माँ का सम्मान
शाम का समय था…
खिड़की से आती हल्की हवा कमरे के पर्दों को हिला रही थी।
सरोज जी रसोई में खड़ी थीं।
एक हाथ से दाल चला रही थीं और दूसरे हाथ से अपनी पोती परी को गोद में संभाले हुए थीं।
“माँ… ज़रा जल्दी करो ना, हमें देर हो रही है!”
बाहर से उनके बेटे अमित की आवाज़ आई।
सरोज जी बोलीं,
“बस बेटा, खाना तैयार है… लेकिन परी को अभी दूध देना पड़ेगा, बहुत रो रही है।”
तभी बहू रिया तेज़ कदमों से आई और बोली—
“मम्मी जी, आप ही संभाल लीजिए ना… मैं और अमित बाहर डिनर के लिए जा रहे हैं। बहुत दिनों बाद टाइम मिला है।”
सरोज जी ने धीरे से कहा,
“ठीक है बहू… लेकिन मैं भी थोड़ा थक गई हूँ… दिन भर से इसे संभाल रही हूँ…”
रिया ने बिना उनकी बात पूरी सुने ही जवाब दे दिया—
“अरे मम्मी जी, आप तो घर पर ही रहती हैं… थकान कैसी?”
ये सुनकर सरोज जी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
उनकी आँखों में हल्की नमी आ गई… लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
रात के 12 बज चुके थे।
परी लगातार रो रही थी…
सरोज जी उसे गोद में लेकर कमरे में चक्कर लगा रही थीं।
उसी समय अमित गुस्से में बाहर आया और बोला—
“माँ! ये क्या है? बच्चा कब से रो रहा है! हमें सोने भी नहीं दे रही आप!”
सरोज जी बोलीं,
“बेटा, शायद पेट दर्द है… मैं संभाल रही हूँ…”
अमित झल्लाते हुए बोला—
“आपसे एक बच्चा नहीं संभलता! हमने आपको यहाँ इसी काम के लिए बुलाया है!”
ये शब्द सुनकर सरोज जी के कदम वहीं रुक गए…
उनके दिल पर जैसे किसी ने जोर से चोट मारी हो।
अगले दिन…
सुबह सरोज जी को तेज़ बुखार था।
फिर भी वे उठकर रसोई में काम कर रही थीं।
रिया ने देखा और बोली—
“मम्मी जी, अगर आप ठीक नहीं हैं तो आराम कर लीजिए… लेकिन परी को संभालना पड़ेगा, मेरी मीटिंग है।”
सरोज जी हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“हाँ बहू… मैं संभाल लूँगी…”
लेकिन अंदर ही अंदर वे टूट चुकी थीं।
दोपहर को…
सरोज जी ने अमित से कहा—
“बेटा, मुझे गाँव वापस जाना है…”
अमित चौंक गया—
“क्यों माँ? अचानक?”
सरोज जी बोलीं—
“मैं अब तुम्हारे काम की नहीं रही…
न बच्चा ठीक से संभाल पा रही हूँ…
न तुम्हारी उम्मीदों पर खरी उतर पा रही हूँ…”
अमित थोड़ा झेंप गया,
“माँ, मैंने तो ऐसे ही कह दिया था…”
सरोज जी ने शांत स्वर में कहा—
“कुछ बातें ‘ऐसे ही’ नहीं होती बेटा… दिल पर लग जाती हैं…”
अगले दिन…
सरोज जी चुपचाप अपना सामान लेकर गाँव चली गईं।
अब घर में सब कुछ बदल गया…
रिया को अकेले बच्चा संभालना मुश्किल हो गया।
अमित को ऑफिस और घर दोनों का तनाव होने लगा।
आखिरकार उन्होंने एक आया रखी।
लेकिन आया न तो बच्चे को सही से संभाल पाती थी,
न ही घर का ध्यान रख पाती थी।
ऊपर से उसकी तनख्वाह भी बहुत ज्यादा थी।
एक दिन…
परी तेज़ बुखार में थी।
रिया घबरा गई।
“अमित… मम्मी होतीं तो सब संभाल लेतीं…”
रिया रोते हुए बोली।
अमित चुप था…
आज उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था।
कुछ दिनों बाद…
अमित गाँव गया माँ को लेने।
सरोज जी आँगन में बैठी थीं…
चेहरे पर शांति थी।
अमित उनके पास गया और बोला—
“माँ… मुझे माफ़ कर दो… घर चलो ना…”
सरोज जी ने उसकी ओर देखा और बोलीं—
“बेटा… मैं नाराज़ नहीं हूँ… बस अब खुद को समझ लिया है…”
अमित की आँखें भर आईं—
“माँ… आपके बिना घर अधूरा है…”
सरोज जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“घर माँ से नहीं… सम्मान से पूरा होता है…”
ये शब्द सुनकर अमित का सिर झुक गया।
कुछ दिनों बाद…
अमित को एक कागज़ मिला…
वो सरोज जी की वसीयत थी।
उसमें लिखा था—
“मेरी सारी संपत्ति एक वृद्धाश्रम को दी जाती है…
ताकि वहाँ रहने वाली माँओं को वो सम्मान मिल सके,
जो मुझे अपने ही घर में नहीं मिला…”
अमित उस कागज़ को हाथ में लेकर फूट-फूट कर रो पड़ा…
उसे समझ आ गया था—
उसने सिर्फ अपनी माँ को नहीं खोया,
बल्कि अपना सबसे बड़ा सहारा खो दिया।
सीख:
माँ-बाप सेवा के लिए नहीं, सम्मान के लिए होते हैं।
जब तक वो साथ हैं, उनकी कदर करना सीखो… क्योंकि बाद में सिर्फ पछतावा रह जाता है।

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