पीपल के नीचे वाली तीसरी बेंच
नगर निगम के पार्क में पीपल का एक पुराना पेड़ था।
उसकी जड़ें ज़मीन के ऊपर ऐसे उभरी थीं, जैसे उम्रदराज़ आदमी की उभरी नसें।
उसी पेड़ के नीचे तीसरी बेंच पर हर शाम दो स्त्रियाँ आकर बैठती थीं —
शांता और सरोज।
दोनों की उम्र सत्तर के आसपास थी।
दोनों के घुटनों में दर्द था।
दोनों की कमर सीधी खड़ी नहीं हो पाती थी।
और दोनों के दिलों में वर्षों से जमा वह दर्द थी, जो घर के भीतर किसी को दिखाई नहीं देती।
शांता पहले आ जाती थी।
वह बेंच पर बैठते ही पर्स से रूमाल निकालती,
घुटनों पर हाथ फेरती
और मन ही मन बुदबुदाती—
“आज फिर न जाने किस बात पर बहू नाराज़ होगी।”
कुछ देर बाद सरोज आती।
चलते-चलते साँस फूल जाती,
पर चेहरे पर अजीब-सी सख़्ती रहती।
वह बेंच पर बैठते ही कहती—
“आज बेटा भी कुछ नहीं बोला…
बस मोबाइल में घुसा रहा।”
दोनों हँसतीं,
पर हँसी में वजन नहीं होता था।
उनकी बातें एक ही पटरी पर दौड़ती थीं —
बेटे, बहुएँ, पोते,
और वह अदृश्य दीवार
जो अब उनके और परिवार के बीच खड़ी थी।
“पहले घर में मेरी आवाज़ आख़िरी होती थी,”
शांता कहती,
“अब तो पूछे बिना पानी भी नहीं पी सकती।”
सरोज तुरंत हामी भरती—
“और मैं?
मेरे बनाए खाने को कोई देखता भी नहीं।
बहू बाहर से मँगवा लेती है।”
वे दोनों बातें करतीं,
मन हल्का करतीं,
और अगले दिन फिर वही बोझ लेकर आतीं।
एक शाम
जब हवा में हल्की ठंड घुलने लगी थी,
उन्होंने देखा —
पीपल के नीचे वाली चौथी बेंच पर
एक औरत बैठी थी।
नीले रंग की सादी साड़ी,
कंधों पर शॉल,
और आँखों में ऐसी शांति
जो बहुत कुछ सहकर आई हो।
वह अकेली थी।
न मोबाइल,
न किसी का इंतज़ार।
सरोज ने कोहनी से शांता को छुआ—
“नई लगती है।”
शांता मुस्कुराई—
“चलो, बात करते हैं।”
वे दोनों धीरे-धीरे उठीं
और उसकी बेंच के पास पहुँच गईं।
“नमस्ते,”
शांता बोली,
“हम रोज़ यहीं बैठते हैं।”
औरत ने सिर उठाया,
हल्की मुस्कान दी—
“नमस्ते… मैं जानकी।”
“अकेली रहती हो?”
सरोज ने सीधा प्रश्न किया।
“हाँ,”
जानकी ने कहा,
“अब तो हमेशा से।”
कुछ ही मिनटों में
तीनों की बातचीत शुरू हो गई।
जानकी कम बोलती थी,
पर जब बोलती
तो शब्द ऐसे होते
जैसे बहुत सोचकर निकाले गए हों।
उसने बताया—
वह लाइब्रेरी में काम करती थी,
पति की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी,
और अब
वह एक छोटे से कमरे में अकेली रहती है।
“कोई बच्चा?”
शांता ने पूछा।
जानकी ने सिर हिलाया—
“नहीं।”
सरोज को लगा
अब जानकी रो पड़ेगी,
पर ऐसा नहीं हुआ।
वह बस बोली—
“जो नहीं है,
उसका दुख मनाकर क्या करूँ?”
अगले कई दिनों तक
जानकी रोज़ आने लगी।
उसकी बातें अलग थीं।
वह शिकायत नहीं करती थी।
न बीते समय को कोसती थी।
वह कहती—
“दिन में एक काम ज़रूर होना चाहिए
जिसका कोई मतलब न हो,
बस मन को अच्छा लगे।”
वह कभी पेड़ को देखती,
कभी बच्चों की हँसी सुनती,
और कभी चुपचाप बैठी रहती।
शांता और सरोज
उसके पास बैठकर
अपनी शिकायतें आधी करने लगीं।
अब वे कम कहतीं—
“बहू ने यह कहा,”
और ज़्यादा सोचतीं—
“क्या सच में हर बात बुरी होती है?”
घर में भी बदलाव दिखने लगा।
शांता ने एक दिन
बहू के बनाए खाने में
नमक कम होने पर
कुछ नहीं कहा।
सरोज ने बेटे से
पहली बार पूछा—
“तू ठीक है न?”
दोनों को हैरानी हुई
कि यह सब
जानकी की चुप्पी से हुआ।
एक दिन
जानकी नहीं आई।
दूसरे दिन भी नहीं।
तीसरे दिन
पीपल के पत्ते ज़्यादा सूखे लगे।
शांता और सरोज बेचैन हो गईं।
“वह बीमार तो नहीं?”
सरोज बोली।
“पता पूछ लेना चाहिए था…”
शांता के स्वर में गहरा पछतावा उतर आया।
पाँचवें दिन,
जब दोनों रोज़ की तरह उसी बेंच पर बैठी थीं,
एक दुबली-पतली स्त्री धीरे-धीरे उनके पास आकर रुकी।
उसने झिझकते हुए पूछा—
“क्या आप जानकी की सहेलियाँ हैं?”
दोनों चौंक पड़ीं।
“हाँ…” शांता ने घबराई हुई आवाज़ में कहा,
“क्या हुआ? जानकी कैसी है?”
स्त्री ने पलभर के लिए आँखें झुका लीं,
फिर धीमे स्वर में बोली—
“वह अब नहीं रहीं…
कल रात उनका देहांत हो गया।”
यह सुनते ही
शांता और सरोज जैसे जड़ हो गईं।
कुछ क्षणों के लिए
चारों ओर की आवाज़ें
उन तक पहुँचनी बंद हो गईं।
पार्क में बच्चों की हँसी,
पत्तों की सरसराहट,
और शाम की चहल-पहल —
सब कुछ जैसे थम सा गया।
दुनिया सचमुच
कुछ देर के लिए
रुक गई थी।
“उनकी कोई रिश्तेदार नहीं थी,”
वह बोली,
“मरने से पहले
उन्होंने यह डायरी देने को कहा था।”
डायरी शांता के हाथ में थी।
काँपते हाथों से उसने खोली।
डायरी का आख़िरी पन्ना लिखा था:
> “मैं अकेली ज़रूर थी,
पर भीतर से कभी ख़ाली नहीं।
तुम दोनों से मिलकर मैंने जाना
कि किसी घर में रहना
और किसी का अपना होना
एक ही बात नहीं होती।
तुम्हारे दुख सुनते हुए
मुझे अपने अकेलेपन से डर नहीं लगा,
बल्कि पहली बार लगा
कि चुप्पी भी कभी-कभी
किसी रिश्ते का सबसे सच्चा रूप होती है।
धन्यवाद,
क्योंकि तुम्हारी शिकायतों ने
मेरी ख़ामोशी को अर्थ दिया,
और मेरी ज़िंदगी को
कुछ पल अपना बना दिया। ”
उस दिन
पीपल के नीचे रखी
तीसरी बेंच
असाधारण रूप से
ख़ामोश थी।
शांता और सरोज
लंबे समय तक
बिना एक शब्द कहे
वहाँ बैठी रहीं।
हवा में पत्तों की सरसराहट थी,
पर उनके भीतर
अनकही बातें गूंज रही थीं।
कुछ देर बाद
सरोज ने चुप्पी तोड़ी—
“चलो,
आज घर थोड़ा जल्दी चलते हैं।”
शांता ने
धीरे से सिर हिलाया—
“हाँ…
शायद
आज कोई
हमारा इंतज़ार कर रहा होगा।”
और सचमुच,
उस दिन
पहली बार
उन दोनों के कदम
भारी नहीं थे—
बल्कि
अद्भुत रूप से
हल्के थे।

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