जिस माँ को बेटे ने घर से निकाला

 

An emotional Indian family illustration showing an elderly mother in a maroon saree holding her son's childhood sweater while her son, daughter-in-law, and young grandson stand nearby in a beautifully lit living room.


“माँ, अब यह घर आपका नहीं रहा। मैंने आपके रहने का इंतजाम वृद्धाश्रम में कर दिया है। आप वहाँ आराम से रहिए, यहाँ हमारे पास पहले ही बहुत परेशानियाँ हैं।”


बेटे के मुँह से निकले ये शब्द सुनकर सावित्री देवी के हाथ काँपने लगे। जिस बेटे को उन्होंने अपनी गोद में खिलाया था, जिसकी खुशी के लिए अपनी हर इच्छा दबा दी थी, आज वही बेटा उन्हें अपने घर में रखने के लिए तैयार नहीं था।


सावित्री देवी ने अपने आँसू रोकते हुए बहू की तरफ देखा। शायद उसे उनसे कुछ कहना होगा, शायद वह अपने पति को समझाएगी कि माँ को इस तरह घर से निकालना ठीक नहीं है। लेकिन बहू ने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।


सावित्री देवी ने अपने बेटे का हाथ पकड़कर पूछा, “बेटा, क्या मैंने तुम्हें इतना बड़ा करने में कोई गलती कर दी? क्या तुम्हारी माँ अब तुम्हारे लिए बोझ बन गई है?”


बेटा कुछ पल चुप रहा, फिर उसने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, “माँ, आप बात को समझने की कोशिश कीजिए। अब मेरी भी अपनी जिंदगी है, अपनी पत्नी है, बच्चे हैं। मैं हर समय आपकी जिम्मेदारी नहीं उठा सकता।”


यह सुनकर सावित्री देवी की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपने पुराने संदूक की तरफ देखा, जिसमें उनके पति की तस्वीर, बेटे के बचपन के कपड़े और कुछ पुरानी यादें रखी थीं।


लेकिन बेटे को यह नहीं मालूम था कि जिस माँ को वह आज अपने घर से विदा कर रहा है, उसी माँ ने कभी अपनी खुशियों को बेचकर उसकी जिंदगी सँवारी थी। उसे यह भी नहीं पता था कि इस घर से निकलने के बाद उसकी माँ के साथ ऐसा कुछ होने वाला था, जिसका पछतावा उसे जीवन भर रहने वाला था।


यह कहानी है एक ऐसी माँ की, जिसने अपने बेटे को दुनिया की हर खुशी दी, लेकिन बदले में उसे सिर्फ एक सवाल मिला—क्या माँ होना सचमुच इतना बड़ा अपराध है?



सावित्री देवी एक साधारण परिवार की महिला थीं। उनके पति हरिनारायण एक छोटी-सी दुकान चलाते थे। आमदनी ज्यादा नहीं थी, लेकिन दोनों अपने जीवन से खुश थे। उनका एक ही बेटा था, जिसका नाम अमित था।


सावित्री देवी की दुनिया अमित से शुरू होती थी और उसी पर खत्म हो जाती थी। अमित के जन्म के बाद उन्होंने अपने लिए कुछ सोचना ही छोड़ दिया था।


जब अमित छोटा था, तब वह अपनी माँ की साड़ी का पल्लू पकड़कर पूरे घर में घूमता रहता था।


“माँ, आप मुझे छोड़कर कहीं मत जाना,” अमित अक्सर अपनी माँ से कहता था।


सावित्री देवी उसे सीने से लगाकर जवाब देती थीं, “पगले, माँ कभी अपने बच्चे को छोड़कर जाती है क्या? तू चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, मैं हमेशा तेरे साथ रहूँगी।”


अमित हँसकर उनके गले में बाँहें डाल देता था।


हरिनारायण यह देखकर मुस्कुराते और कहते, “सावित्री, तुमने इसे बहुत सिर पर चढ़ा रखा है। कल को बड़ा होकर हमारी बात नहीं मानेगा।”


सावित्री देवी हँसते हुए जवाब देतीं, “आप देख लेना, हमारा अमित बड़ा होकर हमारा नाम रोशन करेगा। हम दोनों को किसी चीज की कमी नहीं होने देगा।”


हरिनारायण अपनी पत्नी की बात सुनकर खुश हो जाते थे।


लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की उम्मीदों के अनुसार नहीं चलती।


जब अमित दसवीं कक्षा में पढ़ता था, तब हरिनारायण की दुकान में घाटा होने लगा। उधार बढ़ता गया और घर चलाना मुश्किल हो गया। अमित की पढ़ाई का खर्च निकालना भी कठिन हो गया।


एक दिन अमित स्कूल से लौटकर उदास बैठा था।


सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “क्या हुआ बेटा? आज इतने परेशान क्यों हो?”


अमित ने धीमी आवाज में कहा, “माँ, स्कूल में सबके पास नई किताबें हैं। मेरी किताबें पुरानी हैं। मास्टर जी ने कहा है कि अगले महीने तक फीस जमा नहीं हुई, तो परीक्षा में बैठने नहीं देंगे।”


सावित्री देवी का दिल बैठ गया।


उन्होंने बेटे को समझाते हुए कहा, “तू चिंता मत कर। तेरी फीस भी जमा होगी और किताबें भी आएँगी। तू बस मन लगाकर पढ़ाई कर।”


अमित ने माँ की तरफ देखते हुए पूछा, “लेकिन माँ, पैसे कहाँ से आएँगे?”


सावित्री देवी ने मुस्कुराने की कोशिश की।


“पैसों की चिंता तू क्यों करता है? तेरी माँ अभी जिंदा है।”


उस रात सावित्री देवी देर तक जागती रहीं। घर में इतना पैसा नहीं था कि बेटे की फीस जमा हो सके। उनके पास शादी के समय मिले सोने के छोटे-से झुमके थे। वे झुमके उन्हें बहुत प्यारे थे, क्योंकि वे उनकी माँ की आखिरी निशानी थे।


अगले दिन उन्होंने चुपचाप उन झुमकों को सुनार के पास गिरवी रख दिया।


जब वह पैसे लेकर घर लौटीं, तो हरिनारायण ने पूछ लिया, “सावित्री, ये पैसे कहाँ से आए?”


सावित्री देवी ने बात छिपाने की कोशिश की, लेकिन पति के बार-बार पूछने पर उन्हें सच बताना पड़ा।


हरिनारायण की आँखें भर आईं।


“तुमने अपनी माँ की आखिरी निशानी भी गिरवी रख दी? मैं कैसा पति हूँ, जो तुम्हारे गहने तक नहीं बचा पाया?”


सावित्री देवी ने उनके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “ऐसी बातें मत कीजिए। गहने दोबारा बन सकते हैं, लेकिन बेटे का भविष्य दोबारा नहीं बन सकता। मैं चाहती हूँ कि हमारा अमित पढ़-लिखकर इतना बड़ा आदमी बने कि उसे जिंदगी में कभी किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।”


हरिनारायण ने पत्नी को सीने से लगा लिया।


दोनों की आँखों में आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं के पीछे बेटे के उज्ज्वल भविष्य का सपना भी था।



समय बीतता गया। अमित ने मेहनत से पढ़ाई पूरी की और शहर में नौकरी करने लगा। उसकी पहली तनख्वाह आई, तो वह मिठाई का डिब्बा लेकर घर पहुँचा।


“माँ, देखो! आज मेरी पहली कमाई आई है।”


सावित्री देवी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने मिठाई का टुकड़ा बेटे के मुँह में डाला और फिर भगवान के सामने हाथ जोड़ दिए।


“भगवान, मेरे बेटे को हमेशा खुश रखना। इसे इतनी तरक्की देना कि इसे कभी दुख न देखना पड़े।”


अमित ने अपनी माँ को गले लगाते हुए कहा, “माँ, अब आपको किसी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब आपकी सारी जिम्मेदारी मेरी है।”


सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए। बस इतना चाहता है मेरा मन कि तू हमेशा अच्छा इंसान बना रहे।”


अमित ने हँसते हुए कहा, “आप देखना माँ, मैं आपको कभी कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा।”


कुछ साल बाद अमित की शादी नेहा नाम की लड़की से हो गई। नेहा पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली थी। शादी के शुरुआती दिनों में वह सावित्री देवी से ठीक व्यवहार करती थी।


सावित्री देवी भी उसे अपनी बेटी की तरह मानती थीं।


एक दिन नेहा रसोई में काम कर रही थी। सावित्री देवी ने उसके पास जाकर कहा, “बहू, तुम रहने दो। मैं खाना बना देती हूँ। तुम थक गई होगी।”


नेहा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “नहीं माँ जी, मैं कर लूँगी।”


सावित्री देवी ने प्यार से कहा, “मुझे माँ जी मत कहा करो। मुझे माँ कहोगी, तो अच्छा लगेगा।”


नेहा ने उनके पैर छूते हुए कहा, “ठीक है माँ।”


यह सुनकर सावित्री देवी की आँखों में खुशी चमक उठी। उन्हें लगा कि उनके घर में बेटी आ गई है।


लेकिन उन्हें नहीं पता था कि समय के साथ इस रिश्ते की मिठास कम होने वाली है।



शादी के दो साल बाद अमित और नेहा के घर एक बेटे का जन्म हुआ। बच्चे का नाम आरव रखा गया।


आरव के आने के बाद सावित्री देवी की जिंदगी जैसे फिर से खिल उठी। वह अपने पोते को घंटों गोद में लेकर बैठी रहतीं। उसके लिए कपड़े सिलतीं, उसे कहानियाँ सुनातीं और रात में रोने पर उसे चुप करातीं।


नेहा जब थक जाती, तो सावित्री देवी बच्चे को अपने पास रख लेतीं।


“बहू, तू आराम कर ले। बच्चे को मैं संभाल लूँगी,” वह अक्सर कहतीं।


नेहा जवाब देती, “माँ, आप भी तो बूढ़ी हो रही हैं। आपको भी आराम करना चाहिए।”


सावित्री देवी हँसकर कहतीं, “बच्चों को संभालने में कैसी थकान? अपने पोते को देखकर तो मेरी सारी थकान दूर हो जाती है।”


धीरे-धीरे अमित की नौकरी में तरक्की होने लगी। उसने पुराने घर को नया बनवाया। घर में महँगे फर्नीचर आए, नई गाड़ी आई और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हो गई।


लेकिन इसी के साथ अमित का व्यवहार भी बदलने लगा।


अब उसे अपनी माँ की छोटी-छोटी बातें भी बुरी लगने लगीं।


एक दिन सावित्री देवी ने अमित से कहा, “बेटा, आरव को मोबाइल कम दिया करो। अभी उसकी उम्र खेलने और पढ़ने की है।”


अमित ने झुँझलाकर जवाब दिया, “माँ, आजकल बच्चों को ऐसे ही बड़ा किया जाता है। आप पुराने जमाने की बातें मत किया कीजिए।”


सावित्री देवी चुप हो गईं।


कुछ दिनों बाद उन्होंने नेहा से कहा, “बहू, अमित आजकल बहुत परेशान रहता है। तुम उसे थोड़ा समझाया करो कि घर में सबके साथ प्यार से बात किया करे।”


नेहा ने बिना उनकी तरफ देखे जवाब दिया, “माँ, अमित की नौकरी में बहुत तनाव है। आप हर बात को दिल पर मत लिया कीजिए।”


सावित्री देवी ने महसूस किया कि अब उनके शब्दों की अहमियत पहले जैसी नहीं रही।


जिस घर में कभी उनकी राय के बिना कोई फैसला नहीं होता था, वहाँ अब उन्हें अपनी बात कहने से पहले भी सोचना पड़ता था।


फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उन्हें लगता था कि शायद जिम्मेदारियाँ बढ़ने के कारण बेटा ऐसा व्यवहार करने लगा है।


वह अपने मन को समझा लेतीं कि आखिर अमित उनका ही बेटा है। एक दिन उसे अपनी माँ का प्यार जरूर समझ आएगा।



कुछ समय बाद सावित्री देवी के घुटनों में तेज दर्द रहने लगा। डॉक्टर ने उन्हें नियमित दवा लेने और ज्यादा चलने-फिरने से बचने की सलाह दी।


एक दिन उन्होंने अमित से कहा, “बेटा, डॉक्टर ने कुछ जाँच करवाने को कहा है। क्या तुम मुझे अस्पताल ले जा सकोगे?”


अमित उस समय लैपटॉप पर काम कर रहा था।


उसने बिना उनकी तरफ देखे कहा, “माँ, आज मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है। आप नेहा के साथ चली जाइए।”


सावित्री देवी ने धीरे से कहा, “बहू को भी आरव के स्कूल जाना है। मैंने सोचा था कि तुम साथ चलोगे, तो अच्छा रहेगा।”


अमित ने नाराज होकर जवाब दिया, “माँ, मैं हर समय आपके साथ नहीं रह सकता। आपको अपनी छोटी-छोटी बातों के लिए मुझ पर निर्भर रहना बंद करना होगा।”


ये शब्द सावित्री देवी के दिल में तीर की तरह लगे।


उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस धीरे-धीरे अपने कमरे में चली गईं।


नेहा ने उनकी बात सुन ली थी। वह उनके कमरे में आई और बोली, “माँ, आप बुरा मत मानिए। अमित पर काम का बहुत दबाव है।”


सावित्री देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मैं बुरा नहीं मानती, बहू। मैं जानती हूँ कि वह व्यस्त रहता है। बस कभी-कभी मन करता है कि बेटा मेरे पास बैठकर दो बातें कर ले।”


नेहा कुछ देर चुप रही, फिर अपने काम में लग गई।


उस रात सावित्री देवी ने अपने पति की तस्वीर के सामने बैठकर कहा, “देखिए जी, हमारा अमित कितना बड़ा आदमी बन गया है। उसके पास सब कुछ है। बस अब उसके पास अपनी माँ के लिए थोड़ा-सा समय भी नहीं बचा।”


तस्वीर से कोई जवाब नहीं आया।


कमरे में केवल सावित्री देवी की सिसकियाँ गूँजती रहीं।



समय के साथ घर में छोटी-छोटी बातों पर तनाव बढ़ने लगा। सावित्री देवी को अब हर बात में अपनी गलती दिखाई जाने लगी।


कभी वह आरव को ज्यादा लाड़ करने के लिए टोक दी जातीं, तो कभी रसोई में कोई चीज अपनी जगह से हटाने पर उन्हें सुनना पड़ता।


एक दिन नेहा की कुछ सहेलियाँ घर आईं। सावित्री देवी उनके लिए चाय बनाने रसोई में गईं, लेकिन घुटनों के दर्द के कारण उनके हाथ से चाय का कप गिर गया।


आवाज सुनकर नेहा दौड़कर आई।


“माँ जी, आपसे एक काम ठीक से नहीं हो सकता? अब मुझे ही सब साफ करना पड़ेगा।”


सावित्री देवी घबरा गईं।


“माफ कर दे, बहू। हाथ काँप गया था। मैं अभी साफ कर देती हूँ।”


नेहा ने नाराज होकर कहा, “आप रहने दीजिए। मैं कर लूँगी। लेकिन आपको भी समझना चाहिए कि हर काम में दूसरों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है।”


सावित्री देवी चुपचाप अपने कमरे में चली गईं।


शाम को अमित घर लौटा, तो नेहा ने उससे सारी बात बताई। उसने यह भी कहा कि घर में उसकी निजता नहीं बची है और वह हर समय अपनी सास की देखभाल करते-करते परेशान हो जाती है।


अमित ने अपनी पत्नी को समझाने के बजाय माँ को ही बुला लिया।


“माँ, हमें आपसे एक जरूरी बात करनी है,” अमित ने गंभीर स्वर में कहा।


सावित्री देवी उसके सामने बैठ गईं।


“बोल बेटा, क्या बात है?”


अमित ने कहा, “माँ, आप अब पहले की तरह अपना काम नहीं कर पातीं। नेहा पर भी घर और बच्चे की जिम्मेदारी है। हम दोनों नौकरी करते हैं। ऐसे में आपकी देखभाल करना हमारे लिए मुश्किल हो रहा है।”


सावित्री देवी ने हैरानी से पूछा, “तो बेटा, तुम क्या चाहते हो?”


अमित ने कुछ पल रुककर कहा, “मैंने आपके लिए एक वृद्धाश्रम में बात की है। वहाँ आपकी उम्र के कई लोग रहते हैं। आपकी देखभाल भी हो जाएगी और आपको अकेलापन भी नहीं लगेगा।”


सावित्री देवी को लगा जैसे किसी ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खींच ली हो।


उन्होंने काँपती आवाज में पूछा, “तू मुझे अपने घर से भेज देगा, अमित?”


अमित ने नजरें चुराते हुए कहा, “माँ, इसे घर से भेजना मत समझिए। यह आपके भले के लिए है।”


सावित्री देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।


“बेटा, जब तू छोटा था और रातभर रोता था, तब मैं भी रातभर जागती थी। जब तुझे बुखार होता था, तो मैं तुझे सीने से लगाकर बैठी रहती थी। जब तेरी फीस भरने के पैसे नहीं थे, तब मैंने अपने गहने गिरवी रख दिए थे। मैंने कभी नहीं सोचा कि तू मुझ पर बोझ है। फिर आज मैं तेरे लिए बोझ कैसे बन गई?”


अमित असहज हो गया।


उसने कठोर बनने की कोशिश करते हुए कहा, “माँ, पुरानी बातों को बार-बार याद करने से कुछ नहीं होगा। हर इंसान को अपनी जिंदगी जीने का हक है।”


सावित्री देवी ने आँसू पोंछे और कहा, “बिल्कुल बेटा। तुझे भी अपनी जिंदगी जीने का हक है। लेकिन क्या उस जिंदगी में तेरी माँ के लिए एक छोटा-सा कोना भी नहीं बचा?”


अमित के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।


नेहा दूर खड़ी सब सुन रही थी, लेकिन उसने भी कुछ नहीं कहा।


आखिरकार सावित्री देवी ने अपने बेटे से केवल इतना कहा, “ठीक है बेटा। अगर मेरे जाने से तुम्हारे घर में शांति रहती है, तो मैं चली जाऊँगी। लेकिन एक बात याद रखना, माँ का घर से जाना आसान होता है, माँ की कमी का पूरा होना नहीं।”


अमित ने उनकी बात अनसुनी कर दी।



अगले दिन सावित्री देवी ने अपना पुराना संदूक खोला। उसमें कुछ साड़ियाँ, पति की तस्वीर, पूजा की एक छोटी पुस्तक और अमित के बचपन की चीजें रखी थीं।


उन्होंने अपने बेटे के बचपन का एक छोटा-सा स्वेटर निकाला। यह वही स्वेटर था, जिसे उन्होंने अपने हाथों से बुना था।


स्वेटर को सीने से लगाकर वह बहुत देर तक रोती रहीं।


फिर उन्होंने अमित को आवाज दी।


“बेटा, मेरे पास तुम्हारे लिए एक आखिरी बात है।”


अमित उनके पास आकर खड़ा हो गया।


“क्या हुआ माँ?”


सावित्री देवी ने पूछा, “क्या मैं जाने से पहले आरव से मिल सकती हूँ?”


अमित ने कहा, “वह स्कूल गया है। शाम को मिल लेना।”


सावित्री देवी ने धीरे से सिर हिलाया।


शाम को जब आरव स्कूल से लौटा, तो दादी को सामान बाँधते देखकर हैरान रह गया।


“दादी, आप कहाँ जा रही हैं?”


सावित्री देवी ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।


“बेटा, मैं कुछ दिनों के लिए दूसरी जगह रहने जा रही हूँ।”


आरव ने मासूमियत से पूछा, “आप वापस कब आएँगी?”


सावित्री देवी की आँखें भर आईं।


उन्होंने उसके माथे को चूमते हुए कहा, “जब तुम्हारे पापा को मेरी याद आएगी, तब शायद।”


आरव ने तुरंत अपने पिता की तरफ देखा।


“पापा, दादी को कहीं मत भेजो। मैं उनके साथ सोऊँगा। मैं उन्हें परेशान नहीं करूँगा।”


अमित ने बेटे को समझाते हुए कहा, “बेटा, दादी वहाँ खुश रहेंगी। तुम चिंता मत करो।”


आरव ने मासूम सवाल किया, “लेकिन पापा, जब मैं बीमार होता हूँ, तो दादी मेरे पास बैठती हैं। जब मुझे डर लगता है, तो दादी कहानी सुनाती हैं। फिर जब दादी को आपकी जरूरत है, तो आप उनके पास क्यों नहीं बैठते?”


अमित कुछ पल के लिए चुप हो गया।


उसके पास बेटे के सवाल का जवाब नहीं था।


लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभालते हुए कहा, “आरव, बड़ों की बातें बड़ों को समझने दो।”


सावित्री देवी ने अपने पोते को आखिरी बार गले लगाया और उसके हाथ में एक छोटी-सी लकड़ी की गाड़ी रख दी, जिससे अमित बचपन में खेला करता था।


“बेटा, इसे संभालकर रखना। यह तुम्हारे पापा के बचपन की निशानी है।”


आरव ने गाड़ी पकड़कर पूछा, “दादी, क्या मैं आपसे मिलने आ सकता हूँ?”


“बिल्कुल बेटा। जब भी तुम्हारा मन करे, आ जाना।”


यह कहते हुए सावित्री देवी ने अपने आँसू छिपा लिए।


उन्हें क्या पता था कि यह वादा निभाना इतना मुश्किल हो जाएगा।



अमित अपनी माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आया। वहाँ एक छोटा-सा कमरा था, जिसमें दो पलंग और एक अलमारी रखी थी।


वृद्धाश्रम की देखभाल करने वाली महिला का नाम मीरा था। उसने सावित्री देवी का सामान कमरे में रखवाया और प्यार से पूछा, “माँ जी, आपको किसी चीज की जरूरत हो, तो मुझे बता दीजिएगा।”


सावित्री देवी ने कहा, “बेटी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस अगर कभी मेरा बेटा मिलने आए, तो मुझे बता देना।”


मीरा ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “आप चिंता मत कीजिए। यहाँ सब आपके अपने हैं।”


सावित्री देवी हल्का-सा मुस्कुराईं।


लेकिन उनके मन में एक ही सवाल था—क्या सचमुच कोई अनजान इंसान अपने बन सकता है, जब अपना ही बेटा पराया हो जाए?


दिन गुजरने लगे। वृद्धाश्रम में कई बुजुर्ग रहते थे। किसी का बेटा विदेश में था, किसी की बेटी दूसरे शहर में, तो किसी को परिवार ने पूरी तरह छोड़ दिया था।


वहाँ रहने वाले एक बुजुर्ग, गोपाल बाबू, अक्सर सावित्री देवी के पास बैठते थे।


एक दिन उन्होंने पूछा, “बहन जी, आपका बेटा मिलने आता है?”


सावित्री देवी ने जवाब दिया, “अभी उसे काम से फुर्सत नहीं मिलती। आएगा तो जरूर।”


गोपाल बाबू ने उनकी तरफ देखा। वह इस जवाब का मतलब समझते थे, क्योंकि वह खुद भी कई वर्षों से अपने बेटे का इंतजार कर रहे थे।


उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “हम माँ-बाप अपने बच्चों की व्यस्तता को समझते-समझते कब बूढ़े हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता।”


सावित्री देवी की आँखें भर आईं।


उन्होंने कहा, “गोपाल जी, मैंने कभी अपने बेटे से धन-दौलत नहीं माँगी। मुझे तो बस इतना चाहिए था कि वह मेरे पास बैठकर दो बातें कर ले।”


गोपाल बाबू ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “यही तो सबसे बड़ी दौलत है, बहन जी। लेकिन इसका मूल्य बहुत से लोग तब समझते हैं, जब इसे खो देते हैं।”


सावित्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


वह रोज दरवाजे की तरफ देखतीं। हर गाड़ी की आवाज सुनकर उन्हें लगता कि शायद अमित आया है। जब कोई दूसरा व्यक्ति निकलता, तो वह चुपचाप अपने कमरे में लौट जातीं।


कई सप्ताह बीत गए, लेकिन अमित नहीं आया।


एक दिन मीरा उनके पास बैठी थी। उसने देखा कि सावित्री देवी अपने पुराने संदूक से एक कॉपी निकालकर कुछ लिख रही हैं।


मीरा ने पूछा, “माँ जी, इसमें क्या लिख रही हैं?”


सावित्री देवी ने कॉपी बंद करते हुए कहा, “अपने बेटे के नाम कुछ बातें लिख रही हूँ। जब मैं उसके सामने होती हूँ, तो वह मेरी बात नहीं सुनता। सोचा, शायद कभी इन पन्नों को पढ़ ले।”


मीरा की आँखें नम हो गईं।


उसने कहा, “माँ जी, आप ऐसा मत सोचिए। आपको अभी बहुत जीना है।”


सावित्री देवी मुस्कुराईं।


“बेटी, मैं जीना चाहती हूँ। मैं अपने पोते को बड़ा होते देखना चाहती हूँ। लेकिन माँ का दिल भी अजीब होता है। वह उस इंसान का इंतजार करता रहता है, जो उसे भूल चुका होता है।”



कई महीने बीत गए। अमित अपने काम और परिवार में व्यस्त रहा। कभी-कभी आरव दादी के बारे में पूछता, तो वह कह देता कि दादी ठीक हैं और वहाँ खुश हैं।


एक दिन स्कूल में आरव को परिवार पर निबंध लिखने के लिए कहा गया। उसने अपनी कॉपी में लिखा—


“मेरे परिवार में मेरे पापा, मम्मी और दादी हैं। मेरी दादी मुझे बहुत प्यार करती हैं। वह मेरे साथ खेलती हैं और मुझे कहानियाँ सुनाती हैं। लेकिन अब वह हमारे साथ नहीं रहतीं। पापा कहते हैं कि दादी वहाँ खुश हैं, लेकिन मुझे लगता है कि दादी हमारे घर को याद करती होंगी। जब मैं बड़ा होऊँगा, तो दादी को अपने पास रखूँगा।”


अगले दिन उसकी अध्यापिका ने निबंध पढ़कर उसे प्यार से पूछा, “बेटा, तुम्हारी दादी कहाँ रहती हैं?”


आरव ने वृद्धाश्रम का नाम बताया, क्योंकि उसने वह नाम अपने पिता को फोन पर बात करते हुए सुना था।


अध्यापिका ने उससे कहा, “तुम्हारी दादी से मिलना चाहोगे?”


आरव ने तुरंत जवाब दिया, “हाँ मैडम। मैं उनसे बहुत प्यार करता हूँ।”


अध्यापिका ने स्कूल के नियमों के अनुसार उसके माता-पिता से संपर्क करने की कोशिश की। जब अमित से बात हुई, तो उसने व्यस्तता के कारण खुद आने में असमर्थता जताई। लेकिन उसने अनुमति दे दी कि स्कूल की अध्यापिका और आरव के साथ परिवार का एक परिचित वृद्धाश्रम जा सकता है।


उस सप्ताहांत आरव अपनी अध्यापिका के साथ वृद्धाश्रम पहुँचा।


सावित्री देवी अपने कमरे में बैठी थीं, जब मीरा ने आकर कहा, “माँ जी, आपसे मिलने कोई आया है।”


सावित्री देवी ने उत्सुकता से पूछा, “मेरा अमित आया है क्या?”


मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप खुद चलकर देख लीजिए।”


सावित्री देवी धीरे-धीरे बाहर आईं। सामने आरव खड़ा था।


“दादी!”


आरव दौड़कर उनकी बाँहों में समा गया।


सावित्री देवी ने उसे सीने से लगा लिया। उनके आँसू रुक ही नहीं रहे थे।


“मेरा बच्चा! तू यहाँ कैसे आया?”


आरव ने उनका चेहरा पकड़कर कहा, “दादी, मैं आपको लेने आया हूँ। आप मेरे साथ घर चलो।”


सावित्री देवी का दिल भर आया।


उन्होंने प्यार से कहा, “बेटा, मैं तेरे पापा से पूछे बिना कैसे चल सकती हूँ?”


आरव ने मासूमियत से जवाब दिया, “दादी, घर पापा का ही नहीं है। मेरा भी है। और आप मेरी दादी हो। आपको मेरे साथ रहने का हक है।”


सावित्री देवी ने उसे फिर से गले लगा लिया।


उस दिन आरव ने उनके साथ खाना खाया, उनसे कहानियाँ सुनीं और जाते समय उनसे वादा किया कि वह फिर मिलने आएगा।


लेकिन जब वह घर लौटा और उसने अपने पिता को सब बताया, तो अमित नाराज हो गया।


“आरव, तुम्हें बिना बताए वहाँ नहीं जाना चाहिए था। तुम्हें समझना होगा कि हर बात तुम्हारी इच्छा से नहीं हो सकती।”


आरव ने पहली बार अपने पिता की आँखों में आँखें डालकर कहा, “पापा, आप कहते हैं कि दादी वहाँ खुश हैं। लेकिन जब मैंने उन्हें देखा, तो वह रो रही थीं। अगर वह खुश हैं, तो मुझे देखकर इतना क्यों रोईं?”


अमित के चेहरे पर कोई जवाब नहीं था।


आरव ने आगे कहा, “पापा, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और आप बूढ़े हो जाओगे, तब क्या मैं भी आपको किसी दूसरे घर में भेज दूँ?”


अमित ने गुस्से में कहा, “बकवास मत करो!”


आरव डरकर चुप हो गया।


लेकिन उसके सवाल ने अमित के मन में पहली बार एक ऐसी हलचल पैदा कर दी, जिसे वह चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था।



कुछ दिनों बाद वृद्धाश्रम से अमित के पास फोन आया। सावित्री देवी की तबीयत खराब हो गई थी। उन्हें तेज बुखार था और कमजोरी भी बहुत बढ़ गई थी।


मीरा ने फोन पर कहा, “अमित जी, आपकी माँ की तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर ने जाँच करवाने को कहा है। आप आकर उनसे मिल लीजिए।”


अमित ने कहा, “मैं कोशिश करता हूँ। आज काम बहुत है, लेकिन देखता हूँ कि कब आ सकता हूँ।”


फोन रखने के बाद वह फिर अपने काम में लग गया।


शाम तक भी वह वृद्धाश्रम नहीं पहुँचा।


अगले दिन आरव ने अपने पिता से पूछा, “पापा, क्या हम दादी को देखने चलेंगे?”


अमित ने जवाब दिया, “बेटा, मैंने कहा ना, मैं व्यस्त हूँ।”


आरव ने उदास होकर कहा, “पापा, जब मुझे बुखार होता है, तो आप मेरा हाथ पकड़कर डॉक्टर के पास ले जाते हैं। दादी भी तो आपकी माँ हैं। क्या उन्हें बुखार होने पर आपकी जरूरत नहीं होती?”


अमित ने बेटे की तरफ देखा। उसे लगा जैसे आरव के शब्दों में उसकी अपनी माँ की आवाज सुनाई दे रही हो।


लेकिन उसने फिर भी अपनी गलती स्वीकार नहीं की।


उसी सप्ताह अमित के घर वृद्धाश्रम का एक कर्मचारी आया। उसके हाथ में सावित्री देवी की कॉपी और एक लिफाफा था।


कर्मचारी ने कहा, “सावित्री जी ने यह कॉपी आपको देने के लिए कहा था। वह कुछ दिनों से इसे लिख रही थीं।”


अमित ने कॉपी ले ली।


कर्मचारी के जाने के बाद उसने पहला पन्ना खोला। उस पर लिखा था—


“मेरे बेटे अमित के नाम।


बेटा, मुझे नहीं पता कि तू मेरी ये बातें कभी पढ़ेगा या नहीं। मैं तुझसे नाराज नहीं हूँ। माँ अपने बच्चे से कितनी देर नाराज रह सकती है? तूने मुझे वृद्धाश्रम भेज दिया, लेकिन मैंने तेरे बचपन की एक भी याद अपने दिल से नहीं निकाली।


मुझे आज भी याद है, जब तू पहली बार स्कूल गया था और दरवाजे पर खड़े होकर रोने लगा था। तू कह रहा था कि माँ, मेरे साथ चलो। उस दिन मेरा मन भी तेरे साथ जाने का था, लेकिन मैंने तुझे समझाया कि पढ़ाई करना जरूरी है।


आज तू बड़ा हो गया है। तेरे पास अपना परिवार है, अपना घर है और बहुत सारी जिम्मेदारियाँ हैं। मैं तेरी जिंदगी में दखल नहीं देना चाहती।


लेकिन बेटा, एक बात पूछना चाहती हूँ।


जब तू छोटा था और रात में डरकर उठ जाता था, तो क्या मैंने कभी तुझसे कहा था कि मुझे भी सोना है, इसलिए तू चुप हो जा?


जब तू बीमार होता था, तो क्या मैंने कभी कहा था कि मेरे पास समय नहीं है?


जब तेरे पास फीस भरने के पैसे नहीं थे, तो क्या मैंने कभी कहा था कि तेरी पढ़ाई मेरी जिम्मेदारी नहीं है?


नहीं बेटा। क्योंकि तू मेरा बच्चा था।


आज मैं बूढ़ी हो गई हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं, मेरे घुटने दुखते हैं और मेरी आँखें कमजोर हो गई हैं। मैं पहले की तरह काम नहीं कर सकती। लेकिन मेरा दिल आज भी वही है, जो तेरे बचपन में था।


मुझे महँगा खाना नहीं चाहिए, न बड़ा कमरा चाहिए। मुझे बस इतना चाहिए कि तू कभी मेरे पास बैठकर पूछ ले—माँ, तुम्हें किसी चीज की जरूरत तो नहीं?


अगर तू यह भी नहीं कर सकता, तो मैं तुझे मजबूर नहीं करूँगी।


मैं बस इतना चाहती हूँ कि जब तेरा बेटा बड़ा हो, तो उसे यह मत सिखाना कि बूढ़े माँ-बाप बोझ होते हैं। उसे यह सिखाना कि माँ-बाप को सम्मान देना इंसानियत है, कोई एहसान नहीं।


तेरी माँ,


सावित्री।”


कॉपी पढ़ते-पढ़ते अमित की आँखों से आँसू गिरने लगे।


उसने दूसरा पन्ना खोला। उसमें आरव के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं—


“मेरे प्यारे आरव,


जब तू छोटा था, तो तुझे गोद में उठाकर मैं सोचती थी कि काश, समय यहीं रुक जाए। तू बड़ा होगा, तो अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाएगा। यही जिंदगी है।


लेकिन अगर कभी तेरे पापा और तेरी दादी के बीच कोई गलतफहमी हो जाए, तो तू अपने पापा से नफरत मत करना। वह बुरा इंसान नहीं है। शायद वह यह भूल गया है कि माँ का दिल कैसा होता है।


तू बड़ा होकर चाहे कितना भी सफल बनना, लेकिन अपने घर में किसी के आँसू की वजह मत बनना।


दादी तुझे बहुत प्यार करती है।”


अमित के हाथ से कॉपी छूटकर जमीन पर गिर गई।


उसके मन में माँ की सारी यादें घूमने लगीं। उसे अपना बचपन याद आया, माँ के हाथ का खाना याद आया, वह रात याद आई जब माँ ने अपनी आखिरी निशानी गिरवी रखकर उसकी फीस भरी थी।


वह फूट-फूटकर रो पड़ा।


नेहा कमरे में आई और उसे रोते देखकर पूछा, “क्या हुआ अमित? तुम रो क्यों रहे हो?”


अमित ने कॉपी उसकी तरफ बढ़ा दी।


“नेहा, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। जिस माँ ने मेरे लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, मैंने उसी माँ को अपने घर से निकाल दिया।”


नेहा ने कॉपी पढ़ी। उसकी आँखें भी नम हो गईं।


कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा, “अमित, गलती हम दोनों से हुई है। माँ जी ने कभी हमसे कुछ माँगा ही नहीं। हम अपनी परेशानियों में इतने उलझ गए कि उनका अकेलापन देख ही नहीं पाए।”


अमित ने तुरंत कहा, “मुझे अभी माँ के पास जाना है।”


इस बार उसने काम का बहाना नहीं बनाया।



अमित और नेहा जल्दी से वृद्धाश्रम पहुँचे। आरव भी उनके साथ था।


मीरा उन्हें देखकर उनके पास आई। उसके चेहरे पर चिंता थी।


अमित ने घबराकर पूछा, “मेरी माँ कहाँ हैं? उनकी तबीयत कैसी है?”


मीरा ने बताया, “डॉक्टर ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया है। उनकी हालत कमजोर है। आप लोग सीधे अस्पताल चले जाइए।”


अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।


वह बिना देर किए अस्पताल पहुँचा। सावित्री देवी बिस्तर पर लेटी थीं। उनके चेहरे पर कमजोरी थी, लेकिन आँखें खुली हुई थीं।


अमित माँ के पास जाकर उनके हाथ पकड़कर रो पड़ा।


“माँ, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। तुम मेरे साथ घर चलो। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”


सावित्री देवी ने अपने बेटे की तरफ देखा। उनकी आँखों में न गुस्सा था, न शिकायत।


उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “बेटा, तू आ गया?”


अमित ने रोते हुए कहा, “हाँ माँ, मैं आ गया। अब आपको कहीं नहीं जाना है। आपका घर आपका इंतजार कर रहा है।”


सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “रो मत बेटा। तू आया, यही मेरे लिए बहुत है।”


नेहा उनके पैरों के पास बैठ गई।


“माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने भी आपका दिल दुखाया है। मुझे अपनी गलती समझने में बहुत देर हो गई।”


सावित्री देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“बहू, रिश्तों में गलती हो जाती है। लेकिन अगर इंसान समय रहते अपनी गलती समझ ले, तो रिश्ते फिर से सँभल सकते हैं।”


आरव ने दादी का हाथ पकड़कर कहा, “दादी, अब आप हमारे साथ चलोगी ना? मैं आपको रोज कहानी सुनाने के लिए कहूँगा।”


सावित्री देवी हल्का-सा मुस्कुराईं।


“हाँ बेटा, अब मैं तेरे साथ ही रहूँगी।”


अमित को लगा कि शायद भगवान ने उसे अपनी गलती सुधारने का मौका दे दिया है।


लेकिन जिंदगी ने अभी उसके लिए एक और परीक्षा रखी थी।


डॉक्टर ने अमित को बाहर बुलाया और गंभीर आवाज में कहा, “आपकी माँ बहुत कमजोर हो चुकी हैं। उनकी उम्र और मौजूदा हालत को देखते हुए हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अगले कुछ घंटे बहुत महत्वपूर्ण हैं।”


अमित की आँखों के सामने अँधेरा छा गया।


वह वापस कमरे में आया और माँ के पास बैठ गया।


“माँ, मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया है। मुझे एक मौका दे दो। मैं तुम्हारी सारी सेवा करूँगा। मैं तुम्हें फिर कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”


सावित्री देवी ने धीरे से उसका हाथ दबाया।


“बेटा, जिंदगी किसी के लिए रुकती नहीं है। तू अपने परिवार को प्यार देना। आरव को अच्छे संस्कार देना। और अपनी पत्नी का भी साथ निभाना। बस इतना याद रखना कि घर दीवारों से नहीं, एक-दूसरे की परवाह से बनता है।”


अमित रोते हुए बोला, “माँ, मुझे कुछ नहीं सुनना। तुम ठीक हो जाओगी। हम सब घर चलेंगे।”


सावित्री देवी ने अपने पोते को पास बुलाया।


“आरव, इधर आ बेटा।”


आरव उनकी छाती से लग गया।


“दादी, आप जल्दी ठीक हो जाओ। मैं आपके लिए खिलौने खरीदूँगा। मैं आपके साथ खेलूँगा। आपको कहीं नहीं जाने दूँगा।”


सावित्री देवी ने उसके माथे को चूमा।


“मेरे बच्चे, तू हमेशा खुश रहना। अपने पापा-मम्मी का ख्याल रखना और कभी किसी का दिल मत दुखाना।”


कुछ ही देर बाद उनकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।


अमित घबरा गया।


“माँ! माँ, आँखें खोलो। मैं तुम्हारा अमित हूँ। देखो, मैं तुम्हारे पास हूँ।”


लेकिन सावित्री देवी अब कोई जवाब नहीं दे रही थीं।


डॉक्टर ने जाँच की और कुछ देर बाद सिर झुका लिया।


सावित्री देवी इस दुनिया से जा चुकी थीं।


अमित अपनी माँ का हाथ पकड़कर वहीं बैठ गया। उसकी सिसकियाँ पूरे कमरे में गूँजने लगीं।


“माँ, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं। मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया है। मुझे माफ कर दो माँ। एक बार आँखें खोलकर मुझे डाँट दो, लेकिन ऐसे चुप मत रहो।”


नेहा रो रही थी। आरव अपनी दादी के हाथ को हिलाकर उन्हें उठाने की कोशिश कर रहा था।


“दादी, उठो ना। मैं आ गया हूँ। आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो?”


उस मासूम सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था।



सावित्री देवी का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ किया गया। अमित ने अपनी माँ की अर्थी को कंधा दिया। उसकी आँखों में बार-बार वही दिन घूम रहा था, जब उसने माँ का सामान बाँधकर उन्हें वृद्धाश्रम भेजा था।


उसे याद आ रहा था कि माँ ने जाते समय भी उसके लिए कोई बुरा शब्द नहीं कहा था।


उन्होंने केवल इतना कहा था कि अगर उनके जाने से घर में शांति रहती है, तो वह चली जाएँगी।


आज वही घर अमित को काटने दौड़ रहा था।


घर लौटकर उसने माँ का कमरा खोला। वहाँ उनकी पुरानी चारपाई, चश्मा, पूजा की किताब और संदूक रखा था।


अमित ने संदूक खोला। उसमें बचपन की कई चीजें थीं। उसकी पहली कक्षा की रिपोर्ट कार्ड, एक टूटा हुआ खिलौना, पुराने कपड़े और पिता के साथ खिंचवाई गई तस्वीर।


एक तस्वीर देखकर अमित फूट-फूटकर रोने लगा। उसमें वह बहुत छोटा था और सावित्री देवी उसे गोद में उठाए मुस्कुरा रही थीं।


तस्वीर के पीछे माँ की लिखावट में लिखा था—


“मेरा अमित, मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी।”


अमित ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।


“माँ, तुम्हारे लिए मैं पूरी दुनिया से लड़ सकता था, लेकिन तुम्हारे लिए अपने अहंकार से नहीं लड़ पाया। तुमने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा, और मैंने तुम्हें अकेला कर दिया।”


उस रात वह माँ के कमरे में ही बैठा रहा।


नेहा उसके पास आई और बोली, “अमित, अपने आपको इस तरह मत तोड़ो। माँ जी वापस नहीं आ सकतीं, लेकिन हम उनकी सीख को अपने जीवन में उतार सकते हैं।”


अमित ने आँसू पोंछते हुए कहा, “नेहा, मैं अपनी माँ को वापस नहीं ला सकता। लेकिन मैं वादा करता हूँ कि अब इस घर में किसी बुजुर्ग को कभी बोझ नहीं समझा जाएगा। मैं आरव को भी यही सिखाऊँगा कि रिश्तों की कीमत तब समझनी चाहिए, जब वे हमारे पास हों।”


नेहा ने उसका हाथ पकड़ लिया।


दोनों कुछ देर तक चुप बैठे रहे।


उस दिन के बाद अमित ने अपने घर में कई बदलाव किए। उसने वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की सहायता के लिए एक छोटा-सा कोष शुरू किया। वह हर महीने वहाँ जाता, बुजुर्गों के साथ समय बिताता और उनकी जरूरतों को समझने की कोशिश करता।


लेकिन वह जानता था कि यह सब उसकी माँ के प्रति अपने अपराधबोध को मिटाने का तरीका नहीं हो सकता। वह केवल इतना कर सकता था कि माँ से मिली सीख को अपने व्यवहार में उतारे।


एक दिन आरव ने अपने पिता से पूछा, “पापा, क्या दादी हमें देख रही होंगी?”


अमित ने बेटे को अपनी गोद में बैठाकर कहा, “बेटा, मैं नहीं जानता कि वह हमें कहाँ से देख रही हैं। लेकिन उनकी सीख और उनका प्यार हमेशा हमारे साथ रहेगा।”


आरव ने पूछा, “पापा, अगर दादी हमारे साथ रहतीं, तो क्या वह खुश होतीं?”


अमित की आँखें भर आईं।


उसने बेटे को गले लगाकर कहा, “हाँ बेटा, शायद बहुत खुश होतीं। और मुझे भी उनकी सेवा करने का मौका मिलता। लेकिन मैंने अपनी गलती बहुत देर से समझी।”


आरव ने अपने पिता के आँसू पोंछते हुए कहा, “पापा, आप अब किसी को दुख मत देना।”


अमित ने बेटे के माथे को चूम लिया।


“नहीं बेटा। मैं कोशिश करूँगा कि किसी अपने को कभी यह महसूस न हो कि वह हमारे लिए बोझ है।”


उस दिन अमित ने अपनी माँ की तस्वीर के सामने एक दीपक जलाया और मन ही मन उनसे माफी माँगी।


उसे अब समझ आ चुका था कि माँ-बाप को केवल भोजन, कपड़े और रहने की जगह देना ही उनकी देखभाल नहीं है। उन्हें समय देना, उनकी बातें सुनना, उनकी भावनाओं का सम्मान करना और उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।


जिस माँ ने बेटे को चलना सिखाया, उसी माँ को आखिरी दिनों में सहारे की जरूरत थी। लेकिन बेटा अपनी जिम्मेदारियों में इतना उलझ गया कि उसे माँ की जरूरत दिखाई ही नहीं दी।


और जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।


कहानी की सीख: माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य को सँवारने में लगा देते हैं। उम्र बढ़ने पर उन्हें महँगी चीजों से ज्यादा अपने बच्चों का प्यार, सम्मान और थोड़ा-सा समय चाहिए होता है। उनकी सेवा को एहसान मत समझिए, क्योंकि उन्होंने भी आपके बचपन में कभी आपकी देखभाल को बोझ नहीं माना था। रिश्तों की असली कीमत उनके चले जाने के बाद नहीं, उनके हमारे पास रहते हुए समझनी चाहिए।


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