बेटे की बदतमीजी के पीछे छुपा सबसे बड़ा प्यार
शाम ढल रही थी…
आसमान हल्का गुलाबी हो गया था और गली में बच्चों की आवाजें धीरे-धीरे कम हो रही थीं।
“मम्मी! मैं कल से स्कूल बस से जाऊँगा… दादू के साथ नहीं जाऊँगा!”
बारह साल के रोहन ने बैग पटकते हुए कहा।
मैं चौंक गई।
“ये क्या तरीका है बात करने का? दादू तुम्हें रोज़ प्यार से छोड़ने जाते हैं… और तुम ऐसे बोल रहे हो?”
रोहन चुप रहा… पर उसके चेहरे पर जिद साफ दिखाई दे रही थी।
तभी कमरे से उसके पापा बाहर आए—
“क्या हुआ रोहन? अचानक ये फैसला क्यों?”
रोहन ने नजरें झुका लीं, पर फिर गुस्से में बोला—
“बस… अब नहीं जाना मुझे दादू के साथ!”
घर में सन्नाटा छा गया।
हमारा परिवार बड़ा था—मैं, मेरे पति, रोहन, सास-ससुर और छोटी ननद।
दादू यानी रोहन के दादा जी ही रोज़ उसे स्कूल छोड़ने और लाने जाते थे।
हालाँकि उनकी उम्र 70 के पार थी… घुटनों में दर्द रहता था… फिर भी वो कभी मना नहीं करते थे।
बल्कि कहते थे—
“पोते के साथ थोड़ा चलना-फिरना भी हो जाता है, अच्छा लगता है।”
रोहन भी पहले बहुत खुश रहता था उनके साथ… रास्ते भर बातें करता, हँसता…
लेकिन आज अचानक ये बदलाव… समझ नहीं आ रहा था।
रात को खाना खाते समय सबने उसे समझाया—
“ऐसे बड़ों से बात नहीं करते।”
“दादू तुम्हारे लिए इतना करते हैं…”
पर रोहन अपनी जिद पर अड़ा रहा।
आखिर गुस्से में उसके पापा ने कहा—
“ठीक है! कल से तुम बस से ही जाओगे।”
मैं अंदर से परेशान थी…
मुझे गुस्सा भी आ रहा था और दुख भी।
अगले दिन से रोहन बस से जाने लगा।
दादू चुपचाप अपने कमरे में रहने लगे…
उनके चेहरे की मुस्कान कहीं गायब हो गई थी।
मेरा मन बार-बार बेचैन हो रहा था—
“आखिर ऐसा क्या हुआ कि रोहन इतना बदल गया?”
एक शाम…
मैं रोहन को ढूँढते हुए छत पर पहुँची।
वहाँ जो देखा… उसने मुझे अंदर तक हिला दिया।
रोहन दादू के पास बैठा था…
उनके कंधे से लगा हुआ।
वो धीमी आवाज़ में कह रहा था—
“दादू… आप मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं ना?”
दादू ने मुस्कुराते हुए कहा—
“नहीं बेटा… मैं क्यों नाराज़ होऊँगा?”
रोहन की आँखें भर आईं—
“मैंने सबके सामने गलत बोला… पर मैं क्या करता दादू?”
मैं चुपचाप दरवाजे के पीछे खड़ी सब सुन रही थी…
रोहन आगे बोला—
“इतनी गर्मी में आप रोज़ मुझे छोड़ने जाते थे…
आपके पैर भी दर्द करते हैं… फिर भी आप कुछ नहीं कहते थे…”
दादू चुप थे…
“मैंने मम्मी से कहा था कि आपको मत भेजा करो…
पर उन्होंने कहा कि आप खुद जाना चाहते हैं…”
रोहन ने रोते हुए कहा—
“इसलिए मैंने झूठ बोला… ताकि आपको आराम मिल सके…
मैं नहीं चाहता था कि आपको और तकलीफ हो…”
मेरे हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा…
मेरी आँखों में आँसू आ गए।
जिस बेटे को मैं गलत समझ रही थी…
वो तो सबसे ज्यादा समझदार निकला।
मैं तुरंत वहाँ गई…
रोहन मुझे देखकर डर गया—
“मम्मी… मैं…”
मैंने उसे बीच में ही गले लगा लिया।
“नहीं बेटा… कुछ मत बोलो…”
मेरी आवाज़ भर्रा गई थी—
“गलती हमारी थी… जो हम तुम्हारी बात समझ नहीं पाए…”
दादू की आँखें भी नम हो गईं।
मैंने उनके पैर छुए और कहा—
“अब से आप कहीं नहीं जाएँगे… अब आपकी जिम्मेदारी सिर्फ आराम करना है।”
रोहन मुस्कुराया…
और दादू ने उसे सीने से लगा लिया।
उस दिन मुझे एक बहुत बड़ी सीख मिली—
कभी-कभी बच्चों की बातें हमें गलत लगती हैं…
पर उनके पीछे छुपी भावना बहुत सच्ची और गहरी होती है।
बच्चे छोटे जरूर होते हैं…
पर उनका दिल बहुत बड़ा होता है ❤️

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