चमक अचानक गायब हो गई।


कमला देवी ने यह देख लिया।


वह उसके पीछे उसके कमरे तक गईं।


“निखिल।”


निखिल ने पलटकर देखा और बोला—

“जी माँ?”


कमला देवी उसके पास बैठते हुए बोलीं—

“तुझे बुरा लगा?”


निखिल ने नजरें चुराते हुए कहा—

“नहीं।”


कमला देवी ने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए कहा—

“झूठ मत बोल।”


निखिल कुछ नहीं बोला।


कमला देवी उसके पास बैठ गईं।


“बेटा, मैं तुझे शादी के लिए मजबूर नहीं करूँगी। लेकिन तेरे दिल में जो बात है, उसे अकेले मत ढो।”


निखिल ने सिर झुका लिया।


काफी देर तक कमरे में खामोशी रही।


फिर उसने धीमी आवाज में कहा—


“माँ, क्या आपको पता है मैं शादी से क्यों डरता हूँ?”


कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“नहीं बेटा। लेकिन आज जानना चाहती हूँ।”


निखिल ने लंबी साँस ली।


“मेरी कंपनी में रिया नाम की एक लड़की काम करती थी।”


कमला देवी ध्यान से सुनने लगीं।


“हम दोनों एक ही प्रोजेक्ट पर थे। धीरे-धीरे दोस्ती हुई। फिर मुझे लगा कि शायद मैं उससे शादी कर सकता हूँ।”


कमला देवी ने चिंता से उसकी ओर देखते हुए पूछा—

“फिर क्या हुआ बेटा?”


निखिल ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

“मैंने उससे अपने परिवार के बारे में बताया। उसने भी अपने परिवार की बातें मेरे साथ साझा कीं। मुझे लगा कि सब कुछ ठीक है और हमारा रिश्ता सही दिशा में जा रहा है।”


निखिल कुछ पल रुका।


“एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह मेरे साथ जिंदगी बिताना चाहती है।”


कमला देवी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।


लेकिन निखिल की आवाज में दर्द था।


“मैंने अपने घर में बात करने का फैसला कर लिया था। तभी मुझे पता चला कि वह पहले से किसी और रिश्ते में थी।”


कमला देवी चुप रहीं।


निखिल ने धीमी आवाज में कहा—

“उसने कहा था कि वह रिश्ता सिर्फ परिवार के दबाव में था। मैंने उसकी बात पर विश्वास कर लिया।”


कमला देवी ने पूछा—

“फिर क्या हुआ बेटा?”


निखिल ने कहा—

“फिर उसने मुझसे शादी करने के लिए बहुत सारी शर्तें रखनी शुरू कर दीं।”


निखिल की आँखें भर आईं।


“पहले उसने कहा कि शादी के बाद मैं अपना शहर छोड़ दूँ। मैंने कहा, ठीक है। फिर उसने कहा कि मेरे माता-पिता मेरे साथ नहीं रहेंगे। मैंने कहा, इस पर सोचेंगे। फिर उसने कहा कि उसे मेरे परिवार से कोई लेना-देना नहीं रखना।”


कमला देवी ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।


“मैंने उससे पूछा कि क्या वह सच में मुझसे प्यार करती है या सिर्फ मेरी नौकरी और जिंदगी से?”


निखिल की आवाज काँपने लगी।


“उसने उसी दिन रिश्ता खत्म कर दिया।”


कमला देवी ने धीरे से पूछा—


“इसके बाद?”


“इसके बाद उसने मेरे खिलाफ अपने दोस्तों के बीच ऐसी बातें फैला दीं, जिनका सच से कोई संबंध नहीं था। कुछ लोगों ने मुझसे दूरी बना ली। मैं बहुत टूट गया था।”


कमला देवी की आँखों में आँसू आ गए।


“लेकिन बेटा, एक लड़की के कारण तूने पूरी दुनिया की लड़कियों पर भरोसा करना कैसे छोड़ दिया?”


निखिल ने तुरंत जवाब दिया—


“क्योंकि माँ, उस समय मुझे लगा था कि मैं लोगों को पहचान ही नहीं सकता।”


“और फिर?”


“फिर मैंने तय कर लिया कि किसी रिश्ते में नहीं पड़ूँगा। अकेला रहूँगा। कम से कम किसी पर भरोसा करके दोबारा टूटूँगा तो नहीं।”


कमला देवी कुछ देर उसे देखती रहीं।


फिर बोलीं—


“बेटा, अगर एक डॉक्टर से इलाज में गलती हो जाए, तो क्या हम पूरी जिंदगी इलाज करवाना बंद कर देते हैं?”


निखिल ने माँ की ओर देखा।


“नहीं।”


“अगर एक दुकानदार ने धोखा दिया हो, तो क्या हम हर दुकानदार को चोर समझ लेते हैं?”


निखिल चुप रहा।


“फिर एक इंसान की गलती का बदला तू उन लोगों से क्यों ले रहा है, जिनसे अभी तेरी मुलाकात भी नहीं हुई?”


निखिल के पास कोई जवाब नहीं था।


कमला देवी ने कहा—


“तुझे शादी करनी है या नहीं, यह फैसला तेरा है। लेकिन सिर्फ डर की वजह से कोई फैसला मत लेना।”


निखिल ने नजरें झुका लीं।


“माँ, अगर फिर वही हुआ तो?”


कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए शांत स्वर में कहा—

“तो इस बार तू पहले से ज्यादा समझदार होगा।”


निखिल ने कुछ पल चुप रहने के बाद पूछा—

“अगर फिर धोखा मिला?”


कमला देवी ने बिना घबराए जवाब दिया—

“तो संभाल लेना।”


निखिल की आवाज में फिर डर उतर आया—

“अगर रिश्ता टूट गया?”


कमला देवी ने बेटे का हाथ थामते हुए कहा—

“तो टूटे हुए रिश्ते को अपनी पूरी जिंदगी मत बना लेना।”


निखिल की आँखों से एक आँसू गिर पड़ा।


कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“बेटा, जिंदगी में हर रिश्ता निभाना जरूरी नहीं होता। लेकिन हर इंसान को शक की नजर से देखना भी सही नहीं होता।”


निखिल ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन उस दिन पहली बार उसके भीतर कुछ बदला।


कुछ दिनों बाद कमला देवी की पुरानी सहेली शारदा देवी घर आईं। उनके साथ उनकी भतीजी अनामिका भी थी।


अनामिका साधारण-सी लड़की थी।


उसने महँगे कपड़े नहीं पहने थे। बहुत ज्यादा सजने-सँवरने की कोशिश भी नहीं की थी। वह कमला देवी के पैर छूकर चुपचाप बैठ गई।


बातचीत शुरू हुई।


निखिल सामान्य व्यवहार करने की कोशिश कर रहा था।


अनामिका ने उससे उसकी नौकरी, पसंद और भविष्य के बारे में पूछा।


फिर अचानक उसने कहा—


“आपको शादी करनी है?”


निखिल थोड़ा असहज हुआ।


“मुझे नहीं पता।”


“तो फिर सिर्फ परिवार के दबाव में मत कीजिए।”


निखिल ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।


“आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”


अनामिका मुस्कुराई।


“क्योंकि शादी दो लोगों की जिंदगी है। सिर्फ माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए शादी करना सही नहीं है।”


कमला देवी ने चुपचाप दोनों को देखा।


निखिल ने पूछा—


“अगर आपके माता-पिता आप पर दबाव डालें तो?”


अनामिका ने शांत स्वर में जवाब दिया,

“तो मैं उनसे कहूँगी कि मुझे थोड़ा समय दें।”


निखिल ने फिर पूछा,

“और अगर सामने वाला अच्छा हो?”


अनामिका हल्की-सी मुस्कुराई और बोली,

“तो उसे समझने में भी समय लगाऊँगी।”


निखिल पहली बार हल्का-सा मुस्कुराया।


“आप बहुत सावधान लगती हैं।”


अनामिका ने कहा—


“शायद इसलिए क्योंकि मैंने भी अपने आसपास कई रिश्ते टूटते देखे हैं।”


निखिल का चेहरा फिर गंभीर हो गया।


“तो आपको शादी से डर नहीं लगता?”


अनामिका ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

“डर लगता है।”


निखिल ने उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“फिर?”


अनामिका ने शांत आवाज़ में जवाब दिया,

“डर के बावजूद जिंदगी रोक देना और डर को समझकर आगे बढ़ना—इन दोनों में फर्क है।”


निखिल उस जवाब को देर तक सोचता रहा।


अनामिका के जाने के बाद कमला देवी ने उससे कुछ नहीं पूछा।


उन्होंने केवल इतना कहा—


“फैसला जल्दी मत करना।”


निखिल ने सिर हिलाया।


उसके बाद दोनों परिवारों की बातचीत धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।


लेकिन निखिल के मन में अभी भी एक डर था।


उसे बार-बार लगता—


“कहीं मैं फिर वही गलती तो नहीं कर रहा?”


एक दिन उसने अनामिका से साफ-साफ कह दिया—


“मेरी जिंदगी में पहले एक ऐसा अनुभव हो चुका है, जिसकी वजह से मुझे भरोसा करने में मुश्किल होती है।”


अनामिका ने शांत स्वर में कहा—


“आपको मुझ पर तुरंत भरोसा करने की जरूरत नहीं है।”


निखिल चौंका।


“क्या मतलब?”


अनामिका ने शांत स्वर में कहा,

“भरोसा माँगा नहीं जाता, बनाया जाता है।”


निखिल कुछ नहीं बोला।


अनामिका ने आगे कहा—


“आप मुझे समय दीजिए। मैं भी आपको समय दूँगी। अगर हम दोनों को लगे कि हम साथ चल सकते हैं, तभी आगे बढ़ेंगे।”


उस दिन निखिल को पहली बार लगा कि शायद रिश्ता केवल भावनाओं से नहीं, समझदारी से भी बनाया जा सकता है।


कई महीनों तक दोनों एक-दूसरे को समझते रहे।


निखिल ने अनामिका को अपने परिवार से मिलवाया।


अनामिका ने भी निखिल के माता-पिता को समझने की कोशिश की।


कभी दोनों की राय अलग होती।


कभी छोटी बात पर बहस भी हो जाती।


लेकिन हर बार वे बात करके समस्या हल कर लेते।


एक दिन निखिल ने अनामिका से कहा—


“तुम्हें पता है, मुझे सबसे ज्यादा डर किस बात का था?”


“किस बात का?”


“कि अगर मैंने किसी को अपने जीवन में जगह दी, तो वह मेरी कमजोरी बन जाएगा।”


अनामिका मुस्कुराई।


“और अब?”


निखिल ने उसकी ओर देखकर कहा—


“अब समझ आया कि सही इंसान कमजोरी नहीं बनता। वह कमजोरी के समय सहारा बन सकता है।”


अनामिका ने कुछ नहीं कहा।


बस उसकी आँखों में एक शांत-सी मुस्कान थी।


कुछ समय बाद निखिल ने खुद माँ के पास जाकर कहा—


“माँ, अगर आपको अभी भी लगता है कि अनामिका हमारे परिवार के लिए सही है, तो मैं शादी के लिए तैयार हूँ।”


कमला देवी की आँखें भर आईं।


उन्होंने बेटे को गले लगा लिया।


“मुझे तेरी शादी से ज्यादा खुशी इस बात की है कि तू अपने डर से बाहर आया।”


निखिल ने माँ के कंधे पर सिर रख दिया।


“आप सही कहती थीं माँ।”


कमला देवी ने हैरानी से पूछा—

“क्या?”


निखिल हल्की मुस्कान के साथ बोला—

“हर नया इंसान पुरानी कहानी नहीं होता।”


कमला देवी मुस्कुरा दीं।


शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।


घर फिर से सजने लगा।


बच्चों की आवाजें बढ़ गईं।


रिश्तेदार आने लगे।


निखिल के बड़े भाई उसे छेड़ते—


“आखिरकार हमारे छोटे साहब भी फँस गए!”


निखिल हँसकर कहता—


“फँसा नहीं हूँ, समझकर आगे बढ़ा हूँ।”


शादी के बाद जब अनामिका पहली बार घर आई, तो कमला देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—


“बेटी, इस घर में तुझसे कभी गलती हो जाए तो डरना मत। बात करना।”


अनामिका की आँखें नम हो गईं।


“माँ, आप भी मुझसे कभी नाराज हों तो चुप मत रहिएगा।”


दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।


दरवाजे के पास खड़ा निखिल यह सब देख रहा था।


उसने महसूस किया कि जिस रिश्ते से वह वर्षों तक डरता रहा, वही रिश्ता अब उसके घर में प्रेम लेकर आया था।


उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में धोखा मिलना इंसान की गलती नहीं होती।


लेकिन धोखे के बाद हर इंसान को दोषी मान लेना जरूर एक गलती हो सकती है।


कई महीने बाद एक रात निखिल अपनी माँ के पास बैठा था।


कमला देवी ने पूछा—


“खुश है?”


निखिल मुस्कुराया।


“बहुत।”


“डर नहीं लगता अब?”


निखिल ने कुछ सोचकर कहा—


“डर तो आज भी कभी-कभी लगता है।”


कमला देवी ने उसकी तरफ देखा।


“फिर?”


निखिल ने कहा—


“अब मैं डर को फैसला नहीं करने देता।”


कमला देवी की आँखें चमक उठीं।


निखिल ने माँ का हाथ पकड़ लिया।


“आपने मुझे शादी नहीं कराई माँ। आपने मुझे फिर से भरोसा करना सिखाया।”


कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।


“माँ का काम बेटे को जिंदगी देना ही नहीं होता बेटा, कभी-कभी उसे जिंदगी से डरना छोड़ना भी सिखाना पड़ता है।”


निखिल मुस्कुराया।


उसने खिड़की से बाहर देखा।


उसे लगा, जिंदगी बिल्कुल साफ रास्ता नहीं है।


कहीं मोड़ हैं, कहीं गड्ढे हैं, कहीं अजनबी रास्ते हैं।


लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंसान चलना छोड़ दे।


क्योंकि कभी-कभी रास्ते में मिला एक गलत इंसान हमें पूरी दुनिया से दूर कर देता है।


और कभी एक सही इंसान हमें फिर से दुनिया पर विश्वास करना सिखा देता है।


सीख:

किसी एक व्यक्ति की गलती के कारण हर रिश्ते को गलत समझ लेना उचित नहीं है। भरोसा टूटने के बाद दोबारा भरोसा करना आसान नहीं होता, लेकिन डर के कारण जिंदगी को रोक देना भी समाधान नहीं है। सही रिश्ता वही है जहाँ दोनों एक-दूसरे से तुरंत भरोसा माँगने के बजाय उसे धीरे-धीरे अपने व्यवहार से बनाते हैं।



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