अलमारी के पीछे छुपी ख़ामोशी

 

Emotional Indian woman standing near an old wooden almirah inside a traditional home, cinematic lighting and mysterious mood


मीरा उस दिन कुछ ज़्यादा ही खुश थी।

सास-ससुर दो दिन के लिए रिश्तेदारी में गए हुए थे।

घर में एक अजीब-सी आज़ादी थी—

ऐसी आज़ादी जो हर बहू को कभी-कभी चाहिए होती है।


मीरा रसोई में चाय बनाते हुए खुद से बोली—

“आज कोई नहीं पूछेगा

चाय ज़्यादा काली क्यों है,

या नमक कम क्यों है।”


वो हँस दी…

पर उस हँसी में कहीं न कहीं थकान भी छुपी थी।


दो दिन मीरा ने खुद के लिए जिए।

देर तक सोना,

बाहर का खाना,

और शाम को बालकनी में बैठकर आसमान देखना।


उसका पति आकाश मज़ाक में बोला—

“माँ होतीं तो अब तक भाषण शुरू हो चुका होता।”


मीरा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—

“बस कल तक… फिर सब पहले जैसा।”


तीसरे दिन सुबह मीरा जल्दी उठ गई।

दिल में डर था—

“अगर कुछ रह गया तो आज ज़रूर सुनना पड़ेगा।”


साड़ी को कमर में कसकर,

झाड़ू हाथ में लेकर

वो सास-ससुर के कमरे में पहुँची।


कमरा साफ था…

लेकिन अलमारी के कोने में रखा एक पुराना लकड़ी का बक्सा

उसकी नज़र खींच ले गया।


मीरा ने बक्सा खोला।


अंदर एक तस्वीर थी।


मीरा की साँस रुक गई।


तस्वीर में उसके ससुर जवान थे।

चेहरे पर वही सादगी…

लेकिन उनके पास खड़ी औरत

उसकी सास नहीं थी।


मीरा का दिल तेज़ धड़कने लगा।


“ये… ये कौन है?”

“इतने सालों में मैंने इन्हें कभी नहीं देखा…”


उसने तस्वीर को उलट-पलट कर देखा।

पीछे कुछ लिखा था—

धुंधला… आधा मिटा हुआ।


“माफ़ करना… मैं मजबूर था।”


मीरा का हाथ काँपने लगा।

तस्वीर वापस रखते ही

पीछे से आवाज़ आई—


“बहू…”


मीरा बुरी तरह चौंकी।


सास वहीं खड़ी थीं।

आँखें सीधी,

चेहरा भावहीन।


“क्या मिला?”

उनकी आवाज़ शांत थी…

लेकिन खामोशी भारी।


मीरा घबरा गई—

“कुछ नहीं माँजी… बस सफाई कर रही थी।”


सास कुछ पल उसे देखती रहीं,

फिर बोलीं—

“कुछ सवाल ऐसे होते हैं बहू,

जो पूछे जाएँ तो घर टूट जाते हैं।”


मीरा कुछ नहीं बोली।

पर उसका मन टूट रहा था।


उस दिन के बाद

मीरा हर बात में ससुर को देखने लगी।

उनकी चुप्पी…

उनकी आँखों की उदासी…

सब कुछ अब अलग-सा लग रहा था।


रात को मीरा ने पति से कहा—

“अगर किसी ने पूरी ज़िंदगी एक झूठ के साथ बिताई हो…

तो क्या सच जानना ज़रूरी है?”


आकाश ने कहा—

“कभी-कभी सच से ज़्यादा

शांति ज़रूरी होती है।”


लेकिन मीरा को शांति नहीं मिल रही थी।


अगली रात

जब सब सो चुके थे,

मीरा चुपचाप छत पर गई।


वहाँ कोई पहले से मौजूद था।


उसके ससुर।


वो हाथ में वही पुरानी तस्वीर पकड़े खड़े थे।

आँखों में नमी थी।


मीरा की आवाज़ काँप गई—

“बाबूजी… वो कौन थीं?”


ससुर ने गहरी साँस ली।


“कोई जिसे मैं बचा नहीं पाया।”

बस इतना कहा।


“क्या वो आपकी…”

मीरा बोल न सकी।


उन्होंने तस्वीर की ओर देखा,

फिर आसमान की तरफ़।


“हर रिश्ता नाम से नहीं होता, बहू।”


इतना कहकर

उन्होंने तस्वीर को आग में डाल दिया।


मीरा चीख पड़ी—

“सच तो बताइए!”


लेकिन आग तेज़ हो चुकी थी।

तस्वीर जलकर राख बन गई।


ससुर की आवाज़ आई—

“कुछ यादें अगर ज़िंदा रहें

तो कई लोग मर जाते हैं।”


अगली सुबह सब कुछ सामान्य था।

सास पूजा कर रही थीं।

पति अख़बार पढ़ रहा था।


जैसे कुछ हुआ ही न हो।


लेकिन मीरा जान चुकी थी—

इस घर की दीवारों में

सिर्फ ईंट नहीं…

खामोशियाँ भी बंद हैं।


और कुछ रहस्य…

ऐसे होते हैं

जो सामने आएँ

तो रिश्ते बचते नहीं।


मीरा ने तय किया—

वो अब कभी उस अलमारी को नहीं खोलेगी।


क्योंकि

हर सच जानना

ज़रूरी नहीं होता।




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