उसके हिस्से की धूप


A beautiful Indian working woman standing at a city bus stop at night, softly illuminated by streetlights, sharing a gentle moment of connection with a young boy, symbolizing care, resilience, and motherhood.


शाम के लगभग साढ़े आठ बज रहे थे।


बस से उतरते समय सीमा के पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी।

दिनभर खड़ी रहकर काम करना, फिर लोकल ट्रेन की धक्का-मुक्की—

हर दिन का यही सिलसिला था।


घर पहुंचते-पहुंचते आसमान पर अंधेरा उतर आया था।


दरवाज़ा खोला तो अंदर से आवाज़ आई—

“इतनी देर! रोज़ का यही नाटक है।”


यह आवाज़ उसकी भाभी की थी।


सीमा ने कुछ नहीं कहा।

चुपचाप जूते उतारे, पर्स टांगा और सीधे रसोई की ओर बढ़ गई।


“खाना रखा है। ठंडा हो गया होगा। खुद ही गरम कर लेना।”

भाभी ने बिना पलटे कहा।


सीमा ने हल्के से सिर हिलाया।

उसके भीतर जवाब देने की ताक़त नहीं बची थी।


खाना गरम करते समय उसे ड्रॉइंग रूम से आती बातें सुनाई देने लगीं—


“पता नहीं बाहर क्या-क्या करती रहती है।

लोग पूछते हैं—इतनी जवान लड़की रोज़ रात को बाहर क्यों रहती है?”


“कुछ तो बोलो आप भी।

आपकी बहन है, पर सिर पर चढ़ती जा रही है।”


कुछ पल चुप्पी रही।

फिर भाई की धीमी आवाज़ आई—


“ज्यादा मत बोलो।

इसी की कमाई से घर चल रहा है।”


सीमा का हाथ कांप गया।

कड़ाही में रोटी जल गई।


उसने रोटी प्लेट में नहीं रखी।

सीधे कूड़े में डाल दी।


भूख वैसे भी मर चुकी थी।


कमरे में आकर वह बिस्तर पर बैठ गई।

आंखें खुली थीं, पर मन कहीं और भटक रहा था।



सीमा एक लैब टेक्नीशियन थी।

सुबह सात बजे घर से निकलती,

रात आठ-नौ बजे लौटती।


बीस साल हो गए थे उसे काम करते हुए।


जब पिता का देहांत हुआ था,

वह बारहवीं में थी।


मां बीमार रहती थीं।

छोटा भाई पढ़ाई से भागता था।


घर की ज़िम्मेदारी अपने आप उसकी गोद में आ गिरी।


उसने कभी शिकायत नहीं की।


मां के इलाज,

भाई की पढ़ाई,

फिर उसकी शादी—

सब कुछ उसी ने संभाला।


धीरे-धीरे वह “बेटी” से

“कमाने वाली” बन गई।


शादी की बात जब भी उठती,

कोई न कोई बहाना निकल आता—


“पहले भाई का घर बस जाए।”

“मां ठीक नहीं हैं।”

“थोड़ा और पैसा जमा हो जाए।”


अब उम्र चालीस पार कर चुकी थी।


बालों में सफ़ेदी,

आंखों के नीचे गहरे साये।


पर घर में किसी को फर्क नहीं पड़ता था।



एक दिन अस्पताल से लौटते समय

वह बस स्टॉप पर खड़ी थी।


वहीं पास में एक छोटा सा बच्चा

नंगे पैर,

फटे कपड़ों में

फूल बेच रहा था।


लंगड़ाकर चलता हुआ।


सीमा की नज़र वहीं अटक गई।


अगले कई दिनों तक

वह बच्चा वहीं दिखता रहा।


एक दिन उसने पूछ ही लिया—

“बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?”


“राहुल।”

उसने मुस्कराकर कहा।


सीमा ने उससे रोज़ फूल लेना शुरू कर दिया।


धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी।


पता चला—

मां-पिता नहीं हैं।

एक दूर की मौसी के यहां रहता है,

जहां उसे काम के बदले

बस दो वक्त का खाना मिलता है।


उस रात सीमा सो नहीं पाई।


उसे लगा—

किसी ने उसके भीतर दबे

मातृत्व को जगा दिया है।



उसने काग़ज़ात के बारे में जानकारी ली।

कानूनी सलाह ली।


एक छोटा-सा फ्लैट देखने गई।

जीवन में पहली बार

कुछ अपने लिए सोचा।


जब घर में बताया,

तो बवाल मच गया।


“पराया बच्चा!”

“समाज क्या कहेगा?”

“हमारी इज़्ज़त!”


सीमा पहली बार फूटी—


“इज़्ज़त तब थी

जब मैं ज़िंदा इंसान थी।

अब तो बस ATM हूं।”


उस रात उसने सिर्फ़ कमरा नहीं छोड़ा,

उसने अपने जीवन का एक पूरा अध्याय हमेशा के लिए बंद कर दिया।



कुछ महीनों बाद—


सीमा अपने छोटे से घर में

राहुल का हाथ थामे खड़ी थी।


घर में ज्यादा सामान नहीं था,

पर सुकून बहुत था।


राहुल ने झिझकते हुए पूछा—

“मैं आपको क्या बुलाऊं?”


सीमा की आंखें भर आईं।


“मां।”


राहुल ने दोहराया—

“मां।”


उस पल

सीमा को लगा—

ज़िंदगी ने

आख़िरकार

उसके हिस्से की धूप

लौटा दी है।





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