मां की खामोश कुर्बानी

 

Emotional Indian mother sitting alone at night during wedding preparations, reflecting on her daughter’s expectations and past memories, traditional home with warm lights


रात के बारह बजने को थे…

आंगन में टंगी हल्की पीली लाइट दीवारों पर थकी हुई परछाइयाँ बना रही थी।

पूरा घर शादी की तैयारियों से भरा हुआ था—कहीं हल्दी के बर्तन रखे थे, कहीं सूट और साड़ियाँ करीने से टंगी थीं, और कहीं रिश्तेदारों के आने के लिए बिस्तर लगाए जा रहे थे।


लेकिन इस सारी हलचल के बीच मैं चुपचाप छत पर बैठी थी…


थकी तो बहुत थी… शरीर जवाब दे चुका था…

लेकिन मन—मन जैसे कहीं अटक गया था।


आज शाम रिया ने जो कहा था… वही बार-बार कानों में गूंज रहा था—


“मम्मी, सबकी शादी में कितना अच्छा-अच्छा होता है… और आप कह रही हैं कि ये वाला सेट नहीं ले सकते? आपने इतने सालों में मेरे लिए आखिर रखा ही क्या है?”


उसकी आवाज़ में शिकायत थी… गुस्सा था… और कहीं ना कहीं एक दूरी भी…


मैंने उसे समझाने की कोशिश की थी—

“बेटा… हर चीज़ पैसे से नहीं होती… और जो हम कर सकते हैं वही करेंगे…”


लेकिन वो सुनने के मूड में नहीं थी…

दरवाज़ा बंद करके अंदर चली गई थी।


और मैं… वहीं खड़ी रह गई थी।



छत पर बैठी-बैठी अचानक एक पुरानी याद सामने आकर खड़ी हो गई…


आज से करीब पच्चीस साल पहले…

जब मेरी खुद की शादी होने वाली थी।


मैं भी बिल्कुल रिया जैसी ही थी—उम्र कम, सपने बड़े, और समझ थोड़ी कम…


मुझे अपनी शादी के लिए एक खास साड़ी चाहिए थी—महंगी, बहुत महंगी…

मां ने कहा था—


“बेटा… ये साड़ी बहुत महंगी है… हम थोड़ी सस्ती ले लेते हैं… बाकी पैसे तेरे गहनों में काम आएंगे…”


लेकिन मैंने साफ मना कर दिया था—


“नहीं मम्मी! मुझे वही चाहिए… मेरी सहेली ने भी वही ली है…”


मां चुप हो गई थीं…

उनकी आंखों में एक हल्की सी चिंता मैंने देखी थी…

लेकिन उस वक्त मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया।


कुछ दिनों बाद…

वो साड़ी मेरे सामने रखी थी…


मैं खुश थी… बहुत खुश…

लेकिन शायद पहली बार मां की मुस्कान पूरी नहीं थी।



शादी के बाद जब मैं पहली बार मायके गई…

तब पड़ोस की आंटी ने यूं ही कहा—


“तेरी मां ने तेरी उस साड़ी के लिए अपने कंगन बेच दिए…”


मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी…


मैं भागकर मां के पास गई—


“मम्मी… आपने बताया क्यों नहीं?”


मां मुस्कुराईं—


“बेटी की खुशी में मां को क्या बताना…”


उस दिन पहली बार…

मैं मां के गले लगकर बहुत रोई थी…



छत पर बैठी मैं दूर आसमान को देख रही थी…

लेकिन आंखें नम थीं और नजरें कहीं भीतर अटक गई थीं।


सालों पुरानी यादें जैसे एक-एक करके सामने आ खड़ी हुईं…


आज एहसास हुआ कि वक्त सच में घूमकर वहीं ले आता है,

जहां से कभी हम खुद गुज़रे होते हैं।


आज मैं उसी जगह खड़ी थी…

जहां कभी मेरी मां खड़ी थीं।


फर्क बस इतना था—

तब मैं उनकी भावनाएं समझ नहीं पाई थी…

और आज मेरी बेटी मेरी भावनाएं नहीं समझ पा रही।



अगले दिन सुबह…


मैंने धीरे से अपनी अलमारी खोली…


अंदर कोने में रखा एक छोटा-सा डिब्बा नजर आया।


मैंने उसे संभालकर बाहर निकाला…


उसके भीतर मेरी शादी के कुछ पुराने गहने रखे थे—


और वही कंगन भी… जो मां ने बाद में बनवाए थे।


मैंने कंगनों को अपने हाथों में लिया…


उन्हें कुछ देर तक चुपचाप देखती रही…


हर चमक में जैसे कोई पुरानी याद झिलमिला रही थी।


फिर एक गहरी सांस ली…


और धीरे से उन्हें वापस डिब्बे में रखकर…


बैग में सहेज लिया।



दोपहर तक मैं ज्वेलरी शॉप से वापस लौटी…


हाथ में एक छोटा सा पैकेट था…


रिया कमरे में बैठी थी… फोन चला रही थी…

मैंने बिना कुछ कहे वो पैकेट उसके सामने रख दिया।


उसने खोला…


अंदर वही सेट था… जो उसे पसंद था।


उसकी आंखें चमक उठीं—


“मम्मी! ये… आपने कैसे…?”


मैंने बस मुस्कुराकर कहा—


“मां के पास रास्ते खुद बन जाते हैं…”


वो खुश होकर मुझे गले लगाने आई…

लेकिन तभी उसकी नजर मेरे हाथों पर पड़ी—


“मम्मी… आपके कंगन…?”


मैंने हल्के से कहा—


“पुराने थे… वैसे भी अब जरूरत नहीं थी…”


रिया कुछ पल चुप रही…


फिर धीरे से बोली—


“मम्मी… क्या मैंने आपको मजबूर किया?”


उसकी आवाज़ बदल चुकी थी…


अब उसमें गुस्सा नहीं…

पछतावा था।


मैंने उसके सिर पर हाथ रखा—


“नहीं बेटा… ये मजबूरी नहीं… मां की खुशी है…”


रिया की आंखों से आंसू बहने लगे…


वो मेरे गले लग गई—


“मम्मी… मुझे नहीं चाहिए ये सेट… मुझे आप चाहिए…”


मैंने उसे कसकर पकड़ लिया…


इस बार…

मैंने उसे रोने दिया।


क्योंकि कुछ आंसू रिश्तों को कमजोर नहीं…

और मजबूत बना देते हैं।



शादी के दिन…


रिया बहुत सुंदर लग रही थी…

लेकिन सबसे खूबसूरत चीज़ थी उसकी आंखों की वो समझ…


विदाई के वक्त…


वो मुझसे लिपटकर खूब रोई…


और मेरे कान में धीरे से कहा—


“मम्मी… मैं आपकी तरह बनना चाहती हूँ… लेकिन आपकी तरह गलती नहीं करूँगी…”


मेरी आंखें भर आईं…


मैंने बस इतना कहा—


“बस इतना याद रखना…

मां कभी गलत नहीं होती…

बस हम उसे देर से समझते हैं…”



उस दिन मुझे लगा…


शायद वक्त सच में खुद को दोहराता है…

लेकिन अगर समझ आ जाए…

तो कहानी बदल भी जाती है… 



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