अधूरी चिट्ठी

Emotional reunion of an Indian father and daughter after many years at a rainy bus stop, with a young mother and child, expressing love, regret, and forgiveness



बारिश धीरे-धीरे हो रही थी…

सड़क पर पानी जमा था और लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों की ओर जा रहे थे।


शेखर जी बस स्टॉप के पास खड़े थे।

हाथ में पुरानी डायरी थी…


आज उन्हें इस शहर आए हुए पूरे 10 साल हो गए थे।


उन्होंने डायरी खोली…

अंदर एक पुरानी, आधी फटी चिट्ठी रखी थी।


वो चिट्ठी उनकी बेटी सिया की थी…

जो 10 साल पहले घर छोड़कर चली गई थी।



“पापा, मैं अपनी जिंदगी खुद चुनना चाहती हूं…”


बस यही लिखा था उस चिट्ठी में…

आगे का हिस्सा फटा हुआ था।


उस दिन के बाद…

न सिया का कोई फोन आया… न कोई खबर।



बारिश तेज हो गई।


तभी सामने सड़क के उस पार एक औरत नज़र आई।


उसके एक हाथ में छाता था और दूसरे हाथ से वह अपने छोटे से बच्चे को संभाले हुए थी।


बारिश की बूंदें अब भी हल्के-हल्के गिर रही थीं। बच्चा भीगने से बचते हुए उसकी साड़ी पकड़कर चल रहा था।


बच्चे ने मासूमियत से कहा—

“मम्मा… मुझे बहुत भूख लगी है…”


औरत ने झुककर उसके चेहरे को सहलाया और प्यार से बोली—

“बस बेटा… थोड़ी देर और… सामने दुकान है, वहीं से कुछ दिला दूंगी…”


बच्चा उसकी बात सुनकर थोड़ा शांत हो गया और उसके साथ-साथ धीरे-धीरे चलने लगा।



शेखर जी की नजर उस औरत पर टिक गई…


दिल ने कहा—

“ये… ये सिया है…”


दिमाग ने कहा—

“नहीं… ऐसा कैसे हो सकता है…”



लेकिन जैसे ही वो औरत करीब आई…


दोनों की आंखें मिलीं…


छाता हाथ से छूट गया…


“पापा…?”



शेखर जी के होंठ कांपने लगे—


“सिया…?”



दोनों कुछ पल तक बस एक-दूसरे को देखते रहे…


जैसे 10 साल एक पल में सिमट आए हों।



“आप… यहां?”


सिया की आवाज में डर भी था… और अपनापन भी।



शेखर जी ने धीरे से पूछा—

“तू ठीक है?”



सिया हल्का सा मुस्कुराई—

“ठीक हूं… जी रही हूं…”



बच्चा उनके पास आ गया—

“मम्मा ये कौन है?”



सिया कुछ बोल नहीं पाई…


शेखर जी ने खुद ही कहा—

“मैं… तुम्हारा नाना हूं…”



बच्चा मासूमियत से मुस्कुराया—

“नाना…?”


सिया की आंखें भर आईं…



“चलो… कहीं बैठते हैं…”



तीनों पास की एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठ गए।


बारिश अभी भी जारी थी…



कुछ देर चुप्पी रही…


फिर शेखर जी ने पूछा—


“जिसके लिए गई थी… वो…?”



सिया ने कप पकड़ते हुए कहा—


“शुरू में सब ठीक था पापा…

लेकिन… धीरे-धीरे सब बदल गया…”



“वो मुझे समझता ही नहीं था…

न जिम्मेदारी… न परिवार…”



“फिर एक दिन… वो चला गया…”



“कहां?”



“किसी और के साथ…”



शेखर जी चुप हो गए…



“मैंने बहुत इंतजार किया…

फिर समझ आ गया… कि अब मुझे खुद ही जीना होगा…”



“ये मेरा बेटा… आरुष…”



“मैं लोगों के घर काम करती हूं…

और इसे स्कूल भेजती हूं…”



शेखर जी की आंखें भर आईं…



“एक बार भी याद नहीं आया… अपने घर का?”



सिया रो पड़ी—


“हर दिन आता था पापा…

लेकिन डर लगता था…

कि आप लोग मुझे अपनाएंगे या नहीं…”



शेखर जी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया—


“पागल लड़की…

मां-बाप कभी दरवाजा बंद नहीं करते…”



सिया फूट-फूट कर रोने लगी…



“चल… घर चलते हैं…”



सिया ने धीरे से पूछा—

“क्या… सच में?”



“तेरी मां आज भी तेरे कमरे को वैसे ही संभालकर रखती है…”



बच्चा खुश होकर बोला—

“मम्मा हम नाना के घर जाएंगे?”



सिया ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए कहा—

“हां बेटा…”



बारिश अब रुक चुकी थी…


आसमान साफ हो गया था…



शेखर जी ने अपनी डायरी खोली…

और उस अधूरी चिट्ठी को देखा…


फिर मुस्कुराते हुए उसे फाड़ दिया…



क्योंकि…

अब कहानी अधूरी नहीं रही थी।



सीख:

गलत फैसले जिंदगी बदल सकते हैं…

लेकिन रिश्ते… अगर सच्चे हों…

तो कभी खत्म नहीं होते।




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