खून से नहीं, दिल से बनते हैं रिश्ते
घर के आँगन में हल्की-हल्की आवाजें गूंज रही थीं…
“चाची… देखो ना मैंने क्या बनाया!”
8 साल का अर्जुन कागज़ का छोटा-सा हवाई जहाज़ लेकर दौड़ता हुआ आया और सीधे रेखा की गोद में चढ़ गया।
रेखा मुस्कुराई…
“अरे वाह! मेरा अर्जुन तो बहुत होशियार हो गया है…”
अर्जुन उसके देवर का बेटा था, लेकिन रेखा उसे अपने बेटे से कम नहीं मानती थी। शादी के बाद से ही रेखा का ज्यादा समय घर पर ही बीतता था और अर्जुन हमेशा उसके आसपास ही मंडराता रहता।
वह उसे स्कूल के लिए तैयार करती, खाना खिलाती, होमवर्क कराती… और रात को कहानी सुनाकर सुलाती।
सब कहते…
“रेखा, तू तो इसे अपने बेटे से भी ज्यादा मानती है।”
रेखा हंसकर कहती…
“ये मेरा ही तो है…”
कुछ साल बाद रेखा की गोद भी भर गई। एक प्यारी-सी बेटी हुई—सिया। घर में खुशियों की लहर दौड़ गई।
लेकिन अब धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं…
रेखा का समय अब सिया में ज्यादा बीतने लगा। अर्जुन पहले की तरह उसके साथ खेलना चाहता, लेकिन कई बार रेखा कह देती—
“अर्जुन, अभी नहीं… सिया सो रही है…”
“अभी नहीं… मुझे काम है…”
अर्जुन चुप हो जाता…
धीरे-धीरे उसने रेखा से दूरी बनानी शुरू कर दी।
एक दिन उसने अपनी मां से पूछा—
“मम्मी… चाची अब मुझसे प्यार नहीं करती क्या?”
उसकी मां ने उसे समझाया…
“ऐसा नहीं है बेटा… बस अब उनके पास अपनी बच्ची भी है।”
लेकिन बच्चों का दिल बहुत जल्दी बदल जाता है…
अर्जुन अब चाची से दूर रहने लगा।
रेखा भी अपनी जिम्मेदारियों में उलझती चली गई।
समय बीतता गया…
अर्जुन बड़ा होकर पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चला गया। वहीं नौकरी लग गई और उसने वहीं अपना घर भी बसा लिया।
इधर सिया भी बड़ी हो गई… लेकिन वह स्वभाव से थोड़ी जिद्दी और अपने में रहने वाली थी।
रेखा ने अपनी पूरी दुनिया अपनी बेटी में समेट ली थी, लेकिन उसे वह अपनापन कभी नहीं मिला, जो उसे अर्जुन के साथ मिलता था।
एक दिन रेखा बीमार पड़ गई…
सिया को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।
वह अपने काम और दोस्तों में व्यस्त रहती।
रेखा कई बार कहती—
“बेटा, थोड़ा समय मेरे साथ बैठ जाया कर…”
लेकिन सिया टाल देती—
“मम्मी, मुझे बहुत काम है…”
रेखा की आंखें नम हो जातीं…
उसे अर्जुन याद आता…
वो बच्चा जो बिना कहे उसके पास बैठ जाता था।
एक दिन अचानक दरवाजे की घंटी बजी…
दरवाजा खोला तो सामने अर्जुन खड़ा था।
“चाची…”
बस इतना कहा और रेखा उससे लिपटकर रो पड़ी।
अर्जुन ने तुरंत उनका इलाज करवाया, दवाइयां लाया, उनके साथ बैठा, बातें की…
कुछ ही दिनों में रेखा की तबीयत सुधरने लगी।
एक रात रेखा ने अर्जुन से कहा—
“तू मेरा बेटा होता तो… शायद मैं इतनी अकेली नहीं होती…”
अर्जुन ने धीरे से उनका हाथ पकड़ा—
“चाची… मैं आज भी आपका ही हूं…”
रेखा की आंखों से आंसू बहने लगे…
उधर सिया यह सब देख रही थी…
उसे पहली बार एहसास हुआ कि मां को सिर्फ पैसे या सुविधाओं की नहीं…
समय और अपनापन की जरूरत होती है।
धीरे-धीरे उसने भी मां के साथ समय बिताना शुरू किया…
लेकिन रेखा के दिल में एक खालीपन हमेशा बना रहा—
जिसे उसने दिल से अपना माना, वह वक्त के साथ दूर हो गया…
और जिसे उसने अपना बनाकर पाला, वह पास होकर भी कभी सच में उसका न हो सका…
कहानी यही सिखाती है…
रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते…
उन्हें निभाने के लिए समय, समझ और सच्चा प्यार चाहिए।

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