रिश्तों का तराजू
सुबह-सुबह नाश्ते की मेज पर बैठी सरोज जी अपनी बहू नेहा से कह रही थीं,
“बहू, जरा जल्दी से मेरे लिए चाय बना दे। आज मुझे मंदिर भी जाना है और उसके बाद बाजार से कुछ सामान भी लेना है।”
नेहा रसोई में चाय बना रही थी। तभी बाहर दरवाजे की घंटी बजी।
नेहा ने जाकर दरवाजा खोला तो सामने कुरियर वाला खड़ा था।
“मैडम, आपके नाम का पार्सल है।”
नेहा ने पार्सल लिया और अंदर आकर मेज पर रख दिया।
सरोज जी की नजर पार्सल पर पड़ी तो उन्होंने तुरंत पूछा,
“किसका पार्सल है?”
नेहा ने पार्सल की तरफ देखते हुए जवाब दिया,
“मां जी, मेरा लगता है। मैंने कुछ सामान मंगाया था।”
नेहा की बात सुनकर सरोज जी ने बस इतना कहा,
“अच्छा।”
सरोज जी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
कुछ देर बाद नेहा अपने कमरे में गई और पार्सल खोलने लगी। अंदर एक सुंदर रेशमी साड़ी थी। वह साड़ी देखकर नेहा के चेहरे पर खुशी आ गई।
उसी समय सरोज जी कमरे में आ गईं।
“क्या आया है बहू?”
“मां जी, साड़ी है। अगले महीने मेरी छोटी बहन की शादी है ना, इसलिए मैंने अपने लिए मंगाई थी।”
सरोज जी ने साड़ी को देखा और बोलीं,
“इतने महंगे कपड़े पहनने की क्या जरूरत है? घर में तो वैसे भी कितनी साड़ियां पड़ी हैं।”
नेहा ने मुस्कुराकर कहा,
“मां जी, बहुत ज्यादा महंगी नहीं है। अपनी बचत से खरीदी है।”
सरोज जी ने ताना मारते हुए कहा,
“हां, तुम लोगों को तो खर्च करने का बहाना चाहिए।”
नेहा चुप हो गई।
वह साड़ी वापस रखने ही वाली थी कि तभी सरोज जी का फोन बजा।
फोन उनकी बेटी पूजा का था।
सरोज जी का चेहरा तुरंत खिल उठा।
“अरे पूजा बेटा! कैसी है?”
कुछ देर बात करने के बाद पूजा ने कहा,
“मां, इस बार मेरी शादी की सालगिरह पर कुछ मत भेजना। पहले ही बहुत खर्चा हो गया है।”
सरोज जी हंसते हुए बोलीं,
“तू मेरी बेटी है। तेरे लिए खर्चा नहीं करूंगी तो किसके लिए करूंगी?”
नेहा वहीं खड़ी सब सुन रही थी।
सरोज जी ने फोन रखते ही कहा,
“बहू, कल बाजार जाना है। मुझे पूजा के लिए एक अच्छी साड़ी लेनी है। उसकी शादी की सालगिरह है।”
नेहा ने सहजता से कहा,
“ठीक है मां जी।”
अगले दिन सरोज जी अपने बेटे अमित के साथ बाजार चली गईं।
अमित ने पूछा,
“मां, पूजा के लिए क्या लेना है?”
सरोज जी ने साड़ियों की तरफ देखते हुए कहा,
“एक अच्छी साड़ी। ऐसी होनी चाहिए कि देखते ही उसे पसंद आ जाए।”
अमित ने मुस्कुराते हुए कहा,
“ठीक है। आप पसंद कर लेना।”
दोनों दुकान में पहुंचे।
सरोज जी ने कई साड़ियां देखीं। आखिरकार उन्होंने एक बहुत सुंदर रेशमी साड़ी पसंद की।
दुकानदार ने कीमत बताई तो अमित थोड़ा चौंका।
“मां, इतनी महंगी?”
सरोज जी तुरंत बोलीं,
“पूजा के लिए है बेटा। साल में एक ही तो सालगिरह आती है।”
अमित मुस्कुराया,
“ठीक है मां।”
साड़ी पैक हो गई।
अमित ने पूछा,
“बहू नेहा के लिए भी कुछ लेना है? उसकी बहन की शादी आने वाली है।”
सरोज जी कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं,
“नहीं बेटा। उसके पास तो बहुत कपड़े हैं।”
अमित ने कुछ नहीं कहा।
घर लौटने के बाद नेहा ने पूछा,
“मां जी, बाजार से आ गईं?”
सरोज जी ने सामान रखते हुए कहा,
“हां बहू।”
नेहा ने मुस्कुराकर पूछा,
“पूजा दीदी के लिए क्या लिया?”
सरोज जी ने खुशी से साड़ी दिखाई।
“देख, कैसी सुंदर है!”
नेहा ने साड़ी देखकर कहा,
“बहुत सुंदर है मां जी। दीदी को जरूर पसंद आएगी।”
अमित ने उसी समय कहा,
“मां, नेहा की बहन की शादी भी तो आने वाली है। उसके लिए भी कुछ लेना था ना?”
सरोज जी ने तुरंत बात बदलते हुए कहा,
“अरे, उसकी बहन की शादी है। उसके घर वाले खरीदेंगे। हमें क्यों चिंता करनी?”
नेहा ने यह बात सुन ली।
उसने कुछ नहीं कहा।
वह चुपचाप रसोई में चली गई।
लेकिन उसी रात नेहा के मन में एक बात बार-बार घूमती रही।
“अगर बेटी के घर की खुशी में मां को इतना खर्च करना अपना फर्ज लगता है, तो बहू के मायके की खुशी में थोड़ी सी खुशी दिखाना इतना मुश्किल क्यों है?”
नेहा ने फिर खुद को समझाया,
“शायद मां जी की सोच ऐसी ही है। मुझे इसे दिल पर नहीं लेना चाहिए।”
दिन बीतते गए।
फिर पूजा की शादी की सालगिरह का दिन आ गया।
सरोज जी सुबह से ही बहुत उत्साहित थीं।
उन्होंने पूजा के लिए मिठाई, साड़ी और कुछ गहने तक पैक कर दिए।
अमित से बोलीं,
“बेटा, शाम को ऑफिस से आते ही पूजा के घर यह सामान पहुंचा देना।”
अमित ने सामान देखा तो बोला,
“मां, आपने इतना सब क्यों लिया?”
सरोज जी मुस्कुराईं,
“मेरी बेटी है। उसके चेहरे पर खुशी देखने के लिए कुछ भी कर सकती हूं।”
नेहा पास ही खड़ी थी।
उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा,
“हां मां जी, बेटी की खुशी सबसे बड़ी होती है।”
सरोज जी ने उसकी ओर देखा।
उन्हें शायद नेहा की आवाज में छिपा दर्द महसूस नहीं हुआ।
शाम को अमित पूजा के घर गया।
पूजा ने जैसे ही सामान देखा, वह बहुत खुश हो गई।
लेकिन तभी पूजा ने एक सवाल पूछा,
“भैया, भाभी ने मेरे लिए कुछ भेजा है क्या?”
अमित ने कहा,
“हां, नेहा ने मिठाई और तुम्हारे लिए एक छोटा सा तोहफा दिया है।”
पूजा खुश हो गई।
अमित ने कहा,
“मां ने भी बहुत कुछ भेजा है।”
पूजा ने सामान देखा तो बोली,
“मां ने इतना सब भेज दिया! मुझे तो मना किया था।”
अमित मुस्कुराया।
“तू मां को जानती है। तुझसे प्यार करती है, इसलिए।”
कुछ देर बाद पूजा की नजर एक छोटे से पैकेट पर पड़ी।
उसने पूछा,
“भैया, यह क्या है?”
अमित ने कहा,
“शायद नेहा ने दिया है।”
पूजा ने पैकेट खोला।
अंदर एक सुंदर घड़ी थी।
पूजा की आंखें चमक उठीं।
“भाभी ने मेरे लिए इतनी प्यारी घड़ी ली!”
अमित मुस्कुराते हुए बोला,
“हां। उसने अपनी बचत से ली है।”
पूजा कुछ पल चुप रही।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी भाभी ने उसके लिए कुछ देने की बात किसी से नहीं कही थी।
उधर घर पर नेहा खाना बना रही थी।
सरोज जी टीवी देख रही थीं।
तभी उनका फोन बजा।
पूजा का फोन था।
सरोज जी ने फोन उठाया।
“हां बेटा।”
दूसरी तरफ पूजा की आवाज थी,
“मां, आज आपने मेरे लिए इतना कुछ भेजा। बहुत अच्छा लगा।”
सरोज जी ने खुश होकर पूछा,
“तुझे पसंद आया ना?”
पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बहुत पसंद आया मां। लेकिन मां, एक बात पूछूं?”
सरोज जी ने कहा,
“हां बेटा, पूछ।”
पूजा कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“मां, आपने भाभी की बहन की शादी के लिए क्या भेजा है?”
सरोज जी अचानक चुप हो गईं।
“कुछ नहीं।”
पूजा ने हैरानी से पूछा,
“कुछ नहीं?”
सरोज जी ने सफाई देते हुए कहा,
“हां बेटा। उसकी बहन की शादी है। उसके घर वाले सब कर रहे होंगे।”
पूजा की आवाज बदल गई।
“मां, अगर नेहा आपकी बेटी होती तो भी क्या आप यही कहतीं?”
सरोज जी के हाथ से फोन लगभग छूटते-छूटते बचा।
“तू कैसी बातें कर रही है?”
पूजा ने शांत आवाज में कहा,
“मां, मैं आपकी बेटी हूं। इसलिए आप मेरे लिए बहुत कुछ करती हैं। यह देखकर मुझे खुशी होती है। लेकिन आज भाभी की दी हुई घड़ी देखकर मुझे एक बात समझ आई।”
सरोज जी ने हैरानी से पूछा,
“क्या?”
पूजा ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा,
“भाभी ने मुझे अपनी बचत से तोहफा दिया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि मैं उनकी सगी बहन नहीं हूं। फिर हम क्यों सोचते हैं कि उनकी बहन हमारे परिवार की नहीं है?”
सरोज जी के पास कोई जवाब नहीं था।
पूजा आगे बोली,
“मां, रिश्ते खून से नहीं, व्यवहार से बड़े होते हैं। अगर भाभी मेरी बहन जैसी हैं, तो उनकी बहन भी हमारे लिए सम्मान की हकदार है।”
सरोज जी चुपचाप सुनती रहीं।
पूजा ने फिर कहा,
“और मां, एक बात और। आपने मुझे आज बहुत महंगा तोहफा दिया है, लेकिन भाभी ने मुझे जो घड़ी दी है ना, वह मेरे लिए ज्यादा कीमती है। क्योंकि उसमें उनका अपनापन है।”
यह सुनकर सरोज जी की आंखें भर आईं।
उन्होंने फोन रख दिया।
कुछ देर तक वह बिल्कुल चुप बैठी रहीं।
नेहा रसोई से बाहर आई।
“मां जी, खाना लगा दूं?”
सरोज जी ने उसकी तरफ देखा।
आज पहली बार उन्हें अपनी बहू की आंखों में वह चुप्पी साफ दिखाई दी, जिसे वह इतने दिनों से नजरअंदाज करती आई थीं।
उन्होंने धीरे से पूछा,
“बहू, तुम्हारी बहन की शादी कब है?”
नेहा ने कहा,
“मां जी, अगले रविवार को।”
सरोज जी ने फिर पूछा,
“तुमने शादी के लिए क्या लिया?”
नेहा ने धीरे से कहा,
“कुछ खास नहीं। जो बन पड़ेगा, कर लेंगे।”
सरोज जी ने कुछ पल सोचा।
फिर बोलीं,
“कल मेरे साथ बाजार चलना।”
नेहा ने हैरानी से पूछा,
“क्यों मां जी?”
सरोज जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हारी बहन के लिए कुछ लेना है।”
नेहा कुछ बोल नहीं पाई।
सरोज जी की आंखों से आंसू निकल आए।
“बहू, मुझे माफ कर देना। मैंने रिश्तों को अपने हिसाब से तौलने की कोशिश की। बेटी के लिए प्यार था, लेकिन तुम्हारे मायके के रिश्तों को अपना समझने में मैं पीछे रह गई।”
नेहा की आंखें भी भर आईं।
“मां जी, आपने आज यह समझ लिया, मेरे लिए यही बहुत है।”
सरोज जी ने कहा,
“नहीं बहू। सिर्फ समझ लेना काफी नहीं है। अब मुझे अपना व्यवहार भी बदलना होगा।”
अगले दिन सरोज जी ने बाजार से नेहा की बहन के लिए एक सुंदर साड़ी खरीदी।
साथ में कुछ शगुन भी रखा।
घर लौटते समय अमित ने पूछा,
“मां, यह सब देखकर अच्छा लग रहा है। लेकिन अचानक आपका विचार कैसे बदल गया?”
सरोज जी मुस्कुराईं।
“बेटा, कल तक मैं रिश्तों को दो तराजू में तौल रही थी। एक तराजू में अपनी बेटी थी और दूसरे में अपनी बहू का मायका। मुझे लगता था कि दोनों का वजन बराबर नहीं हो सकता।”
अमित ने पूछा,
“और अब?”
सरोज जी ने कहा,
“अब समझ आया कि रिश्ते तराजू पर नहीं तौले जाते। जिस रिश्ते में अपनापन हो, उसे अपना कहने के लिए खून का रिश्ता जरूरी नहीं होता।”
अमित मुस्कुरा दिया।
कुछ दिनों बाद नेहा की बहन की शादी थी।
सरोज जी खुद वहां गईं।
उन्होंने नेहा की बहन को गले लगाया और कहा,
“आज से तुम सिर्फ मेरी बहू की बहन नहीं हो। तुम मेरे परिवार का हिस्सा हो।”
नेहा दूर खड़ी यह सब देख रही थी।
उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।
क्योंकि उसे उपहार से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि उसकी सास ने आखिरकार उसके मायके को भी अपना समझ लिया था।
उस दिन सरोज जी ने एक बहुत बड़ी बात सीखी थी—
बेटी और बहू के रिश्ते में फर्क करना आसान है, लेकिन बहू के दिल में जगह बनाना तभी संभव है जब उसके रिश्तों को भी अपने रिश्तों जैसा सम्मान दिया जाए।
और रिश्तों में सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब हम सामने वाले के प्यार को तो अपना मान लेते हैं, लेकिन उसके अपनों को पराया समझ लेते हैं।

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