गलत को नाम देना जरूरी है
दरवाज़े पर लगी घंटी बार-बार बज रही थी…
निधि ने घड़ी की तरफ देखा—रात के साढ़े नौ बज चुके थे। इतनी देर से कौन हो सकता है?
दरवाज़ा खोलते ही सामने उसकी आठ साल की बेटी सिया खड़ी थी—चेहरा उतरा हुआ, आँखें डरी हुई।
“मम्मा… मैं ऊपर नहीं जाऊँगी…”
निधि चौंक गई, “क्या हुआ? अभी तो तुम ऊपर पूजा में गई थी ना?”
सिया ने सिर हिलाया और धीरे से बोली, “मुझे अच्छा नहीं लगता वहाँ…”
निधि का दिल धक से रह गया।
ऊपर उनके किरायेदार रहते थे—राकेश और उसका बीस साल का बेटा विकास।
निधि ने कई बार नोटिस किया था कि विकास सिया से बहुत जल्दी घुलने की कोशिश करता है—बार-बार बात करना, पास बैठना, मोबाइल दिखाने के बहाने बुलाना…
लेकिन हर बार उसने खुद को समझाया—“शायद मैं ज्यादा सोच रही हूँ…”
“क्या हुआ बेटा? साफ-साफ बताओ…” उसने सिया को पास बैठाते हुए पूछा।
सिया कुछ पल चुप रही… फिर धीरे से बोली—
“वो भैया… मुझे बार-बार अपने पास बैठाते हैं… और जब मैं उठती हूँ तो हाथ पकड़ लेते हैं…”
निधि के हाथ ठंडे पड़ गए।
“और?” उसकी आवाज़ भारी हो गई।
“मुझे अच्छा नहीं लगता… मैंने कहा भी… लेकिन वो हंसते हैं…”
बस… अब कोई शक नहीं बचा था।
निधि के अंदर कुछ टूटने के बजाय इस बार कुछ मजबूत हो गया।
उसी वक्त उसका पति आलोक घर आया।
निधि ने बिना घुमाए सीधे बात रख दी।
“आलोक, हमें ऊपर वालों से बात करनी है। अभी।”
आलोक ने भौंहें सिकोड़ लीं, “क्या हुआ?”
निधि ने पूरी बात बताई।
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आलोक बोला—
“देखो, इतनी बड़ी बात बनाने से पहले सोचो… लोग क्या कहेंगे? वो हमारे किरायेदार हैं…”
निधि ने पहली बार बिना रुके जवाब दिया—
“मुझे लोगों से ज्यादा अपनी बेटी की परवाह है।”
आलोक थोड़ा झुंझला गया, “तुम हर चीज़ को गलत एंगल से देखती हो…”
निधि की आवाज़ अब ठंडी लेकिन मजबूत थी—
“और तुम हर चीज़ को नजरअंदाज करते हो।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
निधि ने सिया का हाथ पकड़ा और कहा—
“चलो।”
सीधे ऊपर।
दरवाज़ा खुला—राकेश सामने था।
“अरे आइए भाभी जी…”
निधि ने बीच में ही कहा—
“मुझे विकास से बात करनी है।”
विकास सामने आया, उसके चेहरे पर साफ हैरानी झलक रही थी।
निधि ने बिना झिझक साफ शब्दों में कहा—
“मेरी बेटी के साथ दूरी बनाकर रखो। जब वो मना करे, तो उसे हाथ मत लगाओ। ये आखिरी बार कह रही हूँ।”
राकेश चौंक गया, “अरे नहीं-नहीं, आप गलत समझ रही हैं…”
निधि ने उसकी बात काट दी—
“हो सकता है। लेकिन मैं रिस्क नहीं लूँगी।”
विकास का चेहरा उतर चुका था।
“सॉरी आंटी…” उसने धीरे से कहा।
निधि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
वो मुड़ी और सिया का हाथ पकड़कर नीचे आ गई।
नीचे आते ही आलोक दरवाज़े पर खड़ा था।
उसने सब सुन लिया था।
कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा—
“शायद… तुम सही थी…”
निधि ने कुछ नहीं कहा।
उसने सिर्फ सिया को गले लगा लिया।
उस रात सिया पहली बार बिना डर के सोई।
और निधि…
उसे एहसास हुआ—
माँ होना सिर्फ प्यार देना नहीं होता…
कभी-कभी बिना डरे खड़े होना भी होता है।

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