बेटी की आवाज़ को अनसुना मत करना
“बच्चे जब किसी बात पर असहज होते हैं, तो हर बार उसके पीछे कोई बड़ी वजह बताना जरूरी नहीं होता। उनकी छोटी-सी बात को भी ध्यान से सुनना जरूरी है। क्योंकि जिस उम्र में वे अपनी भावनाओं को ठीक से शब्द नहीं दे पाते, उस उम्र में हमारा विश्वास ही उनका सबसे बड़ा सहारा होता है।”
मानसी ने पीहू को अपनी गोद में बैठाया तो बच्ची चुपचाप उसके कंधे से लग गई। कुछ देर तक वह उसके बालों में हाथ फेरती रही, फिर धीरे से बोली,
“मम्मा, मैं राहुल भैया के कमरे में नहीं जाऊंगी।”
मानसी का हाथ वहीं रुक गया।
“क्यों बेटा?”
पीहू ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी मां का हाथ कसकर पकड़ लिया।
मानसी ने प्यार से पूछा, “उन्होंने कुछ कहा?”
पीहू ने सिर हिला दिया।
“कुछ किया?”
इस बार बच्ची ने नजरें झुका लीं।
मानसी का दिल अचानक घबरा उठा।
पीहू अभी केवल पांच साल की थी। उसे डराना नहीं चाहती थी, इसलिए उसने बहुत सामान्य आवाज में पूछा,
“बेटा, जो भी हुआ है, मम्मा को बता सकती हो। मम्मा तुमसे नाराज नहीं होगी।”
पीहू ने धीमे से कहा,
“जब मैं नहीं चाहती, तब भी वो मुझे पकड़ लेते हैं।”
मानसी कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत रह गई।
उसे अचानक पिछले कई दिनों की घटनाएं याद आने लगीं।
राहुल का पीहू को बार-बार गोद में उठाना।
उसके गाल खींचना।
बिना उसकी इच्छा के गले लगाना।
और जब पीहू पीछे हटती, तो हंसकर कहना,
“अरे, इतनी सी बच्ची और इतना नखरा!”
मानसी ने पहले भी राहुल को समझाया था।
“बेटा, पीहू को अगर अच्छा नहीं लगता तो उसे परेशान मत किया करो।”
राहुल हर बार हंसकर बात टाल देता।
“मामी, मैं तो उसे प्यार करता हूं।”
मानसी भी ज्यादा कुछ नहीं कहती थी।
उसे लगता था कि शायद वह जरूरत से ज्यादा सोच रही है।
लेकिन आज उसकी बेटी के मुंह से निकले शब्दों ने उसके भीतर की सारी शंकाओं को गंभीर चिंता में बदल दिया था।
उसी समय मानव घर आया।
मानसी ने उसे सारी बात बताई।
मानव ने ध्यान से सुना और फिर बोला,
“तुम बेवजह बात को बड़ा मत बनाओ। राहुल ऐसा कुछ गलत नहीं कर रहा होगा। वो पीहू को अपनी छोटी बहन समझता है।”
मानसी ने शांत स्वर में कहा,
“मैंने भी यही सोचा था। लेकिन पीहू खुद कह रही है कि उसे अच्छा नहीं लगता।”
मानव थोड़ा झुंझला गया।
“पांच साल के बच्चे ऐसी बातें समझते भी कहां हैं?”
मानसी ने उसकी तरफ देखा।
“शायद उन्हें सब कुछ समझ नहीं आता, लेकिन उन्हें यह जरूर पता होता है कि कौन-सा व्यवहार उन्हें अच्छा लगता है और कौन-सा नहीं।”
मानव चुप हो गया।
मानसी ने आगे कहा,
“मैं राहुल पर कोई आरोप नहीं लगा रही। मैं सिर्फ अपनी बेटी की सीमा की बात कर रही हूं।”
मानव ने नाराज़ होते हुए पूछा,
“तुम्हें लगता है मैं अपनी बेटी की परवाह नहीं करता?”
मानसी ने शांत स्वर में कहा,
“ऐसा नहीं है।”
मानव ने फिर सवाल किया,
“तो फिर राहुल को लेकर इतना शक क्यों?”
मानसी की आंखें भर आईं।
“क्योंकि मैं चाहती हूं कि पीहू को यह एहसास रहे कि उसकी 'ना' की भी कोई कीमत है।”
मानव के पास उस वक्त कोई जवाब नहीं था।
मानसी ने उसी दिन राहुल से अकेले में बात करने का फैसला किया।
वह उसके कमरे के बाहर पहुंची।
“राहुल, थोड़ी देर बात करनी है।”
राहुल किताब बंद करके उसकी ओर देखने लगा।
“जी मामी।”
मानसी ने बिना गुस्सा किए कहा,
“पीहू ने बताया कि उसे जबरदस्ती गले लगना और किस करना पसंद नहीं है।”
राहुल का चेहरा तुरंत बदल गया।
“मामी, मैं तो उसे प्यार करता हूं। वो बच्ची है।”
“मैं जानती हूं कि तुम उसे अपना समझते हो। लेकिन अगर वह पीछे हटती है, मना करती है या असहज होती है, तो तुम्हें वहीं रुक जाना चाहिए।”
राहुल कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला,
“मुझे लगा था वो बस नखरा करती है।”
मानसी ने गंभीरता से कहा,
“बच्चे का नखरा और उसकी असहजता दो अलग बातें हैं।”
राहुल ने सिर झुका लिया।
“मुझे समझ नहीं आया था कि उसे इतना बुरा लगता है।”
मानसी ने गंभीर स्वर में पूछा,
“अब समझ आ गया?”
राहुल ने तुरंत सिर हिलाते हुए कहा,
“जी, मामी।”
मानसी ने उसे समझाते हुए कहा,
“तो आज के बाद उसकी मर्जी के बिना उसे मत छूना। उसे गोद में उठाने से पहले भी पूछना। अगर वह मना करे तो उसकी बात मानना।”
राहुल ने सिर हिलाया।
“मामी, मुझसे गलती हुई। मैं ध्यान रखूंगा।”
मानसी ने राहत की सांस ली।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
मानव को जब पता चला कि मानसी ने राहुल को समझाया है, तो उसने कहा,
“तुमने उसे इतना सब कहने की क्या जरूरत थी? कहीं उसे ऐसा न लगे कि हम उस पर शक कर रहे हैं।”
मानसी ने बहुत शांत होकर जवाब दिया,
“अगर उसे सही और गलत की समझ है, तो उसे मेरी बात बुरी नहीं लगेगी। और अगर उसे मेरी बात से बुरा लगा भी, तो अपनी बेटी की सुरक्षा के सामने मुझे यह मंजूर है।”
मानव पहली बार गंभीर हुआ।
“तुम्हें सच में इतना डर लग रहा है?”
मानसी ने कहा,
“डर राहुल से कम और हमारी लापरवाही से ज्यादा लग रहा है।”
मानव उसकी तरफ देखने लगा।
मानसी ने आगे कहा,
“हम अक्सर कहते हैं कि हमारे बच्चे सुरक्षित हैं, क्योंकि वे परिवार के बीच हैं। लेकिन सुरक्षा सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि आसपास अपने लोग हैं। सुरक्षा तब होती है, जब बच्चा अपनी बात कह सके और बड़े उसकी बात को गंभीरता से सुनें।”
मानव धीरे-धीरे उसकी बात समझने लगा।
कुछ दिनों बाद पीहू अपनी मां के पास आई।
“मम्मा, राहुल भैया ने आज मुझसे पूछा था कि मैं उन्हें गले लगाऊंगी?”
मानसी ने पूछा,
“तुमने क्या कहा?”
पीहू मुस्कुराई।
“मैंने कहा नहीं।”
“फिर?”
“उन्होंने कहा ठीक है।”
मानसी की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।
उसने पीहू को गले लगा लिया।
उस दिन मानव भी पास बैठा था।
उसने बेटी को देखकर कहा,
“पीहू, अगर कोई तुम्हें कोई ऐसी बात करने के लिए कहे जो तुम्हें अच्छी न लगे, तो तुम मना कर सकती हो।”
पीहू ने मासूमियत से पूछा,
“आपसे भी?”
मानव कुछ पल चुप रहा।
फिर मुस्कुराकर बोला,
“मुझसे भी।”
पीहू खिलखिला उठी।
मानसी ने मानव की ओर देखा।
मानव ने धीमे से कहा,
“शायद तुम सही थीं। बच्चों को सिर्फ प्यार देना काफी नहीं है। उन्हें अपनी बात कहने का अधिकार देना भी जरूरी है।”
मानसी ने कुछ नहीं कहा।
उसने बस अपनी बेटी को और कसकर सीने से लगा लिया।
उसे लगा जैसे आज उसने केवल अपनी बेटी को नहीं, बल्कि उस छोटी बच्ची को भी न्याय दिलाया है जो कभी खुद को समझाने वाली मां की तलाश में रह गई थी।
सीख:
बच्चे की हर बात को शक की नजर से देखना जरूरी नहीं, लेकिन उसकी असहजता को नजरअंदाज करना भी सही नहीं। किसी पर आरोप लगाने से पहले सच समझना चाहिए, मगर बच्चे की “ना” का सम्मान करना हर रिश्ते की पहली जिम्मेदारी है। परिवार वही सुरक्षित होता है, जहां बच्चे बिना डर के अपनी बात कह सकें और बड़े उनकी बात सुनने के लिए तैयार रहें।

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