चार दीवारों के बाहर की हवा

 

Symbolic image of two Indian women showing contrasting lives, one woman standing outside in daylight holding a shopping bag representing freedom, and another woman behind a window inside a house representing restriction and limited choice.



सुबह के छह बजे थे।

अलार्म बजने से पहले ही कविता की आँख खुल चुकी थी।


रसोई में जाकर उसने चूल्हा जलाया,

दूध चढ़ाया,

और मन ही मन दिन भर के काम गिनने लगी।


आज बच्चों का टेस्ट था,

सास की दवाई खत्म हो रही थी,

और शाम तक सब्ज़ी भी लेनी थी।


इसी सोच में लगी हुई थी कि पीछे से सास की आवाज़ आई —

“कविता… जल्दी करना, तुम्हारे पति को ऑफिस देर हो रही है।”


कविता ने कुछ नहीं कहा।

बस काम तेज़ कर दिया।


थोड़ी देर में पति राहुल तैयार होकर आए,

बच्चों को टिफिन पकड़ा कर निकल गए।


घर फिर से शांत हो गया।


दोपहर तक कविता ने

कपड़े धोए,

घर साफ किया,

और सास के लिए खाना बनाया।


शाम होते-होते उसका सिर भारी हो चुका था।


जब राहुल ऑफिस से लौटे,

तो कविता का सारा जमा हुआ गुस्सा बाहर आ गया।


“पूरा दिन भाग-दौड़ में निकल जाता है,”

कविता बोली,

“घर का काम, बच्चों की जिम्मेदारी, बाजार जाना…

सब कुछ मैं ही करती हूँ।”


राहुल मोबाइल देखते हुए बोले,

“तो क्या हुआ? घर की बहू हो, काम तो करना ही पड़ेगा।”


बस…

यहीं से कविता का दिल टूट गया।


उसने कहा,

“आप सामने वाली गुप्ता आंटी की बहू को देखिए।

ना काम, ना बाजार,

घर में आराम से रहती है।

सब कुछ उसे घर बैठे मिल जाता है।”


राहुल हल्की हँसी हँस दिए।

“तुम्हें लगता है वो खुश है?”


कविता और नाराज़ हो गई।

“आपको मज़ाक ही सूझता है।”


रात चुपचाप निकल गई।



अगले दिन कविता बच्चों को स्कूल छोड़कर

सब्ज़ी लेने बाजार जा रही थी।


तभी पीछे से किसी ने धीमी आवाज़ में पुकारा —

“भाभी…”


कविता ने ध्यान नहीं दिया।


फिर आवाज़ आई —

“भाभी… ज़रा इधर देखिए…”


उसने पलटकर देखा।


सामने वाले मकान की खिड़की से

गुप्ता आंटी की बहू, नेहा, उसे इशारा कर रही थी।


कविता पास गई।


नेहा ने धीरे से कहा,

“भाभी… अगर आप बाजार जा रही हों,

तो क्या मेरे लिए नीली चूड़ियाँ ले आओगी?”


कविता हैरान रह गई।

“तुम खुद क्यों नहीं चल लेती?”


यह सुनते ही नेहा की आँखें भर आईं।


“भाभी…

मुझे बाहर जाने की इजाज़त नहीं है।

यहाँ तक कि गली में भी नहीं।”


कविता को जैसे झटका लगा।


नेहा बोली,

“जो पहनना है,

जो खाना है,

जो करना है —

सब सास-ससुर तय करते हैं।

मैं बस घर के अंदर रहती हूँ।”


तभी पीछे से सास की तेज़ आवाज़ आई —

“नेहा… अंदर आओ!”


नेहा डरते हुए अंदर चली गई।


कविता वहीं खड़ी रह गई।


उसके हाथ में सब्ज़ी की थैली थी,

पर मन भारी हो चुका था।


घर लौटते समय

कविता सोच रही थी —


मैं जिस आज़ादी को बोझ समझती थी,

वही किसी और का सपना है।


मैं थक जाती हूँ,

पर बाहर तो निकल सकती हूँ।


मैं शिकायत करती हूँ,

पर अपनी बात तो कह सकती हूँ।


शाम को राहुल घर आए।


कविता ने शांत स्वर में कहा,

“आज समझ आया…

हर मुस्कुराता घर खुश नहीं होता।”


राहुल कुछ नहीं बोले।


कविता ने आगे कहा,

“मुझे काम से परेशानी नहीं है,

बस कभी-कभी साथ चाहिए।”


राहुल ने पहली बार ध्यान से उसकी तरफ देखा।



उस रात कविता को नींद जल्दी आ गई।


अब वह जान चुकी थी —


जो हमें दूर से आसान लगता है,

वो किसी और के लिए कैद हो सकता है।


इसलिए ज़िंदगी में जो भी मिला है,

उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।


क्योंकि

आजादी अगर है,

तो थकान भी छोटी लगने लगती है।




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