दुआ के नाम पर छल
"जिस औरत को अपने ही घर में मां न बन पाने के लिए दोषी ठहराया गया, एक दिन उसी के सामने ऐसा सच आया जिसने पूरे परिवार की सोच बदल दी।"
सुमन की शादी मोहन के साथ हुए सात साल बीत चुके थे। इन सात वर्षों में उसके मायके की कई सहेलियां मां बन चुकी थीं। पड़ोस की जिन लड़कियों के साथ वह कभी खेला करती थी, वे अब अपने बच्चों को स्कूल भेजती थीं। लेकिन सुमन की गोद अब भी सूनी थी।
घर में उसकी सास कमला देवी हर छोटी-बड़ी बात के लिए उसे जिम्मेदार ठहराती थीं।
“पता नहीं हमारे घर में कौन सा पाप हुआ था, जो ऐसी बहू आ गई।”
“मेरे बेटे की जिंदगी बर्बाद कर दी।”
“अगर घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंज सकती तो ऐसी शादी का क्या फायदा?”
सुमन हर बार चुप हो जाती।
वह जानती थी कि जवाब देने से बात और बढ़ेगी।
मोहन भी मां के सामने कुछ नहीं बोलता था। अकेले में वह सुमन को समझाता जरूर था।
“तुम मां की बातों को दिल पर मत लिया करो।”
सुमन धीरे से पूछती, “लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चा न होने की वजह सिर्फ मैं ही क्यों हो सकती हूं?”
मोहन तुरंत चिढ़ गया। उसने गुस्से में सुमन की तरफ देखते हुए कहा,
“तुम्हें मुझ पर शक है?”
सुमन ने घबराकर जवाब दिया,
“नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैं तो बस इतना कह रही हूं कि डॉक्टर से हम दोनों की जांच हो जाए तो…”
मोहन ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए कहा,
“मेरी जांच की कोई जरूरत नहीं है। मैं बिल्कुल ठीक हूं। तुम अपना इलाज कराती रहो।”
मोहन की आवाज कठोर हो जाती।
सुमन फिर चुप हो जाती।
एक बार वह शहर के बड़े अस्पताल में डॉक्टर से मिली थी। डॉक्टर ने उसकी सारी रिपोर्ट देखकर कहा था कि सुमन की तरफ से कोई बड़ी समस्या नहीं दिखाई दे रही।
डॉक्टर ने समझाया था, “पति-पत्नी दोनों की जांच जरूरी होती है। संतान न होने का कारण किसी एक व्यक्ति में ही हो, यह जरूरी नहीं।”
सुमन ने यह बात मोहन को बताई, लेकिन उसने साफ इनकार कर दिया।
“मुझे किसी जांच की जरूरत नहीं। तुम अपना इलाज कराती रहो।”
सुमन समझ गई कि समस्या सिर्फ उसकी गोद की नहीं थी, बल्कि मोहन के अहंकार की भी थी।
इसी बीच गांव में एक नए बाबा की चर्चा शुरू हो गई।
लोग कहते थे कि बाबा के पास ऐसी शक्ति है कि उनकी पूजा और आशीर्वाद से वर्षों से संतान के लिए तरस रहे दंपतियों की इच्छा पूरी हो जाती है।
कमला देवी ने यह बात सुनते ही बेटे से कहा, “सुमन को बाबा के पास ले जाओ। डॉक्टरों ने तो कुछ किया नहीं। अब शायद भगवान ही हमारी मदद करें।”
मोहन ने सुमन से कहा, “कल बाबा के आश्रम चली जाना।”
सुमन ने डरते हुए कहा, “लेकिन मुझे लगता है कि पहले हमें डॉक्टर की सलाह माननी चाहिए।”
मोहन ने बात काट दी।
“जितना कहा है उतना करो।”
सुमन चुप हो गई।
अगले दिन वह बाबा के आश्रम पहुंची। वहां काफी लोग जमा थे। कोई बीमारी के लिए आया था, कोई नौकरी के लिए और कोई संतान की इच्छा लेकर।
बाबा ने सुमन की बात सुनी और गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “बेटी, तुम्हारी किस्मत में संतान का सुख है, लेकिन तुम्हारे ऊपर किसी पुराने कर्म का प्रभाव है।”
सुमन की आंखों में उम्मीद जागी।
“बाबा, क्या मेरी गोद भर जाएगी?”
बाबा ने गंभीर आवाज में कहा,
“अगर तुम मेरे बताए नियमों का पालन करोगी, तो तुम्हारी गोद जरूर भरेगी।”
सुमन ने सिर झुका दिया।
बाबा ने उसे कुछ दिनों तक विशेष पूजा करने की बात कही और कहा कि किसी को भी इसके बारे में ज्यादा जानकारी न देना।
सुमन को कुछ अजीब जरूर लगा, लेकिन वर्षों से मां बनने की इच्छा ने उसके मन का डर दबा दिया।
अगले कुछ दिनों में बाबा उससे तरह-तरह की बातें करवाता रहा। वह कहता कि पूजा के नियमों पर सवाल उठाना भगवान की शक्ति पर संदेह करना है।
सुमन भोली थी। उसे लगता था कि शायद यही आखिरी रास्ता है।
एक दिन बाबा ने पूजा के नाम पर ऐसी मांग रखी जिससे सुमन घबरा गई।
उसने साफ कह दिया, “बाबा, अगर यह पूजा है तो मैं करूंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं करूंगी जो मेरी मर्यादा के खिलाफ हो।”
बाबा का चेहरा बदल गया।
“अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो तुम्हारी गोद कभी नहीं भरेगी।”
सुमन के भीतर डर पैदा हुआ, लेकिन उसी समय उसे डॉक्टर की कही बात याद आई।
“संतान के लिए किसी भी गलत काम की जरूरत नहीं होती।”
उसने वहां से जाने का फैसला कर लिया।
बाबा ने उसे डराने की कोशिश की, लेकिन सुमन इस बार नहीं झुकी।
वह सीधे घर पहुंची और सारी बात मोहन को बताई।
मोहन ने पहले उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।
“तुमने बाबा का अपमान किया होगा।”
सुमन ने शांत स्वर में कहा, “नहीं। मैंने सिर्फ गलत बात मानने से इनकार किया है।”
कमला देवी ने भी सुमन को ही दोषी ठहरा दिया।
लेकिन इस बार सुमन चुप नहीं रही।
उसने अपनी सारी मेडिकल रिपोर्ट सामने रख दी।
“सात साल से मुझे बांझ कहा जा रहा है। लेकिन डॉक्टर की रिपोर्ट कहती है कि मेरी तरफ से कोई समस्या नहीं है। मैंने आपसे कितनी बार कहा कि आप भी जांच करा लें, लेकिन आपने हमेशा गुस्सा किया।”
मोहन रिपोर्ट देखकर चुप हो गया।
सुमन ने कहा, “अगर सच में बच्चा चाहिए तो हमें मिलकर इलाज कराना चाहिए। किसी ढोंगी के सामने अपनी जिंदगी नहीं रखनी चाहिए।”
कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा रहा।
मोहन ने पहली बार अपनी पत्नी की आंखों में वह दर्द देखा, जिसे वह वर्षों से नजरअंदाज करता आया था।
कुछ दिनों बाद वह डॉक्टर के पास जाने को तैयार हुआ।
जांच के बाद डॉक्टर ने जो बताया, उसे सुनकर मोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
संतान न होने की वजह उसकी अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्या थी।
मोहन की आंखें झुक गईं।
उसे अपनी पत्नी की कही हर बात याद आने लगी।
उसने डॉक्टर से पूछा, “क्या इसका इलाज संभव है?”
डॉक्टर ने कहा, “कई मामलों में उपचार और सही सलाह से संभावना बेहतर हो सकती है। लेकिन सबसे जरूरी है कि पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ दें।”
घर लौटते समय मोहन पूरी तरह शांत था।
सुमन ने भी उससे कोई सवाल नहीं किया।
कुछ देर बाद मोहन ने गाड़ी रोक दी।
उसकी आंखों में आंसू थे।
“सुमन, मुझे माफ कर दो।”
सुमन ने उसकी तरफ देखा।
“किस बात के लिए?”
“सात साल तक तुम्हें दोष देता रहा। मां की हर बात मानता रहा। तुमने कितनी बार कहा कि मेरी भी जांच होनी चाहिए, लेकिन मैंने तुम्हें ही गलत समझा।”
सुमन की आंखें भर आईं।
मोहन ने कहा, “तुम्हें जिस दर्द से गुजरना पड़ा, उसमें सबसे बड़ा दोषी मैं हूं।”
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह सिर्फ इतना बोली, “मुझे बच्चा चाहिए, लेकिन उससे पहले मुझे अपना सम्मान चाहिए था।”
मोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अब तुम्हें कभी अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”
उधर बाबा के आश्रम की सच्चाई भी धीरे-धीरे सामने आने लगी। कुछ अन्य महिलाओं ने भी शिकायत की कि बाबा पूजा और चमत्कार के नाम पर उन्हें डराता और गलत तरीके से प्रभावित करता था।
सुमन ने भी साहस करके अपनी शिकायत दर्ज कराई।
जांच शुरू हुई तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। बाबा के पास कोई चमत्कारी शक्ति नहीं थी। वह लोगों के डर और मजबूरी का फायदा उठाता था।
आखिरकार उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई।
कमला देवी भी यह सब देखकर बदल गईं।
एक दिन उन्होंने सुमन के पास जाकर कहा, “बहू, मैंने तुम्हें बहुत कुछ कहा। मुझे लगता था कि घर की बहू ही बच्चे के लिए जिम्मेदार होती है। लेकिन मैं गलत थी।”
सुमन की आंखों में आंसू आ गए।
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “तुमने हमारे घर को टूटने से बचा लिया।”
समय बीतता गया।
मोहन ने अपना इलाज शुरू किया और सुमन ने भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार जारी रखा।
कुछ समय बाद डॉक्टर ने उन्हें खुशखबरी दी कि माता-पिता बनने की संभावना अब पहले से बेहतर है।
उस दिन सुमन की आंखों से आंसू निकल पड़े।
मोहन ने उसका हाथ थामकर कहा, “देखा, हमें किसी बाबा की जरूरत नहीं थी। हमें सिर्फ एक-दूसरे पर भरोसा करने की जरूरत थी।”
सुमन मुस्कुराई।
कई साल बाद उनके घर में बच्चे की किलकारी गूंजी।
कमला देवी ने नवजात बच्चे को गोद में उठाया और सुमन की तरफ देखकर कहा,
“जिसे मैंने कभी अभागिन कहा था, आज वही हमारे घर की सबसे बड़ी खुशियों की वजह है।”
सुमन ने बच्चे को अपनी गोद में लिया।
उसके चेहरे पर संतोष था।
उसे समझ आ चुका था कि किसी और के कहने से कोई औरत अधूरी नहीं हो जाती।
सीख: संतान न होना केवल महिला की जिम्मेदारी नहीं है। पति-पत्नी दोनों की जांच और सही चिकित्सकीय सलाह जरूरी है। किसी भी व्यक्ति के अंधविश्वास, डर या झूठे चमत्कार पर भरोसा करने के बजाय प्रमाणित डॉक्टर की सलाह लेना ही सही रास्ता है।

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