रोज़ की थाली और सौ किलो घी

An Indian woman cooking in a traditional kitchen early in the morning, standing near a stove with a pan of ghee, showing a calm yet thoughtful expression.


सुबह के पाँच बजे थे।

रसोई में चूल्हा जल चुका था और कढ़ाही में घी पिघल रहा था।


स्मिता की आँखें आधी खुली थीं,

लेकिन हाथ अपने आप चल रहे थे—

जैसे आदत ने नींद को भी हरा दिया हो।


“आज फिर घी ज़्यादा डालना है,”

उसने मन ही मन बड़बड़ाया,

“वरना घरवाले कहेंगे स्वाद नहीं आया।”


स्मिता को घी बिल्कुल पसंद नहीं था।

लेकिन उसके ससुराल में

घी सिर्फ खाने की चीज़ नहीं,

सम्मान का प्रतीक था।


कम घी मतलब—

प्यार कम।



सौ किलो घी की सुबह...


तभी बाहर से आवाज़ आई—


“बहू… ट्रक आ गया!”


स्मिता के हाथ रुक गए।


ट्रक?


वो बाहर आई तो देखा—

घर के सामने एक बड़ा सा ट्रक खड़ा था।

दो आदमी नीचे उतर रहे थे।


“कितना घी है?”

स्मिता ने डरते-डरते पूछा।


ड्राइवर हँस पड़ा—

“अरे भाभी जी, रोज़ का है…

पूरा सौ किलो।”


स्मिता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


“सौ… किलो?”



घी प्रेमी परिवार...


घर के अंदर सब बड़े खुश थे।


ससुर जी बोले—

“अरे वाह! आज का घी ताज़ा है क्या?”


सासू माँ ने ताली बजाई—

“आज तो पराठे नहाएँगे घी में!”


देवर बोला—

“भाभी, आज हलवा भी बनाना,

घी कम मत डालना।”


स्मिता बस मुस्कुरा दी।

बोलने की ताक़त नहीं बची थी।



रसोई का हाल...


रसोई में घी की खुशबू नहीं,

घी का धुआँ उठ रहा था।


पराठे, पूरियाँ, हलवा, कढ़ी—

हर चीज़ घी में तैर रही थी।


स्मिता की हथेलियाँ जल रही थीं,

कपड़ों में घी की चिकनाहट बस गई थी।


“हे भगवान,”

वो मन में बोली,

“इतना घी खाकर

ये लोग ज़िंदा कैसे रहते हैं?”



पड़ोसियों की लाइन...


दोपहर होते-होते

गेट पर भीड़ लग गई।


“भाभी, ज़रा दो किलो घी दे देना।”

“अरे दीदी, आज का ताज़ा है ना?”

“थोड़ा एक्स्ट्रा डाल देना।”


स्मिता घी बाँटती रही।

कभी डिब्बे में,

कभी कटोरी में।


वो सोच रही थी—

“हम खाना कम खाएँ

तो भी चलेगा,

पर ये घी खत्म क्यों नहीं होता?”



नतीजा दिखने लगा...


कुछ महीनों बाद

घर का नज़ारा बदल गया।


सीढ़ियाँ दुश्मन बन गईं।

सोफ़ा पकड़कर उठना पड़ता था।

चलते-चलते साँस फूल जाती थी।


सासू माँ बोलीं—

“लगता है घर में लिफ्ट लगवानी पड़ेगी।”


देवर हँसते हुए बोला—

“या फिर व्हीलचेयर!”


सब हँस दिए।

स्मिता नहीं हँसी।



बाहर की दुनिया...


बेटी पूजा जब कॉलेज जाती,

तो रास्ते में फुसफुसाहटें सुनाई देतीं—


“अरे ज़रा साइड हटो,

घी का टैंकर आ रहा है!”


कुछ लड़के हँसते,

कुछ जानबूझकर ज़ोर से बोलते,

ताकि उसकी सुनाई जाए।


पूजा सिर झुका लेती,

कदम तेज़ कर लेती,

लेकिन शब्द

पीछा नहीं छोड़ते थे।


वहीं ऑफिस में पति को भी

हर दिन किसी न किसी का ताना झेलना पड़ता—


“भाई, कुर्सी मज़बूत है ना?”

“आजकल टेस्टिंग चल रही है,

टूट न जाए।”


चारों तरफ हँसी गूँजती,

और वो भी

मजबूरी में मुस्कुरा देता।


लेकिन ये हँसी

अब मज़ाक नहीं रह गई थी।


धीरे-धीरे

यही हँसी

शर्म बन गई,

और शर्म

एक ऐसा बोझ,

जो हर दिन

कंधों पर और भारी होता जा रहा था।



डॉक्टर की चेतावनी...


एक दिन अचानक सासू माँ रसोई में ही चक्कर खाकर ज़मीन पर गिर पड़ीं।

घबराहट में पूरा घर इकट्ठा हो गया।

किसी ने पानी छिड़का, किसी ने नाम पुकारा,

लेकिन उनकी आँखें बंद ही रहीं।


जल्दी-जल्दी उन्हें अस्पताल ले जाया गया।


डॉक्टर ने रिपोर्ट देखते ही गंभीर आवाज़ में कहा—

“इनका कोलेस्ट्रॉल बहुत ज़्यादा बढ़ चुका है।

अब घी, मक्खन, तला-भुना सब तुरंत बंद करना होगा।

अगर अब भी ध्यान नहीं दिया गया,

तो दिल से जुड़ी बड़ी परेशानी हो सकती है।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।

सब लोग बस चुपचाप सिर हिलाते रहे।


घर लौटने के बाद,

सासू माँ बिस्तर पर बैठीं और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलीं—

“घी थोड़ा कम कर देंगे…

पर पूरी तरह छोड़ना मेरे बस की बात नहीं है।”


ये सुनते ही स्मिता की आँखें भर आईं।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि

डर बड़ा है या आदत।

जान ज़्यादा कीमती है

या स्वाद।


वो चुप रही,

लेकिन उसके दिल में कहीं कुछ टूट सा गया।



आख़िर सच सामने आया...


एक शाम स्मिता ने धीरे से कहा—


“माँ जी…

आप लोगों को देखकर

मुझे सच में डर लगता है।”


उसकी आवाज़ में न गुस्सा था,

न शिकायत—

बस चिंता थी।


कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

टीवी की आवाज़ भी जैसे खुद ही धीमी हो गई।


स्मिता ने आगे कहा—


“खाना अगर हमें ताक़त देने के बजाय

हमारी ज़िंदगी छोटा करने लगे,

तो फिर उस खाने का क्या मतलब?”


कोई कुछ नहीं बोला।


तभी पूजा की आँखें भर आईं।

वो खुद को रोक नहीं पाई और रोते हुए बोली—


“माँ…

मुझे हर जगह मोटी कहकर चिढ़ाया जाता है।

कॉलेज में, रास्ते में, हर जगह।

सब हँसते हैं…

और मुझे बहुत बुरा लगता है।”


उसकी सिसकियों ने

कमरे की चुप्पी को और गहरा कर दिया।


धीरे-धीरे

सबकी नज़रें झुक गईं।

कोई जवाब नहीं था,

क्योंकि अब सच

सबके सामने खड़ा था।



फैसला...


अगले दिन

घर के सामने कोई ट्रक नहीं रुका।


न सौ किलो घी आया,

न भारी डिब्बों की आवाज़ सुनाई दी।


उस दिन रसोई में

बस ज़रूरत भर घी आया—

न ज़्यादा, न कम।


शुरू में सबको अजीब लगा,

जैसे बरसों पुरानी आदत

अचानक छूट गई हो।


लेकिन थोड़ी ही देर में

मन भी हल्का होने लगा,

और शरीर भी।


सुबह-सुबह

टहलने की आदत पड़ने लगी।


घी और तेल कम हुए,

सब्ज़ियाँ बढ़ीं।


और घर में

खाना अब

सिर्फ़ स्वाद के लिए नहीं,

सेहत के लिए बनने लगा।




कुछ महीनों बाद सब कुछ बदल चुका था।


जो सासू माँ कभी दरवाज़े तक आते-आते थक जाती थीं,

अब खुद बाज़ार तक पैदल चली जाती थीं।


ससुर जी, जो सीढ़ियों को दुश्मन समझने लगे थे,

अब बिना सहारे धीरे-धीरे ऊपर चढ़ जाते थे।


और पूजा—

जिसकी हँसी कहीं खो सी गई थी,

वो फिर से खुलकर हँसने लगी थी।


रसोई में स्मिता खड़ी थी।

आज कढ़ाही में घी कम था,

लेकिन उसके चेहरे पर सुकून कहीं ज़्यादा।


वो हल्की मुस्कान के साथ बोली—


“अब खाना

दिखावे के लिए नहीं,

ज़िंदगी निभाने के लिए बनता है।


अब खाना

पेट के लिए है,

दिखावे के लिए नहीं।”




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.