विदेश से लौटकर माँ ने जाना रिश्तों का मोल
“अरे बहू, जरा देख तो! तुम्हारे ससुर जी ने विदेश जाकर क्या कारनामा कर दिया है!”
कमला देवी ने दरवाजे पर खड़े अपने पति शंकरलाल की ओर देखते हुए कहा।
बहू नंदिनी रसोई से बाहर आई और अपने ससुर को ऊपर से नीचे तक देखने लगी।
शंकरलाल के हाथ में नया चमचमाता हुआ जैकेट था, आँखों पर काला चश्मा लगा था और पैरों में सफेद स्पोर्ट्स शूज थे।
नंदिनी अपनी हँसी रोक नहीं पाई।
“पिताजी, ये चश्मा तो आप पर बहुत अच्छा लग रहा है।”
शंकरलाल ने गर्व से चश्मा थोड़ा ऊपर किया और बोले, “देखा कमला! मैंने कहा था न, विदेश जाकर आदमी जवान हो जाता है।”
कमला देवी ने तुरंत ताना मारा, “जवान नहीं, नटखट हो जाते हैं।”
पास खड़ा उनका बेटा संजय हँस पड़ा।
“पिताजी, आपने तो कमाल कर दिया। चार महीने अमेरिका में रहकर पूरा अंदाज बदल गया।”
शंकरलाल ने बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तुम्हारी माँ को भी बदलना था, लेकिन इन्होंने वहाँ जाकर भी अपनी साड़ी, पूजा और रसोई नहीं छोड़ी।”
कमला देवी ने तुरंत जवाब दिया, “और छोड़ती भी क्यों? अमेरिका गई थी, अपनी पहचान बेचने नहीं।”
नंदिनी मुस्कुराते हुए बोली, “माँजी, आप तो बिल्कुल नहीं बदलीं।”
कमला देवी ने गर्व से कहा, “क्यों बदलूँ बहू? जगह बदलने से संस्कार थोड़े बदलते हैं।”
शंकरलाल ने धीरे से कहा, “संस्कार नहीं बदले, लेकिन वहाँ की कॉफी रोज पीती थीं।”
कमला देवी ने पति को घूरकर देखा।
“वो कॉफी नहीं थी, मजबूरी थी। रोशनी सुबह-सुबह बना देती थी।”
संजय ने पूछा, “माँ, भाभी कैसी हैं?”
कमला देवी का चेहरा अचानक शांत हो गया।
“बहुत अच्छी है तुम्हारी भाभी।”
फिर उन्होंने अपने हाथ में पकड़ा छोटा सा बैग मेज पर रखा।
“हमारे लिए इतनी चीजें खरीद लाई कि गिनते-गिनते थक जाओगे।”
नंदिनी ने बैग खोलते हुए पूछा, “मेरे लिए भी कुछ है?”
कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा, “तेरे लिए सबसे पहले है।”
उन्होंने अंदर से एक सुंदर शॉल निकाली।
नंदिनी ने शॉल हाथ में लिया तो उसकी आँखें चमक उठीं।
“माँजी, ये मेरे लिए?”
कमला देवी बोलीं, “हाँ। रोशनी ने कहा था कि नंदिनी को हल्के रंग पसंद हैं।”
नंदिनी कुछ पल शॉल को देखती रही।
“भाभी ने मेरी पसंद याद रखी?”
“हाँ बहू।”
कमला देवी ने प्यार से कहा, “वहाँ रहते हुए मुझे एक बात बहुत समझ आई।”
नंदिनी ने पूछा, “क्या?”
कमला देवी ने धीरे से कहा, “अपने लोग दूर हों तो छोटी-छोटी बातें भी बहुत बड़ी लगने लगती हैं।”
संजय चुप हो गया।
चार महीने पहले जब उसके माता-पिता अमेरिका गए थे, तब घर जैसे अचानक खाली हो गया था।
शंकरलाल और कमला देवी पहली बार इतने लंबे समय के लिए विदेश गए थे।
उनका बड़ा बेटा आदित्य अमेरिका में नौकरी करता था। उसकी पत्नी रोशनी भी वहीं रहती थी। बहुत आग्रह करने के बाद दोनों ने अपने माता-पिता को कुछ महीनों के लिए अपने पास बुलाया था।
संजय और नंदिनी भारत में रहते थे।
कमला देवी जाते समय नंदिनी से बोली थीं, “बहू, घर का ध्यान रखना।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा था, “माँजी, आप चिंता मत कीजिए। आप आराम से जाइए।”
लेकिन जाने से पहले कमला देवी ने घर की हर चीज समझाई थी।
“तुलसी को रोज पानी देना।”
“जी माँजी।”
“शंकरलाल की दवा समय पर देना।”
“जी।”
“और मेरी अलमारी मत खोलना।”
नंदिनी हँस पड़ी थी।
“माँजी, मैं आपकी अलमारी क्यों खोलूँगी?”
कमला देवी ने कहा था, “बस कह रही हूँ।”
नंदिनी ने उस दिन हँसते हुए उनकी बात मान ली थी।
लेकिन उनके जाने के बाद उसे पता चला कि घर में केवल काम नहीं, उनकी कमी भी रह गई थी।
संजय कई बार खाना खाते हुए चुप हो जाता।
एक दिन नंदिनी ने पूछा था, “क्या हुआ?”
संजय ने कहा था, “माँ होतीं तो आज ये सब्जी जरूर बनातीं।”
नंदिनी ने उसी दिन कमला देवी को फोन किया था।
“माँजी, संजय को आपकी बनाई लौकी याद आ रही है।”
उधर से कमला देवी की हँसी सुनाई दी थी।
“उसे कहना, बहू भी कम नहीं बनाती।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा था, “माँजी, आपके हाथ का स्वाद कहाँ से लाऊँ?”
कमला देवी ने पहली बार उसे बेटी की तरह समझाते हुए कहा था, “स्वाद मसालों से नहीं, प्यार से आता है।”
नंदिनी ने उस दिन से संजय के लिए वही सब्जी बनानी शुरू कर दी थी।
लेकिन उसे क्या पता था कि अमेरिका में कमला देवी के मन में भी घर की ऐसी ही यादें जमा हो रही थीं।
विदेश से लौटने के बाद दो दिन तक घर में खूब रौनक रही।
रिश्तेदार मिलने आते रहे।
कभी अमेरिका की बातें होतीं, कभी वहाँ की ठंड की, कभी बड़े-बड़े बाजारों की।
शंकरलाल हर किसी को अपना नया चश्मा दिखाते।
कमला देवी अपनी बहू रोशनी की तारीफ करतीं।
“बहुत सेवा की उसने हमारी।”
एक दिन पड़ोस की विमला चाची मिलने आईं।
उन्होंने पूछा, “कमला, अमेरिका में मजा आया?”
कमला देवी ने कहा, “मजा भी आया और बहुत कुछ सीखने को भी मिला।”
विमला चाची ने हँसते हुए पूछा, “क्या सीखा?”
कमला देवी कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं, “ये कि बेटा चाहे कितना भी दूर चला जाए, माँ का मन वहीं अटका रहता है जहाँ उसके बच्चे रहते हैं।”
शंकरलाल ने मजाक में कहा, “और मैंने ये सीखा कि मेरी पत्नी को विदेश में भी मंदिर ढूँढना आता है।”
कमला देवी हँस पड़ीं।
“आपने क्या सीखा?”
शंकरलाल बोले, “मैंने सीखा कि पत्नी की बात न मानो तो विदेश में भी चैन नहीं मिलता।”
सब हँस पड़े।
लेकिन उसी रात कमला देवी को तेज सिरदर्द हुआ।
नंदिनी पानी लेकर उनके कमरे में पहुँची।
“माँजी, दवा ले लीजिए।”
कमला देवी ने दवा हाथ में लेकर कहा, “बहू, ये सिरदर्द शायद थकान का है।”
शंकरलाल ने तुरंत कहा, “थकान का नहीं है। रास्ते भर दर्द था।”
कमला देवी झल्ला गईं।
“आपको मेरी हर बात सबको बतानी जरूरी है?”
शंकरलाल ने शांत स्वर में कहा, “तुम्हें दर्द हो और मैं चुप रहूँ, ये मुझसे नहीं होगा।”
नंदिनी मुस्कुराई।
“पिताजी सही कह रहे हैं।”
कमला देवी ने बहू की ओर देखा।
“तुम भी इनके साथ?”
नंदिनी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मैं तो आपकी तरफ हूँ माँजी, लेकिन दवा तो आपको लेनी पड़ेगी।”
कमला देवी ने दवा खा ली।
शंकरलाल ने तकिया ठीक किया।
“अब लेट जाओ।”
कमला देवी ने कहा, “मैं बच्ची नहीं हूँ।”
शंकरलाल बोले, “मुझे पता है। लेकिन मेरी पत्नी हो, इसलिए चिंता करता हूँ।”
कमला देवी ने कुछ नहीं कहा।
बस धीरे से आँखें बंद कर लीं।
अगले दिन नंदिनी ने देखा कि कमला देवी अपनी पुरानी संदूकची खोलकर बैठी थीं।
अंदर पुराने कपड़े, कुछ तस्वीरें और एक छोटा सा डिब्बा था।
नंदिनी ने पूछा, “माँजी, कुछ ढूँढ रही हैं?”
कमला देवी ने कहा, “हाँ बहू। तेरे लिए कुछ रखना था।”
उन्होंने डिब्बे से एक पुरानी सोने की अंगूठी निकाली।
नंदिनी घबरा गई।
“माँजी, ये मैं नहीं ले सकती।”
कमला देवी ने कहा, “क्यों?”
“ये आपकी है।”
“अब मेरी कहाँ रही?”
“लेकिन…”
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जब मैं शादी करके इस घर में आई थी, तब मेरी सास ने मुझे ये अंगूठी दी थी।”
नंदिनी ध्यान से सुनने लगी।
“उन्होंने कहा था कि जब तुम्हें लगे कि तुम्हारी बहू बेटी जैसी हो गई है, तब उसे दे देना।”
नंदिनी की आँखें भर आईं।
“माँजी…”
कमला देवी बोलीं, “अमेरिका जाने से पहले तक मैं सोचती थी कि बहू को बहू की तरह ही रखना चाहिए।”
नंदिनी चुप रही।
कमला देवी ने उसकी हथेली में अंगूठी रख दी।
“लेकिन वहाँ जाकर समझ आया कि रिश्ते नाम से नहीं, व्यवहार से बनते हैं।”
नंदिनी की आँखों से आँसू निकल आए।
“माँजी, मैंने तो कभी आपको अपनी माँ से अलग समझा ही नहीं।”
कमला देवी ने उसे गले लगा लिया।
“इसीलिए तो दे रही हूँ।”
दरवाजे के पास खड़े शंकरलाल यह सब देख रहे थे।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “तो आखिर अंगूठी मिल ही गई।”
दोनों ने उनकी तरफ देखा।
कमला देवी ने पूछा, “आपको पता था?”
शंकरलाल ने कहा, “हाँ। अमेरिका जाने से पहले तुमने मुझसे कहा था कि नंदिनी को यह अंगूठी दोगी।”
नंदिनी ने आश्चर्य से पूछा, “माँजी ने आपको बताया था?”
शंकरलाल बोले, “तुम्हारी माँ जैसी सास है। राज छिपा ही नहीं सकती।”
कमला देवी ने तुरंत कहा, “अच्छा जी! अब ज्यादा बोलिएगा तो अंगूठी वापस ले लूँगी।”
नंदिनी हँस पड़ी।
“माँजी, अब ये मेरी है।”
शंकरलाल बोले, “देखा? अभी से तुम्हारी बहू ने कब्जा कर लिया।”
कमला देवी ने कहा, “आप दोनों मिलकर मुझे ही घर से निकालोगे।”
तीनों हँसने लगे।
लेकिन उसी सप्ताह एक ऐसी खबर आई जिसने घर की खुशी को अचानक चिंता में बदल दिया।
आदित्य का फोन आया।
नंदिनी बैठक में थी।
कमला देवी ने फोन उठाया।
“हाँ बेटा, बोल।”
उधर से आदित्य की आवाज आई।
“माँ, आप ठीक हो?”
“हाँ बेटा।”
“पिताजी कैसे हैं?”
शंकरलाल ने दूर से कहा, “हम बिल्कुल ठीक हैं।”
आदित्य कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला, “माँ, मैं आपसे एक जरूरी बात करना चाहता हूँ।”
कमला देवी ने पूछा, “क्या हुआ?”
आदित्य ने धीमे स्वर में कहा, “कंपनी में मेरी नौकरी को लेकर कुछ बदलाव हुए हैं।”
कमला देवी का चेहरा गंभीर हो गया।
“सब ठीक तो है?”
“हाँ माँ, अभी ठीक है। लेकिन अगले छह महीने थोड़े मुश्किल रहेंगे।”
कमला देवी ने तुरंत कहा, “तुम चिंता मत करो।”
आदित्य ने कहा, “माँ, मैं चाहता हूँ कि आप और पिताजी कुछ समय के लिए हमारे पास आ जाओ।”
कमला देवी ने शंकरलाल की ओर देखा।
शंकरलाल चुप थे।
नंदिनी भी दूर खड़ी सब सुन रही थी।
आदित्य आगे बोला, “यहाँ रहोगे तो मुझे भी सहारा रहेगा।”
कमला देवी ने पूछा, “लेकिन बेटा, तुम्हारी परेशानी में हम क्या करेंगे?”
आदित्य ने कहा, “बस मेरे साथ रहना।”
कमला देवी की आँखें भर आईं।
“बेटा, माँ-बाप बच्चों की परेशानी में बोझ नहीं होते।”
फोन कटने के बाद कमरे में कुछ देर शांति रही।
नंदिनी ने धीरे से पूछा, “माँजी, आप फिर अमेरिका जाएँगी?”
कमला देवी ने उसकी ओर देखा।
फिर बोलीं, “अगर बेटे को हमारी जरूरत है तो जाना चाहिए।”
नंदिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“हाँ माँजी।”
लेकिन उसकी आवाज में छिपी उदासी शंकरलाल से नहीं छिपी।
उस रात शंकरलाल ने अपनी पत्नी से कहा, “तुम जाना चाहती हो?”
कमला देवी ने कहा, “बेटे के पास जाने की इच्छा किस माँ की नहीं होती?”
“मैंने इच्छा नहीं पूछी।”
कमला देवी चुप रहीं।
शंकरलाल ने फिर पूछा, “मन क्या कहता है?”
कमला देवी की आँखें नम हो गईं।
“मन कहता है कि बेटा भी अपना है और ये घर भी अपना है।”
शंकरलाल ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“तो फिर फैसला मन से नहीं, जरूरत से करेंगे।”
कुछ दिनों बाद आदित्य का दोबारा फोन आया।
इस बार उसकी आवाज पहले से ज्यादा शांत थी।
“माँ, अब स्थिति संभल गई है।”
कमला देवी ने राहत की साँस ली।
“सच बेटा?”
“हाँ माँ। और मैंने एक बात तय की है।”
“क्या?”
“मैं अगले महीने भारत आ रहा हूँ।”
कमला देवी के चेहरे पर चमक आ गई।
“रोशनी भी आएगी?”
“हाँ माँ। हम दोनों आएँगे।”
शंकरलाल ने तुरंत कहा, “और तुम्हारे आने पर तुम्हारी माँ तुम्हें अपनी बनाई कचौड़ी खिलाएगी।”
आदित्य हँस पड़ा।
“पिताजी, मुझे पता है। माँ के हाथ की कचौड़ी के लिए ही तो आ रहा हूँ।”
फोन कट गया।
कमला देवी कुछ देर फोन को देखती रहीं।
नंदिनी ने पूछा, “माँजी, खुश हैं?”
कमला देवी बोलीं, “बहुत।”
फिर उन्होंने नंदिनी को पास बुलाया।
“बहू, मैंने अमेरिका में एक बात और सीखी।”
“क्या?”
“बच्चे चाहे जहाँ रहें, उन्हें घर की जरूरत रहती है।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा, “और माता-पिता को?”
कमला देवी ने उसकी ओर देखा।
“माता-पिता को भी बच्चों की जरूरत रहती है… लेकिन उससे ज्यादा उन्हें यह एहसास चाहिए कि उनके बच्चे उन्हें जरूरत नहीं, अपना समझते हैं।”
नंदिनी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“माँजी, आपको कभी अकेला नहीं पड़ने देंगे।”
कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“इसीलिए तो मैं कहती हूँ, विदेश घूमने के लिए अच्छा है… लेकिन घर बसाने के लिए अपने लोग चाहिए।”
पीछे खड़े शंकरलाल ने मुस्कुराकर कहा, “और पत्नी चाहिए।”
कमला देवी ने पलटकर कहा, “आपको तो हर बात में पत्नी चाहिए।”
शंकरलाल बोले, “चालीस साल से यही तो मेरी सबसे बड़ी जरूरत है।”
कमला देवी हँस पड़ीं।
नंदिनी भी हँसने लगी।
कुछ ही देर में घर के दरवाजे पर आदित्य और रोशनी की गाड़ी आकर रुकी।
कमला देवी दौड़कर बाहर गईं।
रोशनी ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए।
कमला देवी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
“बहू, कैसी हो?”
रोशनी की आँखों में आँसू थे।
“माँ, आपके बिना घर बहुत खाली लगता था।”
कमला देवी ने कहा, “अब मैं कहीं नहीं जा रही।”
रोशनी मुस्कुराई।
“क्यों?”
कमला देवी ने पीछे खड़ी नंदिनी और शंकरलाल की ओर देखा।
“क्योंकि अब समझ आ गया है कि मेरा घर सिर्फ एक जगह नहीं है। मेरे बच्चे जहाँ हैं, मेरा घर वहीं है।”
शंकरलाल ने हँसते हुए कहा, “तो फिर मेरा घर कहाँ है?”
कमला देवी ने उनकी ओर देखकर कहा, “जहाँ मैं हूँ।”
शंकरलाल मुस्कुराए।
“बस, यही जवाब सुनना था।”
आदित्य ने पिता के कंधे पर हाथ रखा।
“पिताजी, आपने माँ को इतना बदल कैसे दिया?”
शंकरलाल ने कहा, “मैंने नहीं बदला बेटा। जिंदगी ने समझाया है।”
कमला देवी ने धीमे से कहा, “और प्यार ने समझाया है।”
नंदिनी ने उनकी ओर देखा।
उसकी उँगली में वही पुरानी सोने की अंगूठी चमक रही थी।
कमला देवी की नजर उस अंगूठी पर पड़ी तो उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने नंदिनी का हाथ अपने हाथ में लिया।
“बहू, इसे संभालकर रखना।”
नंदिनी ने पूछा, “अंगूठी को?”
कमला देवी मुस्कुराईं।
“नहीं… इसके साथ जो रिश्ता दिया है, उसे।”
नंदिनी ने सिर झुकाकर कहा, “माँजी, वो रिश्ता हमेशा संभालकर रखूँगी।”
शंकरलाल ने हँसते हुए कहा, “अब कोई मुझे बताएगा कि चाय कौन बनाएगा?”
आदित्य बोला, “पिताजी, आज मैं बनाऊँगा।”
शंकरलाल ने आश्चर्य से पूछा, “तुम्हें चाय बनानी आती है?”
आदित्य हँसते हुए बोला, “अमेरिका में रहकर बहुत कुछ सीखा है।”
कमला देवी ने तुरंत कहा, “लेकिन मेरे जैसी चाय बनाना मत सीखना। उसमें अदरक ज्यादा और चीनी कम रहती है।”
नंदिनी ने हँसते हुए कहा, “माँजी, फिर आपकी चाय कौन पिएगा?”
शंकरलाल ने हाथ उठाकर कहा, “मैं!”
कमला देवी ने उन्हें देखा।
“आपको तो मेरी हर चीज पसंद है।”
शंकरलाल ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
“क्योंकि चीजें नहीं… तुम्हारा साथ पसंद है।”
कमला देवी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।
फिर मुस्कुराकर उनकी ओर बढ़ गईं।
घर के बाकी लोग उन्हें देखते रहे।
विदेश की चमक, महँगे कपड़े, बड़े-बड़े बाजार और आराम की जिंदगी…
सब अपनी जगह थे।
लेकिन उस छोटे से घर की चौखट पर खड़े होकर कमला देवी ने मन ही मन एक बात स्वीकार कर ली थी—
दुनिया में घूमने के लिए हजारों खूबसूरत जगहें हो सकती हैं, लेकिन लौटकर सुकून वहीं मिलता है जहाँ कोई बिना कहे पूछ ले—“थक गई हो? बैठो, मैं चाय बना देता हूँ।”
और शायद यही रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती है—
सच्चा अपनापन दूरी से कम नहीं होता, बल्कि दूरी के बाद उसकी कीमत और ज्यादा समझ आती है।

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