आईना चुप था… पर आँखें सब कह रही थीं
सुबह के ठीक चार बजे थे।
पूरा घर गहरी नींद में डूबा हुआ था,
लेकिन कमला देवी की नींद
बरसों पहले ही उनसे रूठ चुकी थी।
रसोई में जलती
एक छोटी-सी बत्ती
उनकी ज़िंदगी की तरह थी—
ख़ामोश, थकी हुई,
पर अब तक बुझी नहीं।
उन्होंने चुपचाप
गैस जलाई,
दूध चढ़ाया,
और फिर खिड़की के पास जाकर
बाहर झाँका।
चारों तरफ़ अंधेरा था।
बिलकुल वैसा ही अंधेरा
जैसा उनके मन के भीतर
कई सालों से पसरा हुआ था।
“माँ, आप समझती क्यों नहीं?”...
नाश्ते की मेज़ पर
बहु रिया मोबाइल की स्क्रीन में खोई हुई थी।
बिना नज़र उठाए उसने कहा—
“माँ, आज मेरी ऑफिस पार्टी है…
आप मत आइएगा।”
कमला देवी के हाथ
रोटी पर ही रुक गए।
उन्होंने धीमे से पूछा—
“मैंने क्या किया है, बेटा?”
रिया ने लापरवाही से जवाब दिया—
“आपका पहनावा…
आपका बोलने का तरीका…
लोग बातें बनाते हैं।”
कमला देवी ने
अपने हाथों को देखा।
इन्हीं हाथों ने
अपने बच्चे को बड़ा किया था।
इन्हीं हाथों ने
रात-रात भर
बुख़ार में
उसका माथा सहलाया था।
लेकिन आज…
उन्हीं हाथों से
नज़रें चुराई जा रही थीं।
आज
वही हाथ
किसी की शर्म
बन चुके थे।
पति का एक शब्द...
शाम ढल चुकी थी।
घर में सब कुछ था—
चाय की खुशबू,
घड़ी की टिक-टिक,
और बरामदे में बैठी कमला।
तभी पति ने अख़बार से नज़र उठाए बिना कहा—
“कमला,
अब ज़माना बदल गया है।
थोड़ा खुद को अपडेट कर लिया करो।”
आवाज़ में न गुस्सा था,
न प्यार—
बस आदत थी।
कमला ने कुछ नहीं कहा।
उसने सोचा था
तीस साल साथ निभाने के बाद
उसे समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
लेकिन उस एक शब्द ने
सारी उम्र को
जैसे छोटा कर दिया—
तीस साल की शादी,
एक पल में,
एक शब्द में,
कम पड़ गई।
आईने के सामने...
उस रात
कमला देवी
काफ़ी देर तक
आईने के सामने खड़ी रहीं।
कमरे में हल्की-सी रोशनी थी,
पर उनके भीतर
अंधेरा घना होता जा रहा था।
बाल वही थे,
चेहरा वही—
वही झुर्रियाँ,
वही थकान,
वही सादगी।
लेकिन आँखों में
आज कुछ बदला हुआ था।
पहली बार
उनकी नज़र
खुद से नहीं मिली।
उन आँखों में
पहली बार
अजनबीपन उतर आया था।
उन्होंने बहुत धीमे से
जैसे खुद को डराते हुए पूछा—
“क्या मैं सच में गलत हूँ?
क्या मेरी सादगी
अब मेरी सबसे बड़ी कमी बन गई है?”
आईना सामने था,
पर जवाब देने के लिए नहीं।
वह चुप था—
बिल्कुल उन लोगों की तरह
जिन्हें कभी
उनकी चुप्पी सुननी चाहिए थी।
और उस चुप्पी में
कमला देवी समझ गईं—
कभी-कभी
आईना नहीं बदलता,
टूटता इंसान है।
नकल… एक आख़िरी उम्मीद...
अगले दिन—
कमला देवी ने
अपनी सबसे प्रिय
सादी साड़ी
धीरे से उतारकर
अलमारी के कोने में रख दी।
वही साड़ी,
जिसमें उन्होंने
पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी थी।
फिर उन्होंने
बाज़ार से
रिया जैसी हल्की साड़ी खरीदी।
बिंदी भी छोटी कर ली—
जैसे पहचान भी
थोड़ी कम कर दी हो।
मोबाइल हाथ में लिया,
अनजाने डर के साथ।
दिल में बस
एक ही उम्मीद थी—
“शायद अब…
मुझे अपना लिया जाएगा।”
दर्द का मज़ाक...
योग करते हुए
उनके घुटने काँप गए,
जैसे उम्र ने
अचानक याद दिला दिया हो
कि सब कुछ
नकल से नहीं चलता।
ग्रीन टी का पहला घूँट लेते ही
सिर में दर्द उतर आया—
क्योंकि आदतें
शौक से नहीं,
सालों की ज़िंदगी से बनती हैं।
टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोली
तो हँसी उड़ाई गई,
शब्दों की नहीं,
उनके आत्मसम्मान की।
“माँ,
आपसे नहीं होगा,”
बेटे ने कहा।
और उस एक शब्द में
कमला देवी को महसूस हुआ—
कि उनसे नहीं,
उनकी पूरी ज़िंदगी से
ही
नहीं हो पाया।
सबसे गहरी चोट...
एक पारिवारिक कार्यक्रम था।
घर में हलचल थी।
कपड़े निकल रहे थे,
आईने के सामने खड़े चेहरे मुस्कुरा रहे थे,
और समय से निकलने की जल्दी थी।
कमला देवी भी तैयार थीं।
वही साड़ी,
वही सादगी,
और आँखों में
एक मासूम-सी उम्मीद।
तभी पति की आवाज़ आई—
“तुम मत चलो।
लोग सवाल करते हैं।”
शब्द छोटे थे,
लेकिन उनके भीतर
पूरी ज़िंदगी की दूरी भरी थी।
कमला देवी ने
कुछ नहीं कहा।
न कोई सवाल,
न कोई शिकायत।
बस धीरे से मुड़ीं,
कमरे के भीतर गईं।
अपने हाथों से
साड़ी का पल्लू खोला,
कंगन उतारे,
और कपड़े तह करके
पलंग के कोने पर रख दिए।
जैसे
अपनी मौजूदगी
भी उतार कर रख दी हो।
फिर पलंग पर बैठ गईं।
दरवाज़ा बंद हुआ।
कोई आवाज़ नहीं आई।
न कुंडी खड़कने की,
न कदमों के जाने की।
लेकिन उस खामोशी में
कुछ बहुत ज़ोर से टूटा था।
दिल।
और उसका टूटना
इतना तेज़ था
कि पूरी रात
कमला देवी
सो नहीं पाईं।
अकेलेपन की रात...
कमला देवी ने अलमारी के कोने से
एक पुरानी तस्वीर निकाली।
पीले पड़ चुके काग़ज़ पर
एक छोटा-सा लड़का मुस्कुरा रहा था—
उनका बेटा।
वही बेटा
जो कभी
उनकी गोद से उतरने का नाम नहीं लेता था,
जो कहता था—
“माँ, यहीं बैठो…
मेरे पास।”
आज वही बेटा
उन्हें भीड़ में देखकर
नज़रें फेर लेता था।
जो उनके पास बैठने के बजाय
उनसे दूरी बनाकर बैठता था।
कमला देवी ने तस्वीर को
सीने से लगा लिया।
उस पल
उन्होंने भगवान के सामने
हाथ नहीं जोड़े।
पहली बार
कुछ माँगा नहीं।
बस टूटे मन से
एक सवाल किया—
“हे भगवान…
क्या मेरी गोद में कुछ कमी रह गई थी?”
कुछ दिन बाद—
एक सुबह
कमला देवी
रसोई में खड़ी थीं।
दूध उबल रहा था,
लेकिन उनकी आँखों के आगे
अंधेरा छाने लगा।
हाथ से कटोरी छूट गई।
आवाज़ आई—
और फिर…
सब कुछ शांत।
अस्पताल की सफ़ेद दीवारें
बहुत कुछ कह रही थीं।
बिल्कुल उनकी ज़िंदगी की तरह—
साफ़,
सुथरी,
लेकिन बेरंग।
मशीनों की बीप-बीप के बीच
कमला देवी
चुपचाप लेटी थीं।
जैसे पूरी उम्र
चुप ही रहीं हों।
डॉक्टर ने फ़ाइल बंद की
और बहुत धीरे कहा—
“इनका शरीर नहीं टूटा है…
इनका मन थक गया है।
बरसों से ये
अपनी तकलीफ़
किसी से कह नहीं पाईं।
इन्हें दवा नहीं,
अपनापन चाहिए।
अगर ये महसूस कर लें
कि ये ज़रूरी हैं,
तो अपने आप ठीक हो जाएँगी।”
रिया
दरवाज़े के पास खड़ी
सब सुन रही थी।
उसकी आँखों से
पहली बार
चुपचाप आँसू गिरे।
आज उसे समझ आया—
जिस औरत को वह
‘आउटडेटेड’ समझती थी,
वही औरत
पूरे घर की नींव थी।
और नींव
जब दरकती है,
तो पूरा घर
हिल जाता है।
एक माफ़ी...
रिया ने धीरे से
कमला देवी का हाथ थाम लिया।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
आँखों में पछतावा था
और आवाज़ में टूटा हुआ सच—
“माँ…
मुझे माफ़ कर दीजिए।
मैं यह भूल गई थी
कि आपको बदलने की ज़रूरत नहीं थी।
गलती ये थी
कि मैंने आपको समझने की कोशिश ही नहीं की।”
कमला देवी ने
अपनी नम आँखें उठाईं।
चेहरे पर कोई शिकवा नहीं था,
बस बरसों से थकी हुई एक माँ थी।
उन्होंने बहुत धीरे कहा—
“बेटा…
मुझे कभी मॉडर्न बनने की चाह नहीं थी।
मुझे बस इतना चाहिए था
कि इस घर में
माँ बनकर रहने दिया जाए।”
आज—
कमला देवी
फिर वही साड़ी पहनती हैं।
वही सादा सा आँचल,
वही छोटी-सी बिंदी,
और वही शांत सादगी—
जो कभी उनकी पहचान थी,
और आज उनकी ताक़त है।
और रिया—
अब जब भी
आईने में खुद को देखती है,
तो सिर्फ़ अपना चेहरा नहीं,
कमला देवी की चुप तपस्या भी देखती है।
तब उसे समझ आता है—
> कुछ रिश्तों को बदलने की नहीं,
उन्हें समझकर, थामकर
सँभालने की ज़रूरत होती है।

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