दाल-रोटी की ज़िंदगी
पता नहीं कब इस गरीबी से छुटकारा मिलेगा…
संगीता मन ही मन सोचते-सोचते थक चुकी थी।
रोज वही दिन,
रोज वही संघर्ष,
रोज वही दाल-रोटी।
उसकी उम्र अभी ज़्यादा नहीं थी, लेकिन हालातों ने उसे वक्त से पहले बड़ा बना दिया था।
झोपड़े की छत से टपकती मिट्टी,
दीवारों में पड़ी दरारें,
और आँगन में बिखरा सूखा जीवन—
सब कुछ उसकी आँखों को चुभता था।
चूल्हे पर रखी दाल को उसने फिर से गरम किया।
कल रात की बासी दाल।
उसमें न घी था, न स्वाद—
बस पेट भरने की मजबूरी थी।
तीन रोटियाँ थीं—
कठोर, ठंडी, बासी।
संगीता ने दाल की हांडी उठाई और अपने छोटे से झोपड़े में आ गई।
अंदर उसकी माँ शान्ती, पिता कुलदीप चारपाई पर बैठे थे।
कुलदीप की खाँसी आज कुछ ज़्यादा ही थी।
बीमारी ने उनकी कमर झुका दी थी,
पर पेट की आग ने उन्हें आज भी खेतों में मजदूरी के लिए भेजा था।
“मा… बाबा… खाना खा लो।”
संगीता ने धीमे स्वर में कहा।
तीनों फर्श पर बिछी फटी चटाई पर बैठ गए।
सामने दाल और रोटियाँ रखी थीं।
कुलदीप ने रोटी तोड़ी—
कड़क आवाज़ आई।
“बिटिया… ये रोटी बहुत सख्त है… दाँतों से नहीं टूट रही।”
उन्होंने हँसने की कोशिश की।
संगीता की आँखें भर आईं।
“नई रोटी बना दूँ?”
शान्ती ने तुरंत मना कर दिया—
“नहीं! आज बना दी तो कल क्या खाएंगे?
जैसी है, वैसी ही खा लो।”
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर संगीता बोली—
“मैं दामिनी काकी के घर से नरम रोटी माँग लाती हूँ।”
शान्ती कुछ कहती, उससे पहले ही संगीता बाहर निकल गई।
बीमारी और बेबसी...
कुलदीप कभी अच्छे किसान हुआ करते थे।
लेकिन बीमारी ने सब छीन लिया।
संगीता की कोई भाई-बहन नहीं था।
इसलिए बीमारी में भी कुलदीप को खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी।
हर दिन खेत,
हर रात दर्द,
और हर सुबह—
फिर वही संघर्ष।
अचानक लौटा बचपन...
संगीता रोटियाँ लेकर लौट ही रही थी कि
अचानक गाँव की कच्ची सड़क पर एक बड़ी सी कार आकर रुकी।
इतनी बड़ी कार उसने पहली बार देखी थी।
दरवाज़ा खुला।
एक सुंदर, सजी-संवरी, आधुनिक लड़की बाहर निकली।
“संगीता…?”
संगीता रुक गई।
“इ… इशिता?”
दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को बस देखती रह गईं।
जैसे वक़्त अचानक ठहर गया हो।
आँखों में हैरानी थी,
चेहरों पर पहचान की हल्की-सी मुस्कान,
और दिलों में बचपन की धड़कनें फिर से जाग उठी थीं।
अचानक इशिता के होंठ काँपे—
“अ… अरे… तू…?”
संगीता की आँखें फैल गईं—
“अरे… तू यहाँ…?”
अगले ही पल शब्द पीछे छूट गए।
सालों की दूरी एक झटके में पिघल गई।
दोनों एक-दूसरे से लिपट गईं—
ऐसे, जैसे बिछुड़ी हुई ज़िंदगियाँ फिर से मिल गई हों।
“कितने साल हो गए यार…”
इशिता ने भर्राई आवाज़ में कहा।
“हाँ… बहुत साल…”
संगीता ने सिर हिलाते हुए कहा,
मानो उन सालों का बोझ उसकी गर्दन पर टिक गया हो।
“तू कैसी है?”
इशिता ने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए पूछा।
संगीता हल्की-सी मुस्कान लाकर बोली—
“जैसी दिख रही हूँ… वैसी ही हूँ।”
“और मुझे?”
इशिता ने शरारत भरे स्वर में पूछा,
“इतने सालों में भूल तो नहीं गई?”
संगीता की आँखें भर आईं—
“बचपन की सहेली को कोई भूल सकता है क्या…?”
इतना कहते ही
हँसी, आँसू और यादें
तीनों एक साथ बह निकलीं।
इशिता बोली—
“मैं अपने देवर के लिए लड़की देखने जा रही हूँ।
लेकिन तुझे देखकर रुके बिना रहा नहीं गया।”
संगीता ने झिझकते हुए कहा—
“घर चल… बस दस मिनट।”
इशिता झोपड़े में आई
इशिता धीरे-धीरे झोपड़े के भीतर कदम रखती है।
एक पल के लिए उसकी चाल रुक जाती है।
उसकी नज़रें जैसे एक ही जगह पर जम जाती हैं।
सामने कोई कमरा नहीं था—
बस मिट्टी की दीवारों से घिरा एक छोटा-सा संसार था,
जहाँ गरीबी खुली आँखों से बैठी थी।
छत के ऊपर से सूखी घास झाँक रही थी,
कहीं-कहीं से मिट्टी झड़ चुकी थी।
एक कोने में रखा मिट्टी का चूल्हा बुझा पड़ा था,
उसके पास अधजली लकड़ियाँ और राख बिखरी हुई थी।
फर्श पर पड़ी फटी चटाई
कई जगह से घिस चुकी थी—
मानो उसने वर्षों की तकलीफ अपने रेशों में समेट रखी हो।
चारपाई की रस्सियाँ ढीली पड़ चुकी थीं,
जिन पर कुलदीप और शान्ती चुपचाप बैठे थे।
कुलदीप की खाँसी
उस सन्नाटे को बार-बार तोड़ रही थी।
इशिता की नज़र जैसे-जैसे आगे बढ़ी,
उसकी आँखें नम होती चली गईं।
दीवार पर टंगा एक पुराना कैलेंडर,
जिसके पन्ने महीनों से नहीं बदले गए थे।
एक टूटे बक्से के ऊपर
संगीता की स्कूल की पुरानी किताबें—
जिनके कोने फटे हुए थे,
पर सपने अब भी उनमें ज़िंदा थे।
हवा में बासी दाल की हल्की-सी गंध थी,
जो भूख से ज़्यादा मजबूरी की कहानी कह रही थी।
इशिता का गला भर आया।
उसने धीरे से साँस ली,
ताकि आँसू बाहर न आ जाएँ।
उस पल उसे समझ आ गया—
संगीता की मुस्कान के पीछे
कितनी लंबी पीड़ा छिपी हुई थी।
वह कुछ बोलना चाहती थी,
लेकिन शब्द उसका साथ छोड़ चुके थे।
बस चुपचाप खड़ी रही…
और झोपड़े की हर चीज़
उससे कुछ न कुछ कह रही थी।
कुलदीप ने नम्रता से कहा—
“बैठो बिटिया।”
शान्ती बोली—
“तू तो बिल्कुल बदल गई है।”
इशिता ने मुस्कराने की कोशिश की,
लेकिन आँखें भर आईं।
“संगीता… तूने कभी बताया नहीं…”
संगीता टूट गई।
सारी कहानी बाहर आ गई।
“जब से बाबा बीमार हुए हैं…
हम एक ही बार खाना बनाते हैं…
और वही पूरा दिन खाते हैं…”
इशिता चुपचाप सुनती रही।
दोस्ती का हाथ...
इशिता ने पर्स खोला।
पैसे निकाले।
“ये रख।”
संगीता पीछे हट गई—
“नहीं… मैं भीख नहीं ले सकती।”
इशिता ने उसका हाथ थाम लिया—
“ये भीख नहीं।
ये उस दोस्त की मदद है,
जिसने बचपन में मुझे अपनी कॉपी दी थी।”
शान्ती रो पड़ीं।
कुलदीप की आँखें झुक गईं।
“भगवान तुझे खुश रखे बिटिया…”
उम्मीद की शुरुआत...
इशिता जाते-जाते बोली—
“मैं तुझे शहर में काम दिलवाने की कोशिश करूँगी।
अब तू सिर्फ दाल-रोटी की ज़िंदगी नहीं जिएगी।”
कार चली गई।
धूल उड़ती रही।
संगीता देर तक खड़ी रही।
उस रात दाल वही थी।
रोटी वही थी।
लेकिन स्वाद बदल गया था।
क्योंकि
गरीबी अभी गई नहीं थी,
पर उम्मीद आ चुकी थी।

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