आख़िरी मैसेज

 

Busy young man working late on laptop ignoring family calls


शाम ढल चुकी थी।


आसमान में हल्की नारंगी रोशनी बाकी थी, लेकिन आरव के कमरे में बस लैपटॉप की नीली चमक थी।


हेडफोन लगाए, स्क्रीन पर झुका हुआ, वह लगातार टाइप कर रहा था।


“डेडलाइन है… आज खत्म करना ही होगा,” उसने खुद से कहा।


तभी फोन पर नोटिफिकेशन आया।


"पापा ❤️"


आरव ने स्क्रीन देखी… और बिना खोले ही फोन साइड में रख दिया।


“बाद में बात कर लूंगा…”



कुछ देर बाद फिर फोन पर एक मैसेज आया—


“बेटा, आज थोड़ा समय है? तुमसे बात करनी थी।”


आरव ने स्क्रीन खोली। कुछ पल तक उस मैसेज को देखता रहा। उंगलियाँ कीबोर्ड पर चलीं और उसने जवाब टाइप किया—


“पापा, अभी काम में हूँ… बाद में कॉल करता हूँ।”


वह कुछ सेकंड तक उस लिखे हुए मैसेज को देखता रहा… जैसे भेजने और रोक लेने के बीच अटका हो।


फिर बिना “send” दबाए उसने फोन लॉक कर दिया।


उसने हल्की सांस ली और खुद से कहा—


“थोड़ी देर बाद आराम से बात कर लूंगा…”



दिन हफ्तों में बदल गए।


हर बार वही—


मैसेज आता… आरव सोचता “अभी नहीं…” और बात टल जाती।



एक दिन सुबह 7 बजे उसके फोन पर पापा का मैसेज आया—


“बेटा, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है…”


आरव ने मैसेज पढ़ा, लेकिन उस समय वह एक जरूरी मीटिंग में था।

उसने स्क्रीन बंद करते हुए मन ही मन सोचा—


“अभी नहीं… शाम को आराम से बात कर लूंगा।”



शाम आई…


फिर काम आ गया…


और वो मैसेज फिर अनरीड ही रह गया।



दो दिन बाद—


फोन अचानक बजा।


इस बार कॉल था।


नंबर अनजान था।


“हेलो?”


उधर से धीमी आवाज आई— “क्या आप आरव बोल रहे हैं?”


“जी…”


“मैं आपके पापा के पड़ोसी बोल रहा हूँ…”


आरव का दिल धक से रह गया।


“जी… क्या हुआ?”


“बेटा… आपके पापा को कल रात अस्पताल में भर्ती किया गया था…”


आरव के हाथ कांपने लगे।


“अब… अब कैसे हैं वो?”


कुछ सेकंड की चुप्पी…


फिर जवाब आया—


“आप… जल्दी आ जाइए।”



आरव की दुनिया जैसे रुक गई।


उसने बिना कुछ सोचे टिकट बुक की और रात भर सफर करके घर पहुंचा।



घर का दरवाज़ा खुला था।


अंदर अजीब सी खामोशी थी।


टेबल पर उसका बचपन का फोटो रखा था…


और उसके पास एक मोबाइल फोन।


वही फोन… जिससे पापा उसे मैसेज करते थे।



आरव ने कांपते हुए फोन उठाया।


स्क्रीन खोली।


आखिरी मैसेज खुला—


“बेटा, अगर तू बिजी है तो कोई बात नहीं… बस ये जान ले कि मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ।”


उसके नीचे एक और मैसेज था— जो कभी भेजा ही नहीं गया था…


Draft में लिखा था—


“आज बहुत अकेलापन लग रहा है…”


आरव वहीं बैठ गया।


आंखों से आंसू गिरने लगे।


“काश… एक बार बात कर ली होती…”



अस्पताल में—


वो बेड के पास खड़ा था।


पापा शांत पड़े थे।


अब कोई शिकायत नहीं थी…


कोई कॉल नहीं…


कोई मैसेज नहीं…



उस दिन आरव को पहली बार सच में एहसास हुआ—


काम कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता…

लेकिन वक्त और अपने लोग चुपचाप दूर हो जाते हैं, और जब तक समझ आता है… बहुत देर हो चुकी होती है।



कुछ महीनों बाद—


आरव ने अपनी जिंदगी बदल दी।


अब वह हर रिश्ते को समय देता था।


फोन बजता—तो उठाता था।


मैसेज आता—तो जवाब देता था।



एक दिन उसने अपने फोन में एक नोट लिखा—


“जब कोई अपना तुमसे बात करना चाहता है, तो वो सिर्फ शब्द नहीं… तुम्हारा समय मांग रहा होता है।

और समय, जिंदगी का ही एक हिस्सा नहीं—बल्कि सबसे कीमती हिस्सा होता है।”


सीख: 

हम अक्सर सोचते हैं कि “बाद में बात कर लेंगे”…

लेकिन सच यह है कि कई बार वो “बाद में” कभी आता ही नहीं।




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.