जब बच्चों ने माँ-बाप के सपनों को पंख दिए

 

Elderly Indian couple sitting together in a traditional home courtyard with warm morning sunlight, emotional family moment before their honeymoon trip.


सुबह का समय था।

घर के आँगन में तुलसी के पास दीपक अभी-अभी बुझा था। हल्की धूप फर्श पर फैल रही थी।


शहर के जाने-माने व्यापारी गोपीनाथ जी अपने बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आँखों में संतोष था। उनकी पत्नी कुसुम देवी रसोई में नाश्ता बना रही थीं।


आज घर में खास रौनक थी। सबसे छोटे बेटे राहुल का विवाह दो दिन पहले ही धूमधाम से सम्पन्न हुआ था।


गोपीनाथ जी और कुसुम देवी के तीन बेटे थे। बड़े बेटे विनय और दूसरे बेटे अजय का विवाह पहले ही हो चुका था। दोनों अपने-अपने काम में लगे थे। सबसे छोटा राहुल पढ़ाई पूरी करके अभी-अभी पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगा था।


तीनों बेटों की परवरिश में गोपीनाथ जी और कुसुम देवी ने बहुत संघर्ष किया था।


करीब पच्चीस साल पहले जब वे इस शहर में आए थे, तब उनके पास कुछ भी नहीं था। किराए का छोटा सा कमरा… जिसमें एक कोने में चूल्हा, दूसरे कोने में बिस्तर और बीच में कपड़ों की गठरी रखी रहती थी।


गोपीनाथ जी ठेले पर बच्चों के कपड़े बेचते थे। गर्मी में धूप, बरसात में भीगना, सर्दी में ठिठुरना—सब सहा उन्होंने। कुसुम देवी भी खाली नहीं बैठती थीं। घर में बच्चों के कपड़े सिलतीं और शाम को पति के साथ बाजार में बैठ जातीं।


धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई। ठेला दुकान में बदला… दुकान शोरूम में बदल गई। आज शहर की मुख्य सड़क पर उनका बड़ा रेडीमेड गारमेंट्स का शोरूम था। अपना दो मंजिला मकान, गाड़ी और सम्मान—सब कुछ था।


लेकिन एक आदत नहीं बदली—अपने ऊपर खर्च करने में संकोच।


तीनों बेटों को अच्छी शिक्षा दी। बड़े बेटों की शादी अच्छे परिवारों में की। और अब राहुल का विवाह भी हो गया था।


राहुल की पत्नी नेहा साधारण परिवार की लड़की थी। उसके पिता एक स्कूल में अध्यापक थे। नेहा पढ़ी-लिखी, समझदार और बहुत संस्कारी थी।


विवाह के बाद आज पहली बार पूरा परिवार साथ बैठकर नाश्ता कर रहा था।


नाश्ते के बाद गोपीनाथ जी बोले—


“राहुल और नेहा… तुम दोनों कुछ दिन घूम आओ। शादी के बाद थोड़ा समय एक-दूसरे के साथ बिताना जरूरी होता है। पहाड़ या किसी ठंडी जगह चले जाओ।”


कुसुम देवी भी मुस्कुराईं—

“हाँ बेटा, दुकान की चिंता मत करना। सब संभाल लेंगे।”


नेहा ने धीरे से कहा—

“पिताजी… अगर आप अनुमति दें तो मैं कुछ कहना चाहती हूँ।”


“अरे बेटा, अनुमति कैसी? कहो।”


नेहा ने धीमी आवाज में कहा—

“मैंने माँ से सुना है कि आपने और पिताजी ने कभी कहीं घूमने का समय ही नहीं निकाला। हमेशा बच्चों और काम के लिए ही जीते रहे।”


दोनों चुप हो गए।


नेहा आगे बोली—

“हम तो कभी भी घूम सकते हैं। लेकिन आप दोनों ने जो जीवनभर त्याग किया… उसका आनंद लेने का समय अब आया है।”


राहुल मुस्कुराया और बोला—

“हाँ पिताजी, इस बार हम नहीं… आप दोनों घूमने जाएंगे।”


गोपीनाथ जी हँस पड़े—

“अरे हम बूढ़े लोग कहाँ जाएंगे?”


राहुल ने फाइल निकालकर उनके सामने रख दी।


“यह आपके लिए केरल के बैकवॉटर और पहाड़ों का दस दिन का टूर पैकेज है। टिकट, होटल, सब बुक हो चुका है।”


कुसुम देवी के हाथ काँप गए।

“ये सब… हमारे लिए?”


नेहा ने उनके पास बैठते हुए कहा—

“माँ, आपने हमें बचपन में सिखाया था कि परिवार में सबसे पहले बड़ों का सम्मान होना चाहिए। अब हमारी बारी है।”


घर में सन्नाटा छा गया। बड़े बेटे और बहुएँ भी भावुक हो उठीं।


अजय बोला—

“पापा, इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा। हम सब मिलकर दुकान संभाल लेंगे।”


गोपीनाथ जी की आँखों में आँसू आ गए।

“हमने तो कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे बच्चे हमारे लिए ऐसा सोचेंगे।”


नेहा हँसते हुए बोली—

“और हाँ माँ, वहाँ से मेरे लिए केरल की एक साड़ी जरूर लाना।”


सब हँस पड़े।


कुछ दिन बाद जब गोपीनाथ जी और कुसुम देवी हवाई जहाज में बैठे थे, तो दोनों के हाथ एक-दूसरे के हाथों में थे। जैसे वर्षों बाद उन्हें अपने लिए जीने का अवसर मिला हो।


गोपीनाथ जी बोले—

“कुसुम, लगता है सच में जीवन का नया अध्याय शुरू हो रहा है।”


कुसुम देवी मुस्कुराईं—

“हाँ, और ये अध्याय हमारे बच्चों ने लिखा है।”


घर पर राहुल और नेहा बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे।


राहुल बोला—

“नेहा, तुमने सच में बहुत बड़ा काम किया।”


नेहा ने मुस्कुराकर कहा—

“परिवार वही होता है जहाँ हर पीढ़ी दूसरी पीढ़ी का हाथ थामे।”


बरामदे में हवा चल रही थी।

आँगन में तुलसी के पत्ते हिल रहे थे।

और उस घर में पहली बार माता-पिता के सपनों की बारी आई थी।


सीख:

सच्चा सुख केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि उन लोगों को खुश देखने में है जिन्होंने हमें जीवन दिया।




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