अधूरा वादा
रात के करीब साढ़े बारह बजे थे।
कमरे में पंखा चल रहा था, फिर भी महेश बाबू को नींद नहीं आ रही थी। वे बार-बार करवट बदल रहे थे।
“क्या हुआ? नींद नहीं आ रही क्या?” पत्नी शांता ने आंखें मलते हुए पूछा।
“कुछ नहीं… बस ऐसे ही,” महेश बाबू ने धीमे से जवाब दिया।
शांता फिर से सो गई, लेकिन महेश बाबू की आंखों से नींद कोसों दूर थी। उन्होंने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा — 14 जून।
उन्होंने गहरी सांस ली।
“बस पंद्रह दिन और…”
दरअसल 29 जून को उनकी शादी की 45वीं सालगिरह थी। बेटा, बहू और दोनों पोतियां मिलकर बड़ा कार्यक्रम करने की तैयारी कर रहे थे। घर में रोज़ उसी की बातें चल रही थीं।
लेकिन महेश बाबू के मन में कुछ और ही चल रहा था।
उन्होंने धीरे से अलमारी खोली और एक पुराना डिब्बा निकाला। उसमें एक फीकी पड़ चुकी रेशमी साड़ी का टुकड़ा और एक पुरानी रसीद रखी थी।
यह वही साड़ी थी, जो शांता ने शादी के दूसरे साल पसंद की थी — हरी बनारसी साड़ी। उस समय महेश बाबू की तनख्वाह बहुत कम थी।
“अगले साल दिला दूंगा,” उन्होंने तब वादा किया था।
लेकिन अगले साल मां की बीमारी आ गई। फिर छोटे भाई की पढ़ाई। फिर बच्चों की फीस।
वादा बस वादा ही रह गया।
कभी-कभी शांता मजाक में कहती, “मेरी वो हरी बनारसी साड़ी तो शायद स्वर्ग में ही मिलेगी।”
और हंस देती।
लेकिन महेश बाबू को हर बार दिल में चुभन होती।
अगली सुबह...
सुबह आठ बजे महेश बाबू तैयार होकर बाहर जाने लगे।
“इतनी सुबह-सुबह कहाँ जा रहे हैं?” शांता ने पूछा।
“जरा बैंक तक काम है,” उन्होंने जल्दी से कहा।
“चाय तो पी लीजिए…”
“आकर पी लूंगा,” कहकर वे निकल गए।
असल में वे सीधे अपने पुराने दोस्त सुरेश की दुकान पर पहुंचे। सुरेश कपड़ों की बड़ी दुकान चलाता था।
“अरे महेश! आज कैसे?” सुरेश ने मुस्कुराकर स्वागत किया।
महेश बाबू ने धीरे से कहा, “यार, एक खास काम है।”
उन्होंने अपनी जेब से पुरानी रसीद निकाली और मेज पर रख दी।
“याद है? 45 साल पहले यही साड़ी लेने आए थे। पैसे कम पड़ गए थे।”
सुरेश ने रसीद देखी और मुस्कुराया। “वाह! तो अब भाभीजी के लिए?”
“हाँ… इस बार सालगिरह पर देना है। वही हरी बनारसी… लेकिन सबसे अच्छी।”
सुरेश ने कई साड़ियाँ दिखाईं। आखिरकार एक गहरे हरे रंग की सुनहरी बॉर्डर वाली बनारसी साड़ी महेश बाबू को पसंद आ गई।
कीमत सुनकर उन्होंने पल भर को सोचा… लेकिन तुरंत बोले, “पैक कर दो।”
उन्होंने अपनी पुरानी बचत में से पैसे निकाले। यह बचत उन्होंने पेंशन में से थोड़ा-थोड़ा करके की थी।
सालगिरह का दिन...
29 जून आ गया।
घर मेहमानों से भरा हुआ था। रोशनी, फूल, हंसी-खुशी का माहौल।
शांता गुलाबी साड़ी में सजी हुई थीं। पोतियां उनके बालों में गजरा लगा रही थीं।
“दादी आज तो आप बिल्कुल फिल्म वाली दुल्हन लग रही हो!” छोटी पोती बोली।
शाम को केक काटने का समय आया।
सबने तालियां बजाईं। महेश बाबू और शांता ने साथ में केक काटा।
तभी महेश बाबू ने माइक लिया।
“आज मैं कुछ कहना चाहता हूं।”
सब चुप हो गए।
उन्होंने सुरेश से एक पैकेट लिया।
“शांता… 45 साल पहले तुमने एक हरी साड़ी पसंद की थी। मैं तब दिला नहीं पाया। आज… देर से ही सही…”
उन्होंने पैकेट खोलकर साड़ी निकाली।
गहरे हरे रंग की बनारसी साड़ी रोशनी में चमक रही थी।
शांता की आंखें फैल गईं।
“ये… वही?”
“हाँ। इस बार वादा पूरा कर दिया।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
शांता की आंखों से आंसू बहने लगे।
“इतने साल बाद भी याद है तुम्हें?”
महेश बाबू मुस्कुराए, “कुछ वादे दिल में रखे जाते हैं… भूले नहीं जाते।”
पोतियां चिल्लाईं, “दादू सबसे रोमांटिक हैं!”
बेटा-बहू भी भावुक हो गए।
शांता ने साड़ी अपने सीने से लगा ली।
“मुझे साड़ी नहीं… तुम्हारा साथ चाहिए था। वो तो हमेशा मिला।”
महेश बाबू ने उनका हाथ थाम लिया।
उस रात पहली बार उन्हें सुकून की नींद आई।
संदेश:
कभी-कभी जिंदगी की भागदौड़ में वादे पीछे छूट जाते हैं,
लेकिन अगर इरादा सच्चा हो —
तो देर से ही सही, हर अधूरा वादा पूरा हो सकता है।

Post a Comment