सिर्फ़ साड़ी की दुनिया
सुबह का समय था।
घर के आँगन में धूप फैल चुकी थी।
रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी।
कमरे में बैठी कमला देवी बड़े ध्यान से सूटकेस में साड़ियाँ सजा रही थीं।
लाल, हरी, पीली, नीली —
एक से बढ़कर एक भारी साड़ियाँ।
“इतनी सारी साड़ियाँ क्यों रख रही हो?”
पति रामप्रसाद ने पूछा।
“अरे, लड़की देखने जा रहे हैं।
घर की इज़्ज़त बहू के पहनावे से ही पहचानी जाती है,”
कमला देवी ने सख़्त लहजे में कहा।
“लेकिन अभी तो सिर्फ़ देखने जा रहे हैं,”
रामप्रसाद बोले।
“देखना ही तो सबसे ज़रूरी होता है,”
कमला देवी ने आख़िरी साड़ी रखकर सूटकेस बंद कर दिया।
बहू का पहनावा...
“राधा बहू!”
कमला देवी ने कड़े स्वर में आवाज़ लगाई।
राधा बाहर आई।
उसने हल्की बॉर्डर वाली सादी साड़ी पहन रखी थी।
साड़ी साफ़ थी, सलीके से ओढ़ी हुई।
कमला देवी की भौंहें तुरंत तन गईं।
नज़र ऊपर से नीचे तक चली गई।
“ये क्या पहन रखा है तुमने?”
“इतनी फीकी साड़ी?”
राधा ने सिर थोड़ा झुकाते हुए धीमी आवाज़ में कहा,
“माँ जी… साड़ी साफ़ है, सादी है।”
कमला देवी का स्वर और सख़्त हो गया।
“नई रिश्तेदारी में सादगी नहीं दिखाई जाती,
शान दिखाई जाती है।”
फिर उन्होंने आदेश देते हुए कहा,
“जा, वो भारी मोतियों वाली साड़ी पहन कर आ।”
राधा बिना कुछ कहे पलट गई।
कदम भारी थे, मन और भी भारी।
कमरे में पहुँचते ही वह बुदबुदाई —
“काश… यहाँ सूट पहनना भी बुरा न माना जाता।”
लड़की देखने का दिन...
लड़की के घर का माहौल सादा और शांत था।
सब लोग ड्रॉइंग रूम में आराम से बैठे थे।
थोड़ी देर में चाय आ गई।
लड़की पूजा सूट पहनकर सामने आई।
कपड़े सादे थे, लेकिन वह खुद बहुत सलीकेदार और सुंदर लग रही थी।
कमला देवी की नज़र एक पल के लिए उसी पर ठहर गई।
उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“लड़की तो देखने में बहुत अच्छी है,
बस अगर साड़ी पहनी होती तो और भी निखर जाती।”
लड़की की माँ ने तुरंत बात संभाल ली।
मुस्कराते हुए बोलीं—
“अभी बच्ची है जी,
धीरे-धीरे सब सीख जाएगी।”
इसके बाद छेके की रस्म हुई।
फल, मिठाइयाँ और ढेर सारी साड़ियाँ
पूजा की गोद में रख दी गईं।
पूजा मुस्कुरा रही थी,
लेकिन उसकी आँखों में
आने वाले समय की एक हल्की-सी चिंता छुपी हुई थी।
शादी और ससुराल...
शादी बड़े ही धूमधाम से संपन्न हुई।
बैंड-बाजे, रोशनी और रिश्तेदारों की भीड़ के बीच
पूजा दुल्हन बनकर बेहद सुंदर लग रही थी।
उसने अपने मनपसंद डिज़ाइन का लहंगा पहना था,
जिसे उसने ख़ास तौर पर इस दिन के लिए चुना था।
लेकिन जैसे ही वह ससुराल पहुँची,
अंदर कदम रखते ही माहौल बदल गया।
कमला देवी ने पूजा को ऊपर से नीचे तक देखा
और सख़्त आवाज़ में बोलीं—
“अब ये लहंगा उतार दो।
मूँह दिखाई पीली साड़ी में होगी।”
पूजा का चेहरा उतर गया।
उसकी आँखें भर आईं।
हिम्मत जुटाकर वह बोली—
“माँ जी…
थोड़ी देर रहने दीजिए न।
फ़ोटो खिंचवा लूँ…
इतना सुंदर लहंगा है…”
लेकिन कमला देवी ने उसकी बात बीच में ही काट दी।
“यहाँ मन की नहीं,
परंपरा की चलती है।
हमारे घर में बहू
मूँह दिखाई साड़ी में ही देती है।”
पूजा चुप हो गई।
उसके सपने, उसकी ख़ुशी,
सब उसी लहंगे के साथ
अंदर ही अंदर सिमट गए।
नई बहू की पहली रसोई...
अगले दिन पहली रसोई की रस्म थी।
सुबह से ही घर में चहल-पहल थी।
रसोई में मसालों की खुशबू फैल रही थी।
पूजा ने हल्का-सा फ्रॉक सूट पहन लिया।
सिर पर दुपट्टा भी ठीक से ओढ़ लिया था।
वह जैसे ही रसोई में कदम रखती है —
“ये क्या पहन रखा है?”
कमला देवी का स्वर अचानक तेज़ हो जाता है।
पूजा घबराकर रुक जाती है।
धीरे-से कहती है,
“माँ जी, खाना बनाना है…
साड़ी में काम करना थोड़ा मुश्किल होता है।”
कमला देवी की आँखें गुस्से से लाल हो जाती हैं।
“मुश्किल?”
“हमने सारी उम्र साड़ी पहनकर ही रसोई संभाली है।”
वो सख़्त लहजे में आगे कहती हैं —
“आज के बाद इस घर में
सूट पहनकर रसोई में कदम मत रखना।
यहाँ बहुएँ सिर्फ़ साड़ी में ही काम करती हैं।”
पूजा की आँखें भर आती हैं,
लेकिन वह कुछ कह नहीं पाती।
सिर झुकाकर चुपचाप खड़ी रह जाती है।
ननद और ताने...
ननद रीमा घर में जीन्स-टॉप पहनकर बेझिझक घूमती रहती थी।
कभी बाल खुले, कभी मोबाइल हाथ में —
उस पर किसी की नज़र नहीं जाती थी।
लेकिन जैसे ही पूजा सामने आती,
रीमा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ जाती।
“भाभी,”
वो हँसते हुए बोली,
“आपका तो नसीब ही ऐसा है…
अब पूरी ज़िंदगी बस साड़ी ही ओढ़नी पड़ेगी।”
उसकी हँसी में मज़ाक कम,
और चुभन ज़्यादा थी।
पूजा ने कुछ कहना चाहा,
लेकिन शब्द गले में अटक गए।
वो सिर झुकाकर चुपचाप आगे बढ़ गई।
क्योंकि इस घर में
हँसने की आज़ादी कुछ के पास थी,
और सहने की ज़िम्मेदारी
सिर्फ़ बहुओं के हिस्से आई थी।
शरीर और मन दोनों थक गए...
गर्मी बढ़ने लगी।
भारी साड़ियों में लिपटी पूजा का शरीर जैसे जलने लगा था।
पसीना सूखने से पहले ही चिपचिपा हो जाता।
हाथों पर लाल-लाल दाने निकल आए थे,
जिनमें जलन और खुजली दोनों थी।
एक शाम अमित ने पूजा के हाथ देखे तो घबरा गया।
उसने धीरे से उसका हाथ थामा।
“ये क्या हो गया पूजा?”
उसकी आवाज़ में चिंता साफ़ झलक रही थी।
पूजा खुद को रोक नहीं पाई।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“मुझे इन भारी साड़ियों से एलर्जी हो जाती है,”
वो सिसकते हुए बोली,
“पूरे दिन पहनकर रहना मेरे बस की बात नहीं है।”
अमित कुछ पल चुप रहा।
फिर बिना कुछ कहे बाहर चला गया।
थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा।
उसके हाथ में सूती कपड़े की एक नाइटी थी।
“आज से रात को ये पहन लिया करो,”
उसने नरम आवाज़ में कहा,
“कम से कम सोते वक्त तो तुम्हें आराम मिलेगा।”
पूजा ने नाइटी को हाथ में लिया।
इतनी छोटी-सी बात में भी
उसे बहुत बड़ी राहत महसूस हुई।
उसकी आँखें भर आईं।
आँसुओं के बीच से बस इतना ही निकल पाया—
“थैंक यू, अमित…”
पकड़े जाना...
उस दिन आसमान सुबह से ही बरस रहा था।
लगातार बारिश के कारण आँगन में टँगी एक भी साड़ी सूख नहीं पाई थी।
नमी और सीलन से सब कपड़े भारी हो चुके थे।
पूजा देर तक अलमारी के सामने खड़ी रही।
हर साड़ी गीली थी।
क्या पहने — यही सोचकर उसका सिर दर्द करने लगा।
आख़िर मजबूरी में
उसने अमित की एक ढीली-सी टी-शर्ट पहन ली।
बस शरीर ढकने के लिए,
कोई दिखावा नहीं, कोई ज़िद नहीं।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
रीमा की नज़र उस पर पड़ गई।
वो चौंक कर बोली —
“माँ!”
“भाभी लड़कों जैसे कपड़े पहन रही हैं!”
उसकी आवाज़ में हैरानी कम,
शिकायत ज़्यादा थी।
कमला देवी तुरंत कमरे में आईं।
नज़र पड़ते ही उनका चेहरा तमतमा उठा।
“ये क्या पहना है?”
“इतनी हिम्मत कैसे हुई?”
उन्होंने तीखे स्वर में कहा —
“हमारे घर की परंपरा का
मज़ाक बना दिया है!”
पूजा अब तक चुप थी।
हर बार की तरह।
लेकिन इस बार
कुछ अंदर से टूट गया।
उसकी आँखें भर आईं
और आवाज़ काँपने लगी।
“माँ जी,”
“मैं कोई बुरी बहू नहीं हूँ।”
“मैंने कभी इस घर की
इज़्ज़त तोड़ने की कोशिश नहीं की।”
“मैं बस इतना चाहती हूँ
कि साँस ले सकूँ…
थोड़ा आराम कर सकूँ।”
“कपड़ों से इज़्ज़त नहीं जाती,
नियत से जाती है।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
कोई कुछ नहीं बोला।
पहली बार
पूजा की चुप्पी नहीं,
उसकी आवाज़ गूँज रही थी।
पहली दरार...
अमित धीरे-धीरे आगे आया।
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था,
बस सच्चाई थी।
“माँ,
परंपराएँ इंसानों को जोड़ने के लिए होती हैं,
उन्हें बाँधने के लिए नहीं।
अगर किसी रिवाज़ से
किसी की तकलीफ़ बढ़े,
तो उस रिवाज़ पर सवाल उठाना ग़लत नहीं होता।”
कमला देवी कुछ पल चुप रहीं।
पहली बार उनके पास
कोई जवाब नहीं था।
उनकी आँखों में कठोरता तो थी,
लेकिन उसके पीछे
सोच की एक दरार
धीरे-धीरे उभरने लगी
अगले दिन पूजा साड़ी में ही थी,
लेकिन इस बार वह साड़ी हल्की थी —
जैसी किसी मजबूरी की नहीं,
बल्कि एक समझौते की निशानी हो।
कमला देवी ने उसे देखा,
पर कुछ कहा नहीं।
न टोका, न ताना दिया।
शायद सब कुछ एक ही दिन में नहीं बदला था,
पुरानी सोच अभी भी वहीं थी।
लेकिन उस ख़ामोशी में
एक नई शुरुआत की आहट थी।
एक छोटा-सा क़दम,
जो आगे चलकर
कई बड़े बदलावों की राह खोल सकता था।

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