ताले में बंद रिश्ते

Elderly Indian couple enjoying tea and pakoras with their son and daughter-in-law during monsoon rain inside a warm family home.


दोपहर का समय था।

घर के आँगन में धूप हल्की-हल्की फैल रही थी।


शंकरलाल जी अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। उम्र ढल चुकी थी, पर आँखों में अभी भी अपनापन और सादगी झलकती थी। उनकी पत्नी कमला जी रसोई में चाय बना रही थीं।


अचानक आसमान में बादल घिर आए। हवा चलने लगी और देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।


शंकरलाल जी मुस्कुराए,

“कमला, देखो ना… कैसी सुहानी बारिश हो रही है। ऐसे मौसम में गरम चाय और मिर्ची वाले पकौड़े मिल जाएं तो मज़ा आ जाए।”


कमला जी हँस पड़ीं,

“अभी लाती हूँ जी… आप भी ना, बारिश देखते ही बच्चे बन जाते हैं।”


थोड़ी देर में रसोई से तलते हुए पकौड़ों की खुशबू पूरे घर में फैल गई। दोनों पति-पत्नी ने साथ बैठकर चाय और थोड़े से पकौड़े खाए। उनके चेहरे पर संतोष था।


शाम को उनका बेटा रोहन और बहू निधि ऑफिस से लौटे। निधि सीधे रसोई में गई। कड़ाही में थोड़ा तेल और प्लेट में बेसन के दाग देखकर उसका माथा सिकुड़ गया।


“मम्मी जी, ये सब क्या है?”


कमला जी ने सहजता से कहा,

“बारिश हो रही थी तो तुम्हारे पापा को पकौड़े खाने का मन हो गया… बस थोड़े से बना दिए।”


निधि का चेहरा बदल गया।

“आपको पता है सब चीज़ें कितनी महंगी हो गई हैं? हम कितनी मेहनत करते हैं! और आप लोग यूँ ही खर्च कर देते हैं!”


शंकरलाल जी अंदर कमरे में सब सुन रहे थे। उनका दिल दुख गया। कमला जी ने धीरे से कहा,

“बेटा, रोज थोड़ी ना बनाते हैं… बस आज…”


निधि ने गुस्से में कहा,

“अब से रसोई में बिना पूछे कुछ नहीं बनेगा!”


उस दिन के बाद माहौल बदल गया।

निधि सुबह ऑफिस जाते समय रसोई की अलमारी लॉक कर देती। खाना प्लेट में निकालकर रख देती, पर कमला जी को वह अपनापन नहीं मिलता था।


शंकरलाल जी समझ जाते थे, पर बेटे के घर में कलह न हो इसलिए चुप रहते।


एक दिन अचानक दोपहर में दरवाज़े की घंटी बजी।

दरवाज़ा खोला तो सामने निधि की माँ सविता जी खड़ी थीं।


कमला जी ने मुस्कुराकर स्वागत किया। पानी दिया। लेकिन रसोई का ताला देखकर सविता जी चौंक गईं।


उन्होंने बालकनी में खड़ी कमला जी को फोन करते सुना —

“निधि, बेटा… चाबी दे दो, तुम्हारी मम्मी आई हैं…”


उधर से फोन कट गया।


सविता जी सब समझ गईं। उनका दिल बैठ गया।


शाम को उन्होंने रोहन को खुद फोन करके बुला लिया।


जब रोहन आया तो सविता जी ने शांत आवाज़ में कहा,

“बेटा, क्या तुम्हें पता है तुम्हारे घर में क्या हो रहा है?”


रोहन हैरान था।


सारी बात सुनकर वह स्तब्ध रह गया।

“मम्मी, आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”


शंकरलाल जी ने धीमे से कहा,

“बेटा, तुम्हारा घर टूटे नहीं… इसलिए चुप रहे।”


रोहन की आँखें भर आईं।


तभी निधि भी घर आ गई। माहौल देखकर वह समझ गई कि बात खुल चुकी है।


रोहन ने सख़्त स्वर में कहा,

“निधि, मेरे माता-पिता का सम्मान मेरे लिए सबसे पहले है। खर्चे की चिंता ठीक है, पर अपमान नहीं। अगर तुम उनसे प्यार और इज्ज़त से पेश नहीं आओगी तो यह मुझे स्वीकार नहीं।”


निधि चुप हो गई। पहली बार उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।


सविता जी ने बेटी की ओर देखा और बोलीं,

“आज जो तुम अपनी सास-ससुर के साथ कर रही हो, वही कल तुम्हारे साथ भी हो सकता है। सोचो, अगर तुम्हारा भाई हमारे साथ ऐसा करे तो?”


निधि की आँखों से आँसू बह निकले।

वह कमला जी के पैरों में झुक गई।

“मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”


कमला जी ने तुरंत उसे उठाकर गले लगा लिया।

“बेटा, घर प्यार से चलता है, हिसाब से नहीं।”


अगले रविवार की सुबह।

बारिश फिर से हो रही थी।


निधि खुद रसोई में गई और बोली,

“मम्मी जी, आज आपके स्पेशल पकौड़े बनेंगे। मैं आपकी मदद करूँगी।”


कमला जी मुस्कुराईं।

शंकरलाल जी ने अख़बार से झाँककर कहा,

“लगता है आज मौसम सच में सुहाना है।”


चारों लोग साथ बैठे। चाय की भाप, पकौड़ों की खुशबू और दिलों में फिर से लौटी गर्माहट — घर सच में घर लग रहा था।


क्योंकि बुज़ुर्ग बोझ नहीं होते,

वे उस पेड़ की जड़ होते हैं

जिसकी छाया में पूरा परिवार फलता-फूलता है। 





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