जब अपने दूर हो गए, तब गैर अपना बन गया
रात के करीब नौ बज चुके थे। बाहर सड़क पर कभी-कभार किसी गाड़ी के गुजरने की आवाज़ आ जाती, फिर सब कुछ वैसा ही शांत हो जाता।
घर के अंदर रसोई से मसालों की खुशबू आ रही थी, लेकिन खाने की मेज़ पर सिर्फ एक ही थाली लगी थी।
सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल वसुधा जी रोज़ की तरह अकेले खाना खाने बैठी ही थीं कि तभी उनका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर बेटे आदित्य का नाम चमक रहा था।
वसुधा जी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उन्होंने जल्दी से फोन उठाया।
“हाँ बेटा, कैसे हो? इस बार दशहरे में आ रहे हो ना?”
उधर से कुछ सेकंड खामोशी रही, फिर आदित्य की आवाज़ आई— “माँ, अभी बहुत बिज़ी हूँ। कंपनी का नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ है। शायद इस बार भी नहीं आ पाऊँगा।”
वसुधा जी का चेहरा बुझ गया, लेकिन उन्होंने खुद को संभालते हुए कहा— “कोई बात नहीं बेटा… काम ज़रूरी है।”
“मैं पैसे भेज दूँगा माँ। आप अपने लिए कुछ अच्छा खरीद लेना।”
फोन कट गया।
वसुधा कुछ देर मोबाइल को देखती रह गईं। फिर धीरे से मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आँखों के किनारों पर नमी उतर आई थी।
उन्होंने सामने रखी दूसरी खाली कुर्सी की तरफ देखा और बुदबुदाईं— “घर में इंसान ना हो, तो पैसे भी कितने बेकार लगते हैं…”
अगले दिन स्कूल में वार्षिक समारोह की तैयारियाँ चल रही थीं। बच्चे इधर-उधर भाग रहे थे। कोई डांस प्रैक्टिस कर रहा था, कोई मंच सजा रहा था।
तभी स्कूल का चपरासी रामू घबराया हुआ स्टाफ रूम में आया।
“मैडम, बाहर एक लड़का बैठा है। सुबह से स्कूल के गेट पर है। कह रहा है उसे पढ़ना है।”
वसुधा बाहर आईं।
गेट के पास करीब सोलह-सत्रह साल का एक दुबला-पतला लड़का बैठा था। उसके कपड़े मैले थे, लेकिन आँखों में अजीब सी चमक थी।
“नाम क्या है तुम्हारा?” वसुधा ने पूछा।
“शिवम।”
“कौन सी क्लास में पढ़ते हो?”
लड़का चुप हो गया।
कुछ देर बाद धीरे से बोला— “दो साल पहले पढ़ाई छोड़ दी थी मैडम। पापा की मौत हो गई थी। घर चलाने के लिए होटल में बर्तन धोने लगा।”
वसुधा का दिल भर आया।
“फिर यहाँ क्यों आए हो?”
शिवम ने जेब से एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी कॉपी निकाली।
उसमें बहुत सुंदर लिखावट में गणित के सवाल हल किए हुए थे।
“मैडम… मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। किसी ने बताया कि इस स्कूल की प्रिंसिपल बहुत अच्छी हैं। इसलिए चला आया।”
वसुधा कुछ पल उसे देखती रह गईं।
ना जाने क्यों उन्हें उस लड़के की आँखों में एक सच्चाई दिखी।
उन्होंने तुरंत कहा— “कल से स्कूल आ जाना।”
शिवम की आँखें फैल गईं। “सच में?”
“हाँ। लेकिन एक शर्त है।”
“क्या?”
“पढ़ाई बीच में छोड़नी नहीं है।”
उस दिन के बाद शिवम स्कूल आने लगा।
वह पढ़ाई में इतना तेज़ निकला कि कुछ ही महीनों में सभी टीचर्स का पसंदीदा छात्र बन गया। लेकिन सबसे ज्यादा लगाव वसुधा जी से हो गया था।
वह रोज़ सुबह उनके लिए स्टाफ रूम की कुर्सी साफ करता, पानी की बोतल भरकर रखता और छुट्टी के बाद उनके बैग को कार तक छोड़ने जाता।
एक दिन वसुधा ने हँसते हुए कहा— “तुम छात्र कम और बॉडीगार्ड ज्यादा लगते हो।”
शिवम मुस्कुरा पड़ा। “क्या करूँ मैडम… आपकी चिंता रहती है।”
धीरे-धीरे वसुधा को भी उसकी आदत हो गई।
अब स्कूल से घर लौटते समय अगर शिवम दिखाई ना दे, तो उन्हें अजीब बेचैनी होने लगती।
एक शाम अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई।
वसुधा स्कूल में फँस गईं। ड्राइवर भी नहीं आया था।
तभी उन्होंने देखा—शिवम बारिश में भीगता हुआ दौड़कर आया।
उसके हाथ में पुराना छाता था।
“मैडम, चलिए… मैं छोड़ देता हूँ।”
“अरे, तुम खुद पूरे भीग रहे हो!”
“कोई बात नहीं। आपको बुखार हो गया तो पूरा स्कूल परेशान हो जाएगा।”
वसुधा पहली बार खुलकर हँसीं।
घर पहुँचकर उन्होंने शिवम को तौलिया दिया और गरम खाना परोसा।
शिवम खाने की मेज़ पर बैठा हर निवाला ऐसे खा रहा था जैसे बरसों बाद घर का खाना मिला हो।
“इतना भूखे क्यों हो?” वसुधा ने पूछा।
शिवम हँसने लगा। “होटल में बचा-खुचा खाकर आदत खराब हो गई है।”
वसुधा का दिल कस गया।
उस रात उन्होंने पहली बार किसी के लिए अपने हाथों से खीर बनाई।
धीरे-धीरे शिवम उनके घर आने लगा।
कभी बिजली खराब हो तो ठीक कर देता, कभी बाजार से दवा ले आता। घर का सूना आँगन अब उसकी आवाज़ से भरा रहने लगा।
लेकिन मोहल्ले वालों को ये सब पसंद नहीं आया।
एक दिन पड़ोसन कमला बोली— “वसुधा जी, आजकल उस लड़के को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है आपने। दुनिया बहुत खराब है।”
वसुधा मुस्कुराईं। “हर गरीब लड़का गलत नहीं होता कमला जी।”
“लेकिन लोग बातें बना रहे हैं।”
“लोगों का काम बातें बनाना है।”
उधर शिवम ने सब सुन लिया था।
उस दिन वह बिना कुछ कहे चला गया।
अगले तीन दिन वह स्कूल नहीं आया।
वसुधा बेचैन हो उठीं। उन्होंने खुद उसके बताए पते पर जाकर देखा।
एक छोटी सी झोपड़ी में शिवम तेज़ बुखार में पड़ा था।
वसुधा घबरा गईं। “अरे तुमने बताया क्यों नहीं?”
शिवम ने कमजोर आवाज़ में कहा— “मैं नहीं चाहता था… मेरी वजह से आपकी बदनामी हो।”
वसुधा की आँखें भर आईं।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा। “पगले… अपने बच्चों की वजह से कोई माँ बदनाम नहीं होती।”
यह सुनते ही शिवम फूट-फूटकर रो पड़ा।
शायद बरसों बाद किसी ने उसे अपना कहा था।
समय बीतता गया।
शिवम ने बारहवीं में पूरे जिले में टॉप किया। पूरे शहर में उसकी चर्चा होने लगी।
एक दिन स्कूल के मंच पर उसे सम्मानित किया जा रहा था।
पत्रकारों ने पूछा— “आपकी सफलता का राज क्या है?”
शिवम सीधे मंच से नीचे उतरा और वसुधा जी के पैरों के पास आकर खड़ा हो गया।
“मेरी माँ।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
वसुधा रो पड़ीं।
उन्हें लगा जैसे भगवान ने देर से ही सही, लेकिन उनके खाली जीवन को फिर से भर दिया हो।
उसी रात आदित्य का वीडियो कॉल आया।
उसने टीवी पर कार्यक्रम देखा था।
“माँ… क्या सच में वो लड़का अब आपके साथ रहता है?”
वसुधा शांत स्वर में बोलीं— “हाँ।”
“लेकिन लोग क्या कहेंगे?”
वसुधा हल्का सा मुस्कुराईं। “जब तुम दूर चले गए थे ना बेटा… तब लोगों ने ये नहीं पूछा था कि मैं अकेली कैसे रहती हूँ।”
आदित्य चुप हो गया।
कुछ देर बाद उसकी आँखें झुक गईं। “सॉरी माँ…”
वसुधा ने पहली बार महसूस किया कि कभी-कभी एक अजनबी इंसान सिर्फ घर नहीं भरता… रिश्तों की कमी भी भर देता है।

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