उसकी खामोशी की कीमत
रसोई में चूल्हे की धीमी आँच जल रही थी। बर्तन खनकने की आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी, लेकिन उस आवाज़ के पीछे छुपी थकान किसी को सुनाई नहीं देती थी।
सीमा सुबह से ही काम में लगी थी। बच्चों को स्कूल भेजना, सास-ससुर के लिए नाश्ता बनाना, पति के कपड़े तैयार करना—सब कुछ वह बिना रुके करती जा रही थी। उसके चेहरे पर थकावट साफ थी, मगर आदत बन चुकी थी—बिना शिकायत सब निभाने की।
“चाय अभी तक नहीं बनी?”
ड्रॉइंग रूम से अमित की तेज़ आवाज़ आई।
“बस अभी लाई…” सीमा ने जल्दी से जवाब दिया और कप में चाय डालकर उसके सामने रख दी।
अमित ने एक घूंट लिया और कप टेबल पर रखते हुए बोला,
“तुमसे एक काम ढंग से नहीं होता। पता नहीं दिन भर करती क्या हो घर में!”
सीमा चुप रही। यह उसके लिए नया नहीं था। हर दिन वही ताने, वही बातें… और हर बार वह चुप ही रह जाती।
अमित ऑफिस के लिए निकल गया। जाते-जाते फिर वही बात दोहराई—
“मेरे कमाने से ही यह घर चल रहा है, वरना तुम क्या कर लेती?”
दरवाज़ा बंद हुआ और घर में फिर वही सन्नाटा छा गया।
सीमा ने धीरे से दीवार का सहारा लिया। आँखों से आँसू गिर पड़े, लेकिन उसने तुरंत उन्हें पोंछ लिया। क्योंकि उसे पता था—रोने का भी समय नहीं है।
वो फिर से अपने काम में लग गई।
दिन बीतते गए।
सीमा की तबीयत धीरे-धीरे खराब होने लगी, लेकिन उसने कभी किसी को बताया नहीं।
एक दिन सुबह उठते ही उसे चक्कर आया। हाथ कांप रहे थे, शरीर तप रहा था। उसने माथा छुआ—तेज बुखार था।
फिर भी उसने बच्चों का टिफिन बनाया, सास-ससुर के लिए खाना तैयार किया और अमित के कपड़े निकालकर रख दिए।
अमित ने देखा और बस इतना कहा—
“अगर तबीयत खराब है तो डॉक्टर को दिखा लेना… मुझे देर हो रही है।”
वो चला गया।
सीमा पूरे दिन बिस्तर पर पड़ी रही। किसी ने आकर हाल तक नहीं पूछा। सास ने सिर्फ इतना कहा—
“इतना भी क्या बीमार होना… घर का काम तो करना ही पड़ेगा।”
शाम तक हालत और बिगड़ गई। सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।
सीमा ने हिम्मत करके अमित को फोन किया।
“अमित… बहुत तबीयत खराब है… जल्दी आ जाओ…”
उधर से जवाब आया—
“मीटिंग में हूँ, दवा ले आऊंगा… तुम आराम करो।”
फोन कट गया।
रात हो गई।
दरवाज़ा खुला। अमित आया, हाथ में दवा का पैकेट था।
“ये लो दवा, खा लो… मुझे बहुत थकान है।”
वो खाना खाकर सो गया।
सीमा ने दवा हाथ में ली, लेकिन उसे निगलने की ताकत भी नहीं थी।
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे… और धीरे-धीरे उसकी सांसें भारी होती गईं।
उस रात किसी ने नहीं देखा कि वो कितनी तड़प रही थी।
अगली सुबह…
सीमा नहीं उठी।
बहुत देर तक जब कोई हलचल नहीं हुई तो दरवाज़ा खोला गया।
वो बिल्कुल शांत थी।
हमेशा के लिए।
घर में अचानक सब कुछ बदल गया।
जो काम कभी दिखाई नहीं देते थे, अब हर जगह बिखरे पड़े थे।
अमित को अपनी शर्ट नहीं मिली।
बच्चों को समय पर खाना नहीं मिला।
सास को दवा देना कोई भूल गया।
घर, जो कभी सजा-संवरा रहता था… अब अस्त-व्यस्त था।
अमित पहली बार समझ रहा था—
सीमा क्या करती थी।
रात को जब वह थका हुआ घर आया, तो दरवाज़े पर कोई इंतज़ार नहीं कर रहा था।
खाना खुद बनाना पड़ा।
बिस्तर खुद लगाना पड़ा।
और सबसे ज्यादा…
खामोशी सहनी पड़ी।
तेरहवीं के बाद घर खाली-खाली लगने लगा।
एक दिन अमित सीमा की अलमारी खोलकर बैठा था।
उसे एक पुरानी डायरी मिली।
उसमें लिखा था—
“मैं जानती हूँ, इस घर को मेरी जरूरत नहीं लगती…
पर मैं इस घर को अपना सब कुछ मानती हूँ।
काश… एक दिन कोई समझ पाता कि मैं भी थकती हूँ, मैं भी बीमार पड़ती हूँ…
और मुझे भी प्यार चाहिए…”
अमित की आँखों से आँसू बहने लगे।
अब उसे सब समझ आ गया था।
पर बहुत देर हो चुकी थी।
आज अमित को हर चीज़ में सीमा की कमी महसूस होती है।
अब उसे पता है—
घर सिर्फ पैसे से नहीं चलता…
घर चलता है उस इंसान से, जो बिना किसी पहचान के…
सबके लिए जीता है।
पर यह सच समझने के लिए…
उसे सीमा को खोना पड़ा।
सीख:
कभी भी किसी की अहमियत उसके जाने के बाद मत समझो…
क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

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