माँ की आखिरी चाबी

 

Emotional Indian daughter-in-law discovering an old letter and brass key in her late mother-in-law's room.


जिस दिन विमला चाची की तेरहवीं पूरी हुई, उसी दिन उनके कमरे की सफाई करते समय उनकी बहू नीलिमा को एक पुरानी कपड़े की थैली मिली।


थैली बहुत साधारण थी। उसके कोने पर हल्के धागों से दो अक्षर कढ़े हुए थे—“वी.दे.”


नीलिमा ने धीरे से थैली खोली।


अंदर कुछ पुराने कागज, मंदिर की सूखी हुई फूल-माला, एक छोटी-सी पीतल की चाबी और एक मुड़ा हुआ कागज रखा था।


नीलिमा ने कागज खोला।


उस पर विमला चाची की लिखावट थी—


“जिस दिन घर में मेरी जरूरत महसूस न हो, उस दिन यह चाबी नीलिमा को देना।”


नीलिमा कुछ पल तक उस कागज को देखती रही।


उसके हाथ कांपने लगे।


“माँजी… आपने यह सब कब लिखा था?”


कमरे में सन्नाटा था।


विमला चाची को गुजरे हुए तेरह दिन हो चुके थे।


लेकिन नीलिमा को ऐसा लग रहा था जैसे अभी दरवाजे से उनकी आवाज आएगी—


“बहू, मेरी चाय में चीनी मत डालना।”


और फिर कुछ पल बाद वही आवाज नरम होकर कहेगी—


“लेकिन अपनी चाय में डाल लेना। तू तो अभी जवान है।”


नीलिमा की आंखों में आंसू आ गए।


उसने चाबी अपनी हथेली में रख ली।


चाबी छोटी थी, लेकिन उस समय उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसमें अठारह साल का पूरा रिश्ता बंद हो।


अठारह साल पहले जब नीलिमा इस घर में बहू बनकर आई थी, तब उसे इस घर का हर नियम अजीब लगता था।


नीलिमा शहर में पली-बढ़ी थी।


उसने कॉलेज की पढ़ाई की थी और शादी के बाद भी बैंक की नौकरी जारी रखी थी।


विमला चाची छोटे कस्बे में पली-बढ़ी थीं।


उनके लिए घर का अनुशासन ही परिवार की पहचान था।


शादी के अगले दिन ही विमला चाची ने नीलिमा से कहा था—


“बहू, हमारे घर में कुछ बातें तुम्हें नई लगेंगी।”


नीलिमा ने मुस्कुराकर पूछा—


“कैसी बातें, माँजी?”


विमला चाची ने कहा—


“बड़ों के सामने आवाज धीमी रखना, खाने का समय सबके साथ रखना और घर के किसी काम को छोटा मत समझना।”


नीलिमा ने सिर हिलाया।


“जी माँजी।”


विमला चाची ने आगे कहा—


“लेकिन एक बात याद रखना। तुम्हारी नौकरी तुम्हारी अपनी पहचान है। उसे छोड़ने की जरूरत नहीं है।”


नीलिमा को यह सुनकर थोड़ी राहत मिली।


फिर भी उसे लगता था कि विमला चाची बहुत पुराने विचारों की हैं।


वह अक्सर घर के छोटे-छोटे कामों पर भी ध्यान देती थीं।


अगर नीलिमा सब्जी में नमक थोड़ा ज्यादा डाल देती तो विमला चाची कहतीं—


“बहू, नमक कम-ज्यादा हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन अगली बार ध्यान रखना।”


नीलिमा मन ही मन सोचती—


“हर चीज में नियम!”


कई बार वह नाराज भी हो जाती।


एक दिन बैंक से लौटते समय वह बहुत थकी हुई थी।


उसने अपना बैग रखा और सोफे पर बैठ गई।


विमला चाची रसोई से बाहर आईं।


“बहू, खाना लगा दूं?”


नीलिमा ने थकी आवाज में कहा—


“माँजी, आज बहुत थक गई हूं। दस मिनट बैठने दीजिए।”


विमला चाची ने उसकी ओर देखा।


फिर बोलीं—


“ठीक है। पहले पानी पी।”


नीलिमा ने हैरानी से पूछा—


“आप नाराज नहीं हैं?”


विमला चाची हंस पड़ीं।


“क्यों? तू मशीन है क्या?”


नीलिमा पहली बार खुलकर मुस्कुराई।


लेकिन उस समय उसे यह एहसास नहीं था कि यही छोटी-छोटी बातें आगे चलकर उसकी यादों का सबसे बड़ा हिस्सा बन जाएंगी।


कुछ महीनों बाद नीलिमा मां बनने वाली थी।


उसकी तबीयत बिगड़ने लगी।


एक रात अचानक उसे तेज दर्द हुआ।


अरुण घबरा गया।


“माँ, नीलिमा को अस्पताल ले जाना पड़ेगा।”


विमला चाची तुरंत उठ खड़ी हुईं।


“गाड़ी निकालो। मैं भी चलती हूं।”


नीलिमा ने कमजोर आवाज में कहा—


“माँजी, आप घर पर रहिए।”


विमला चाची ने उसका हाथ पकड़कर कहा—


“बहू, बच्चा तेरा है तो चिंता मेरी भी है।”


वह पूरी रात अस्पताल में नीलिमा के साथ बैठी रहीं।


सुबह नीलिमा ने बेटे को जन्म दिया।


अरुण की आंखों में खुशी के आंसू थे।


विमला चाची ने बच्चे को गोद में लिया और बोलीं—


“मेरे घर का चिराग आ गया।”


नीलिमा बिस्तर पर लेटी उन्हें देख रही थी।


उसके मन में पहली बार आया—


“शायद मैंने माँजी को गलत समझा है।”


लेकिन जिंदगी हमेशा एक ही रंग में नहीं रहती।


समय बीतता गया।


नीलिमा नौकरी और घर दोनों संभालती रही।


विमला चाची बच्चों की देखभाल करतीं।


कभी-कभी दोनों में मतभेद भी होते।


एक दिन नीलिमा ने कहा—


“माँजी, यश को हर बात पर डांटिए मत। वह अभी छोटा है।”


विमला चाची ने जवाब दिया—


“बहू, बच्चों को प्यार के साथ अनुशासन भी चाहिए।”


नीलिमा बोली—


“लेकिन बहुत ज्यादा रोकने से बच्चा डरने लगता है।”


विमला चाची कुछ नहीं बोलीं।


अगले दिन नीलिमा ने देखा कि विमला चाची यश के साथ बैठी उसे कहानी सुना रही थीं।


नीलिमा दरवाजे पर खड़ी सुनती रही।


विमला चाची कह रही थीं—


“गलती करने से डरना नहीं चाहिए। गलती छिपाने से डरना चाहिए।”


नीलिमा मुस्कुरा दी।


उसने मन ही मन कहा—


“माँजी सच में अलग हैं।”


कुछ वर्षों बाद उनकी बेटी आरोही बड़ी होने लगी।


आरोही पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।


बारहवीं के बाद उसे दूसरे शहर के एक अच्छे कॉलेज में प्रवेश मिला।


लेकिन अरुण चिंतित था।


एक दिन उसने कहा—


“माँ, मुझे लगता है आरोही को यहीं पढ़ा देना चाहिए।”


विमला चाची ने पूछा—


“क्यों?”


अरुण बोला—


“दूसरे शहर में लड़की अकेली कैसे रहेगी?”


विमला चाची कुछ देर बेटे को देखती रहीं।


फिर बोलीं—


“बेटा, चिंता लड़की के बाहर जाने की नहीं होनी चाहिए। चिंता यह होनी चाहिए कि वह जिस जगह जाएगी, वहां सुरक्षित और सम्मान से रहे।”


अरुण चुप हो गया।


विमला चाची ने कहा—


“अगर हम बेटे को अवसर दे सकते हैं, तो बेटी को क्यों नहीं?”


नीलिमा दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी।


उसके मन में अपनी सास के प्रति सम्मान और बढ़ गया।


आरोही दूसरे शहर चली गई।


जाने से पहले उसने दादी के पैर छुए।


विमला चाची ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—


“बहुत आगे जाना, लेकिन अपने लोगों को पीछे मत छोड़ना।”


आरोही ने कहा—


“दादी, मैं आपको कभी नहीं भूलूंगी।”


विमला चाची मुस्कुराईं।


“यही बात याद रखना।”


आरोही चली गई।


घर फिर से शांत हो गया।


लेकिन उसी समय विमला चाची की सेहत गिरने लगी।


पहले घुटनों में दर्द हुआ।


फिर कमजोरी बढ़ी।


फिर उन्हें चलने में सहारे की जरूरत पड़ने लगी।


नीलिमा ने उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।


एक दिन विमला चाची ने नीलिमा का हाथ पकड़कर कहा—


“बहू, तू बहुत कुछ करती है मेरे लिए।”


नीलिमा ने मुस्कुराकर कहा—


“माँजी, आपने भी तो मेरे लिए बहुत कुछ किया है।”


विमला चाची की आंखें भर आईं।


उन्होंने धीरे से कहा—


“मैंने तुझे कई बार समझाने के नाम पर परेशान किया।”


नीलिमा ने उनका हाथ दबाया।


“माँजी, रहने दीजिए।”


विमला चाची बोलीं—


“नहीं बहू। हर उम्र में इंसान को अपनी गलतियां समझनी चाहिए।”


फिर उन्होंने कहा—


“मेरी अलमारी में एक लाल डायरी है। उसे संभालकर रखना।”


नीलिमा ने पूछा—


“क्यों?”


विमला चाची ने कहा—


“अभी मत पूछ।”


कुछ ही दिनों बाद उनकी तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई।


घर के सभी लोग उनके आसपास थे।


विमला चाची ने नीलिमा को पास बुलाया।


“बहू…”


“जी माँजी।”


“अगर कभी लगे कि मैं तुझे समझ नहीं पाई, तो मुझे माफ कर देना।”


नीलिमा रोते हुए बोली—


“माँजी, ऐसी बातें मत कीजिए।”


विमला चाची ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“अब एक बात मान ले।”


“क्या माँजी?”


“मुझे सास मत समझना।”


नीलिमा की आंखों से आंसू बहने लगे।


“तो क्या समझूं?”


विमला चाची ने धीमे से कहा—


“माँ।”


और कुछ ही देर बाद उनकी सांसें थम गईं।


घर में रोने की आवाजें गूंज उठीं।


नीलिमा उनके पैरों के पास बैठकर फूट-फूटकर रोती रही।


उस समय उसे समझ नहीं आया कि इतने वर्षों में जिस महिला से वह कभी नाराज हुई, उसी के जाने का दर्द इतना गहरा क्यों है।


तेरह दिन बाद वही कमरा अब खाली था।


और उसी कमरे में नीलिमा के हाथ में वह छोटी-सी चाबी थी।


उसे नहीं पता था कि यह चाबी किस ताले की है।


लेकिन विमला चाची ने कहा था—


“जिस दिन घर में मेरी जरूरत महसूस न हो, उस दिन यह चाबी नीलिमा को देना।”


नीलिमा ने चाबी मुट्ठी में बंद की।


उसने तय किया—


“कल सुबह सबसे पहले देखूंगी कि यह चाबी किस चीज की है।”


लेकिन उसे क्या पता था कि उस छोटे से ताले के पीछे विमला चाची की जिंदगी का ऐसा सच छिपा है, जो नीलिमा की उनके प्रति पूरी सोच बदल देगा।



चाबी नीलिमा ने पूरी रात अपने सिरहाने रखी।


वह बार-बार उठती, चाबी को देखती और फिर विमला चाची की बातें याद करने लगती।


“जिस दिन घर में मेरी जरूरत महसूस न हो…”


यह बात आखिर उन्होंने क्यों कही थी?


नीलिमा के मन में सवालों का तूफान था।


अगले दिन उसने विमला चाची की अलमारी खोली।


ऊपर की दराज में उसे वही लाल डायरी दिखाई दी, जिसका जिक्र विमला चाची ने अपनी बीमारी के दिनों में किया था।


नीलिमा ने डायरी उठाई।


पहले पन्ने पर लिखा था—


“यह डायरी किसी शिकायत के लिए नहीं है। यह मेरी जिंदगी का हिसाब है।”


नीलिमा ने पन्ना पलटा।


पहली कुछ पंक्तियां पढ़कर ही उसकी आंखें नम हो गईं।


“मैं कम पढ़ी-लिखी हूं। शायद इसी वजह से मुझे हमेशा डर लगा कि मेरी बहू मुझसे ज्यादा समझदार निकलेगी और एक दिन मुझे इस घर में किसी की जरूरत नहीं रहेगी।”


नीलिमा की उंगलियां रुक गईं।


वह बुदबुदाई—


“माँजी… आपको ऐसा क्यों लगता था?”


अगले पन्ने पर लिखा था—


“जब नीलिमा पहली बार इस घर में आई, तो मुझे लगा कि यह लड़की मेरे बनाए नियमों को नहीं मानेगी। इसलिए मैंने उसे बहुत कुछ समझाया। लेकिन सच यह था कि मैं अपने नियमों से ज्यादा अपने डर को बचा रही थी।”


नीलिमा ने डायरी बंद कर दी।


कुछ देर वह चुप बैठी रही।


उसे अपनी शादी के शुरुआती दिन याद आने लगे।


उसे याद आया कि वह कितनी बार अपनी सास की बातों को ताने समझ लेती थी।


कितनी बार वह मन ही मन कहती थी—


“गांव में रहने वाली हैं, इन्हें दुनिया की समझ नहीं।”


लेकिन डायरी में आगे लिखा था—


“नीलिमा को नौकरी करते देखकर मुझे गर्व होता था। मैं कभी उसके सामने कह नहीं पाई। मुझे डर था कि अगर मैं ज्यादा तारीफ करूंगी तो लोग कहेंगे कि बहू ने सास को अपने बस में कर लिया।”


नीलिमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।


फिर आंखों से आंसू निकल पड़े।


अगले पन्ने पर लिखा था—


“जब नीलिमा पहली बार मां बनी, तब मैंने देखा कि वह कितनी मजबूत है। नौकरी, घर और बच्चे—सब संभालते हुए भी वह किसी से शिकायत नहीं करती थी।”


नीलिमा ने धीरे से कहा—


“माँजी, शिकायत तो मैं करती थी…”


उसे अपनी ही बात पर हल्की हंसी आ गई।


डायरी आगे बढ़ी।


“मुझे उसकी कई बातें पसंद नहीं थीं। लेकिन मुझे उसकी ईमानदारी पसंद थी। वह सामने से कहती थी कि उसे मेरी कोई बात अच्छी नहीं लगी। मुझे अच्छा नहीं लगता था, पर मन के अंदर मैं खुश होती थी कि मेरी बहू झूठ नहीं बोलती।”


नीलिमा के चेहरे पर भाव बदल गए।


विमला चाची के बारे में उसकी समझ जैसे हर पन्ने के साथ बदलती जा रही थी।


फिर उसे वह पन्ना मिला जहां आरोही का जिक्र था।


“आज मैंने बेटे से कहा कि बेटी को पढ़ने से मत रोकना। शायद मैंने अपने जीवन में जो खोया, वह मेरी पोती न खोए।”


नीलिमा की आंखों से आंसू बह निकले।


उसे वह दिन याद आ गया जब विमला चाची ने आरोही के लिए अपने पुराने गहने निकाल दिए थे।


उस समय नीलिमा ने सोचा था कि शायद सास को अपनी पोती से बहुत प्यार है।


लेकिन अब उसे पता चला कि उसके पीछे एक अधूरा सपना था।


विमला चाची ने कभी पढ़ाई पूरी नहीं की थी।


डायरी में लिखा था—


“मेरी शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी। मैं पढ़ना चाहती थी। लेकिन घरवालों ने कहा कि लड़की को इतना पढ़कर क्या करना है। मैं चुप हो गई।”


“जब मेरी पोती कॉलेज जाने लगी, तो मुझे लगा जैसे मैं भी उसके साथ पढ़ने जा रही हूं।”


नीलिमा ने डायरी अपने सीने से लगा ली।


उसने पहली बार अपनी सास को एक सास के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी लड़की के रूप में देखा, जिसके कुछ सपने परिस्थितियों के कारण अधूरे रह गए थे।


उसी समय दरवाजे पर आवाज हुई।


आरोही खड़ी थी।


“माँ, आप रो क्यों रही हैं?”


नीलिमा ने डायरी उसकी ओर बढ़ा दी।


“यह तुम्हारी दादी की डायरी है।”


आरोही ने डायरी खोली।


कुछ देर पढ़ने के बाद उसकी आंखें भी भर आईं।


आरोही ने कहा—


“माँ, दादी ने कभी हमें अपने बारे में इतना नहीं बताया।”


नीलिमा बोली—


“शायद वह अपनी कहानी किसी को बताना नहीं चाहती थीं।”


आरोही ने पूछा—


“फिर डायरी क्यों लिखी?”


नीलिमा ने कहा—


“शायद इसलिए कि कुछ बातें बोलने से आसान नहीं होतीं।”


दोनों कुछ देर चुप रहीं।


फिर नीलिमा को छोटी चाबी याद आई।


उसने चाबी निकालकर कहा—


“लेकिन अभी एक और चीज बाकी है।”


आरोही ने पूछा—


“क्या?”


नीलिमा ने कहा—


“यह चाबी।”


दोनों विमला चाची के कमरे में गईं।


अलमारी, संदूक और पुराने बक्से सब देखने के बाद भी कोई ताला नहीं मिला।


आखिर नीलिमा की नजर पलंग के नीचे रखे पुराने लकड़ी के संदूक पर पड़ी।


संदूक पर एक छोटा-सा ताला लगा था।


चाबी उसी ताले में फिट हो गई।


नीलिमा ने ताला खोला।


अंदर पुराने कपड़े, कुछ तस्वीरें, बच्चों की बचपन की चीजें और एक लिफाफा रखा था।


लिफाफे पर लिखा था—


“नीलिमा के लिए।”


नीलिमा ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला।


अंदर एक पत्र था।


“बहू,


अगर तू यह पत्र पढ़ रही है, तो इसका मतलब है कि मैं तेरे पास नहीं हूं।


मैं तुझसे एक बात कहना चाहती हूं।


मैंने जिंदगी भर घर को संभालने की कोशिश की। कभी सही किया, कभी गलत।


मुझे लगा था कि घर की बागडोर हाथ में रखना ही घर को बचाना है।


लेकिन तूने मुझे सिखाया कि घर बागडोर से नहीं, भरोसे से चलता है।


जब तू नौकरी करने लगी, मुझे डर लगा था कि तू घर से दूर हो जाएगी।


लेकिन तूने नौकरी के साथ घर को भी संभाला।


जब तूने मेरी कुछ बातों का विरोध किया, मुझे बुरा लगा।


बाद में समझ आया कि विरोध करने वाला हर इंसान दुश्मन नहीं होता।


कभी-कभी वही इंसान हमें हमारी गलती दिखाता है।


तूने मुझे बदलने की कोशिश नहीं की।


बस अपनी जिंदगी जीते हुए मुझे धीरे-धीरे बदल दिया।


इसके लिए मैं तुझे धन्यवाद कहना चाहती हूं।”


नीलिमा पत्र पढ़ते-पढ़ते रोने लगी।


आरोही ने पूछा—


“माँ, आगे क्या लिखा है?”


नीलिमा ने आंसू पोंछे और पढ़ना जारी रखा।


“और हां, बहू… उस चाबी का एक काम और है।


अगर कभी इस घर में मेरी वजह से किसी रिश्ते में दूरी आई हो, तो उसे मेरी आखिरी निशानी समझकर खत्म कर देना।


मेरे जाने के बाद इस घर में कोई पुराना नियम सिर्फ इसलिए मत निभाना कि मैंने निभाया था।


जो सही लगे, उसे रखना।


जो गलत लगे, उसे छोड़ देना।


यही मेरी आखिरी इच्छा है।”


नीलिमा ने पत्र नीचे रख दिया।


आरोही ने मां को गले लगा लिया।


तभी बाहर से अरुण की आवाज आई—


“नीलिमा, मां की चीजें मिल गईं?”


नीलिमा बाहर आई।


अरुण ने पूछा—


“क्या मिला?”


नीलिमा ने कहा—


“माँ की डायरी… और एक पत्र।”


अरुण कुछ पल चुप रहा।


फिर बोला—


“माँ ने मुझे कभी अपनी ये बातें नहीं बताईं।”


नीलिमा ने कहा—


“शायद वह आपसे नहीं कह पाईं।”


अरुण ने डायरी ली।


कुछ देर पढ़ने के बाद उसकी आंखें झुक गईं।


वह धीमे से बोला—


“मैंने भी मां को हमेशा मजबूत समझा। कभी पूछा ही नहीं कि वह अंदर से कैसी हैं।”


नीलिमा ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“हम सबने उन्हें अपने-अपने रिश्ते के नाम से देखा। किसी ने यह नहीं देखा कि वह भी एक इंसान थीं।”


तीनों चुप बैठे रहे।


लेकिन डायरी का आखिरी पन्ना अभी बाकी था।


नीलिमा ने उसे खोला।


उसमें सिर्फ एक वाक्य लिखा था—


“जिस दिन मेरे जाने के बाद मेरे घर के लोग एक-दूसरे को समझने लगें, उसी दिन समझना कि मैं सच में इस घर से गई नहीं हूं।”


नीलिमा ने डायरी बंद कर दी।


उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक अलग तरह की शांति थी।


उसे अब विमला चाची की आखिरी इच्छा पूरी करनी थी।


लेकिन उसे यह नहीं पता था कि उनकी आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए उसे अपने परिवार के सामने एक ऐसा फैसला लेना पड़ेगा, जिससे घर में फिर एक बड़ा विवाद खड़ा होने वाला था।



विमला चाची के जाने के बाद घर में उनकी चीजें बांटने की बात उठी।


कुछ रिश्तेदारों ने कहा—


“सोने के गहने बेटी को मिल जाने चाहिए।”


किसी ने कहा—


“पुराना घर तो बेटे के नाम होना चाहिए।”


किसी ने कहा—


“मां की चीजों का फैसला जल्दी कर लेना चाहिए।”


नीलिमा चुपचाप सब सुनती रही।


अरुण भी परेशान था।


एक रात उसने नीलिमा से कहा—


“समझ नहीं आ रहा क्या करूं।”


नीलिमा ने पूछा—


“किस बात को लेकर?”


अरुण बोला—


“मां ने कभी अपनी संपत्ति के बारे में मुझसे बात नहीं की।”


नीलिमा ने कहा—


“उन्होंने बात की है।”


अरुण ने चौंककर पूछा—


“क्या?”


नीलिमा ने लाल डायरी उसकी ओर बढ़ा दी।


“उन्होंने सब लिखा है।”


अरुण ने डायरी पढ़ी।


फिर नीलिमा ने वह पत्र भी उसके सामने रख दिया।


अरुण काफी देर तक कुछ नहीं बोला।


आखिर उसने कहा—


“मां चाहती थीं कि उनकी चीजों को लेकर हम भाई-बहन में कोई झगड़ा न हो।”


नीलिमा ने सिर हिलाया।


“हां।”


अरुण बोला—


“लेकिन यह घर?”


नीलिमा ने कहा—


“माँ ने इस घर के बारे में भी लिखा है।”


उसने डायरी का एक पन्ना खोला।


विमला चाची ने लिखा था—


“यह घर मेरे नाम से हो सकता है, लेकिन इसकी असली कीमत इसकी दीवारों में नहीं, इसमें बिताए रिश्तों में है। अगर मेरे जाने के बाद यह घर किसी को बांटने लगे, तो इसे संभालकर रखने का कोई अर्थ नहीं।”


अरुण ने पूछा—


“तो अब?”


नीलिमा ने शांत आवाज में कहा—


“घर रहेगा। लेकिन मां की इच्छा के अनुसार।”


“कैसे?”


“इस घर का एक हिस्सा बच्चों के लिए पढ़ने की जगह बनेगा।”


अरुण ने आश्चर्य से पूछा—


“क्या?”


नीलिमा बोली—


“माँ ने खुद लिखा था कि वह पढ़ नहीं पाईं। उन्हें हमेशा अफसोस रहा। उन्होंने कहा था कि अगर संभव हो तो घर में ऐसी जगह बनाना जहां कस्बे के बच्चों को पढ़ने के लिए जगह मिल सके।”


अरुण की आंखें भर आईं।


“मां ने मुझे यह कभी नहीं बताया।”


नीलिमा ने कहा—


“शायद इसलिए कि वह चाहती थीं कि तुम खुद समझो।”


कुछ दिनों बाद घर के एक बड़े कमरे को साफ कराया गया।


पुरानी अलमारियां हटाई गईं।


नई किताबें लाई गईं।


दीवार पर एक छोटा-सा बोर्ड लगाया गया—


“विमला अध्ययन कक्ष”


पहले दिन मोहल्ले के कुछ बच्चे आए।


एक गरीब परिवार की लड़की भी आई।


उसने नीलिमा से पूछा—


“आंटी, यहां पढ़ने के लिए पैसे लगेंगे?”


नीलिमा की आंखें भर आईं।


उसने कहा—


“नहीं बेटा। यहां सिर्फ मेहनत चाहिए।”


लड़की मुस्कुराई।


वही मुस्कान देखकर नीलिमा को आरोही का बचपन याद आ गया।


शायद विमला चाची का अधूरा सपना अब किसी और बच्ची के जीवन में पूरा होने जा रहा था।


कुछ महीने बीते।


आरोही नौकरी में आगे बढ़ रही थी।


यश भी पढ़ाई में अच्छा कर रहा था।


घर में पहले की तरह हलचल होने लगी।


लेकिन एक चीज हमेशा बदल चुकी थी।


नीलिमा अब घर के पुराने नियमों को सिर्फ इसलिए नहीं मानती थी क्योंकि वे पुराने थे।


और जो बातें सच में परिवार को जोड़ती थीं, उन्हें उसने दिल से अपना लिया था।


एक दिन अरुण ने कहा—


“नीलिमा, मां होतीं तो बहुत खुश होतीं।”


नीलिमा मुस्कुराई।


“मुझे भी यही लगता है।”


अरुण ने पूछा—


“तुम्हें मां की सबसे ज्यादा कौन-सी बात याद आती है?”


नीलिमा कुछ पल सोचती रही।


फिर बोली—


“जब मैं थककर घर आती थी और वह बिना कुछ पूछे पानी दे देती थीं।”


अरुण हंस पड़ा।


“मुझे लगा था तुम उनके नियम बताओगी।”


नीलिमा भी मुस्कुरा दी।


“नियम तो बहुत थे। लेकिन आखिर में याद वही रहता है, जहां प्यार था।”


उसी रात नीलिमा विमला चाची के कमरे में गई।


कमरा अब भी वैसा ही था।


उनकी पुरानी कुर्सी।


चश्मा।


माला।


दवा की खाली शीशी।


और पलंग के पास रखा छोटा-सा दीपक।


नीलिमा ने दीपक जलाया।


फिर धीमे से बोली—


“माँजी, आपकी चाबी मैंने संभालकर रखी है।”


कुछ पल वह चुप रही।


फिर मुस्कुराकर बोली—


“लेकिन अब समझ गई हूं कि वह चाबी किसी ताले की नहीं थी।”


उसकी आंखों में आंसू आ गए।


“वह मेरे दिल की चाबी थी।”


उसी समय पीछे से आरोही की आवाज आई—


“माँ।”


नीलिमा ने पीछे मुड़कर देखा।


आरोही हाथ में एक छोटी-सी किताब लिए खड़ी थी।


उसने कहा—


“माँ, अध्ययन कक्ष में आज एक बच्ची ने पहली बार पूरी कविता याद करके सुनाई।”


नीलिमा मुस्कुरा दी।


“अच्छा?”


आरोही बोली—


“हां। उसने जाते-जाते दादी की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—‘दादी, मैं भी पढ़-लिखकर बड़ी बनूंगी।’”


नीलिमा की आंखों से आंसू निकल पड़े।


उसने तस्वीर की ओर देखा।


उसे ऐसा लगा जैसे विमला चाची की तस्वीर के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान हो।


नीलिमा ने हाथ जोड़कर कहा—


“माँजी, आपका सपना अब सिर्फ आरोही का नहीं रहा। अब बहुत सारी बेटियों का है।”


हवा का हल्का झोंका आया।


दीपक की लौ कुछ पल डगमगाई और फिर स्थिर हो गई।


नीलिमा ने आंखें बंद कर लीं।


उसे विमला चाची की आखिरी बात याद आई—


“जिस दिन मेरे जाने के बाद मेरे घर के लोग एक-दूसरे को समझने लगें, उसी दिन समझना कि मैं सच में इस घर से गई नहीं हूं।”


नीलिमा ने उस रात पहली बार महसूस किया कि किसी अपने के जाने का मतलब हमेशा उसका खत्म हो जाना नहीं होता।


कुछ लोग चले जाते हैं।


लेकिन उनकी बातें हमारे फैसलों में रह जाती हैं।


उनका प्यार हमारे व्यवहार में रह जाता है।


उनकी अधूरी इच्छाएं किसी और के सपनों का रास्ता बन जाती हैं।


और उनकी गलतियां हमें यह सिखा जाती हैं कि अगली पीढ़ी को वही गलती नहीं दोहरानी चाहिए।


विमला चाची ने जिंदगी भर घर को संभाला था।


जाते-जाते उन्होंने नीलिमा को घर की चाबी नहीं, बल्कि घर को समझने की समझ दे दी थी।


नीलिमा ने लाल डायरी को वापस उसी संदूक में रखा।


चाबी उसके पास रही।


अब वह चाबी किसी ताले को खोलने के लिए नहीं थी।


वह उसे हर बार यह याद दिलाने के लिए थी कि—


रिश्तों में सबसे जरूरी यह नहीं कि कौन सही था और कौन गलत। सबसे जरूरी यह है कि किसी के जाने से पहले हम उसे समझ पाए या नहीं।


क्योंकि कई बार इंसान के जाने के बाद उसकी कही हुई एक छोटी-सी बात पूरी जिंदगी हमारे भीतर गूंजती रहती है।


और शायद यही किसी रिश्ते की सबसे बड़ी विरासत होती है।



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