दो घर, दो बहुएँ
सुबह के सात बजे थे।
शहर की एक पॉश कॉलोनी में ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच एक फ्लैट में हलचल शुरू हो चुकी थी।
रसोई में काम कर रही थी नेहा —
ब्रांडेड साड़ी, हाथ में महँगी घड़ी,
लेकिन चेहरे पर हल्की-सी उदासी।
डाइनिंग टेबल पर बैठा उसका पति रोहित
लैपटॉप खोले ईमेल देख रहा था।
“आप नाश्ता तो कर लीजिए,”
नेहा ने धीरे से कहा।
“आज मीटिंग बहुत ज़रूरी है,
लेट हो रहा हूँ,”
रोहित ने बिना नज़र उठाए कहा।
नेहा कुछ नहीं बोली।
बस मुस्कुराकर प्लेट हटा ली।
रोहित जल्दी-जल्दी तैयार होकर निकल गया।
पड़ोस का घर...
कॉलोनी से थोड़ा बाहर एक पुराना-सा, सादा मकान था।
न कोई दिखावा, न चमक-दमक —
बस सुकून से भरा एक छोटा-सा घर।
उसी घर में रहती थी सुमन।
साधारण कपड़े पहने, खुले बाल,
और चेहरे पर एक शांत मुस्कान।
सुबह का समय था।
वह आँगन में झाड़ू लगा रही थी।
धूप धीरे-धीरे तेज़ हो रही थी।
पास ही उसका पति मोहित
पानी का ड्रम भर रहा था।
बार-बार उसकी ओर देखकर बोला—
“धूप बहुत तेज़ है,
थोड़ा रुक जाओ।”
सुमन ने मुस्कुराकर कहा—
“बस थोड़ा-सा काम रह गया है,
फिर आराम कर लूँगी।”
मोहित कुछ नहीं बोला।
चुपचाप पास गया,
छाता खोला
और सुमन के सिर पर तान दिया।
उस छोटे-से आँगन में
न पैसा था,
न सुविधा,
लेकिन उस पल
प्यार पूरी तरह मौजूद था।
पहली तुलना...
शाम को नेहा बालकनी में खड़ी थी।
हाथ में कॉफी का मग।
नीचे नज़र पड़ी तो
सुमन और मोहित
एक साथ बैठकर
चाय पी रहे थे।
हँस रहे थे।
बिना किसी मोबाइल के।
नेहा ने मन ही मन सोचा—
> “पैसा नहीं है उनके पास,
फिर भी इतने खुश कैसे हैं?”
बातचीत...
अगली सुबह वॉक के दौरान
नेहा और सुमन आमने-सामने आ गईं।
“आप पढ़ी-लिखी लगती हैं,”
नेहा ने कहा,
“फिर इतनी सादगी में कैसे खुश हैं?”
सुमन मुस्कुरा दी।
“खुशी घर देखकर नहीं,
साथ देखकर होती है।”
“आजकल बिना पैसे कुछ नहीं चलता,”
नेहा ने तंज किया।
“सही है,”
सुमन बोली,
“लेकिन प्यार बिना पैसे भी चलता है।”
उसी वक्त मोहित आया।
हाथ में एक छोटा सा फूल।
“आज तुम्हें पसंद आएगा,”
उसने सुमन को दिया।
सुमन की आँखें चमक उठीं।
समय बीतता गया...
नेहा के घर में
महँगे गिफ्ट्स की कभी कमी नहीं थी।
कभी नई साड़ी,
कभी महँगा परफ्यूम,
कभी चमकते गहने।
लेकिन उन गिफ्ट्स के बीच
रोहित का समय कहीं खो गया था।
हर रात वह लैपटॉप में डूबा रहता,
और हर वीकेंड
ऑफिस की कॉल्स में निकल जाता।
एक दिन नेहा ने हिम्मत करके पूछा,
“हम दोनों कभी शांति से
साथ बैठेंगे भी या नहीं?”
रोहित ने बिना सोचे कहा,
“मैं जो कुछ कर रहा हूँ
सब तुम्हारे लिए ही तो कर रहा हूँ।”
नेहा कुछ नहीं बोली।
उसके पास कहने को शब्द थे,
लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।
वह चुप हो गई—
क्योंकि कभी-कभी
चुप्पी ही सबसे बड़ा दर्द होती है।
एनिवर्सरी का दिन...
दोनों घरों में उसी दिन शादी की सालगिरह थी।
नेहा ने इस ख़ास दिन को यादगार बनाने के लिए एक भव्य पार्टी रखी थी।
घर रोशनी से जगमगा रहा था।
महँगी सजावट, ढेर सारे मेहमान, धीमा संगीत और हर तरफ़ हँसी-ठहाकों की आवाज़ें थीं।
लेकिन इस सबके बीच नेहा की निगाहें बार-बार दरवाज़े की ओर उठ जाती थीं।
वह जिस शख़्स का इंतज़ार कर रही थी, वही नहीं आया।
रोहित अब तक नहीं पहुँचा था।
उधर दूसरी ओर, सुमन के घर में कोई बड़ी तैयारी नहीं थी।
उसने अपने हाथों से बस साधी-सी खीर बनाई थी।
घर में कोई सजावट नहीं थी, कोई मेहमान नहीं थे।
मोहित ने आँगन के एक कोने में दो मोमबत्तियाँ जला दीं।
उनकी हल्की-सी रोशनी में सुमन के चेहरे पर सुकून साफ़ झलक रहा था।
वह मुस्कुराते हुए बोली,
“इतना ही बहुत है… यही हमारे लिए काफी है।”
टूटता भ्रम...
पार्टी कब की खत्म हो चुकी थी।
मेहमान जा चुके थे।
कमरे में बस सन्नाटा बचा था।
नेहा सोफ़े के कोने में बैठी
खामोशी से रो रही थी।
सजी हुई साड़ी,
मगर बुझी हुई आँखें।
तभी रोहित का फोन आया।
“सॉरी नेहा…
आज बहुत देर हो गई।”
नेहा ने आँसू पोंछे और धीमी आवाज़ में कहा—
“मुझे तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए, रोहित।
मुझे वो इंसान चाहिए
जिससे मैंने शादी की थी।
मुझे तुम चाहिए…
सिर्फ़ तुम।”
फोन के उस तरफ
रोहित बिल्कुल चुप हो गया।
उसकी खामोशी ही
इस बात की गवाही थी
कि आज पहली बार
उसे अपनी गलती का एहसास हुआ था।
समझ...
अगले दिन रोहित ने जानबूझकर ऑफिस से छुट्टी ले ली।
सुबह वह जल्दी उठा और नेहा के साथ बैठकर नाश्ता किया।
आज न कोई लैपटॉप था,
न कोई फोन,
और न ही किसी मीटिंग की जल्दी।
कई दिनों बाद
घर में एक अजीब-सी शांति थी।
नाश्ते के बीच रोहित ने नेहा की ओर देखा और धीमे स्वर में बोला—
“मैं गलत था नेहा…
मैं समझ ही नहीं पाया कि तुम्हें पैसों से ज़्यादा
मेरा साथ और मेरा समय चाहिए था।”
ये सुनते ही नेहा की आँखें भर आईं,
लेकिन इस बार आँसू दर्द के नहीं,
सुकून के थे।
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान लौट आई—
जैसे लंबे इंतज़ार के बाद
उसे वो मिल गया हो
जिसकी उसे सच में ज़रूरत थी।
कुछ दिनों बाद
नेहा खुद सुमन के घर पहुँची।
दरवाज़े पर खड़ी सुमन उसे देखकर मुस्कुरा दी।
नेहा ने थोड़ी झिझक के साथ कहा,
“सुमन, मैं तुम्हारा धन्यवाद करना चाहती हूँ।”
सुमन ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
नेहा की आँखों में सच्चाई थी।
उसने आगे कहा,
“तुम्हें देखकर मुझे समझ आया कि
अमीरी का मतलब सिर्फ़ पैसा नहीं होता,
और न ही पैसा कभी खुशी की गारंटी बन सकता है।”
सुमन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“खुशी वहाँ नहीं होती जहाँ चीज़ें ज़्यादा हों,
खुशी वहाँ होती है जहाँ दिल जुड़े हों।
जहाँ प्यार होता है,
वहीं असली घर होता है।”
सीख:
पैसा ज़रूरी है,
लेकिन वह रिश्तों से बड़ा नहीं होता।
समय और प्यार ही
इंसान की असली दौलत होते हैं।

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