माँ की आखिरी इच्छा अधूरी रह गई

 

Emotional Indian family scene with an elderly mother, caring daughter, angry daughter-in-law, and worried son inside a traditional home


घर के अंदर अजीब सा तनाव पसरा हुआ था। बैठक में बैठी सुनीता गुस्से में मोबाइल पकड़े हुई थी, जबकि सामने सोफे पर बैठे अजय चुपचाप अपनी फाइलों में नजरें गड़ाए थे।


अचानक सुनीता गुस्से में बोली, “मैं तो कहती हूँ आपकी बहन सीमा को कोई काम धंधा नहीं है। जब देखो तब फोन कर देती है मां जी को। कभी हाल पूछने के बहाने, कभी दवा पूछने के बहाने। अरे शादी हो गई है तो अपने घर पर ध्यान दे ना। लेकिन नहीं… इसकी नजर तो हमेशा इस घर और मां जी के गहनों पर रहती है।”


अजय ने सिर उठाकर पत्नी की तरफ देखा और शांत आवाज में बोला, “सुनीता, हर रिश्ता तुम्हारी सोच जैसा नहीं होता। सीमा मां से प्यार करती है इसलिए फोन करती है।”


सुनीता हंसते हुए बोली, “हाँ हाँ, मैं सब समझती हूँ। औरत हूँ, औरतों की फितरत पहचानती हूँ। आजकल कौन बिना मतलब किसी के लिए इतना करता है?”


इतने में फिर मोबाइल बज उठा।


स्क्रीन पर “सीमा दीदी” लिखा देख सुनीता का चेहरा और बिगड़ गया।


“लो फिर आ गया फोन,” उसने ताना मारा।


अजय बोला, “मां को दे दो। सुबह से उनकी तबीयत भी ठीक नहीं लग रही।”


सुनीता बड़बड़ाती हुई कमरे की तरफ गई जहाँ अजय की मां शांति देवी पलंग पर बैठी थीं। उम्र और बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था। हाथ कांपते थे, घुटनों में दर्द रहता था और आँखों से भी कम दिखाई देता था।


सुनीता ने जोर से कहा, “मां जी, आपकी बेटी का फोन है। लगता है बिना बात किए उसे चैन नहीं आता।”


शांति देवी ने धीरे से फोन लिया।


“कैसी हो मां?” उधर से सीमा की चिंतित आवाज आई।


“ठीक हूँ बेटी,” शांति देवी बोलीं, “तू कैसी है?”


“मैं ठीक हूँ मां। आपने दवा ली ना?”


शांति देवी कुछ बोलतीं उससे पहले सुनीता वहीं खड़ी होकर बोल पड़ी, “बस फोन पर पूछ लिया करो। यहां कौन सेवा कर रहा है ये पूछने की जरूरत नहीं।”


सीमा चुप हो गई।


मां सब समझ गईं। उन्होंने बात बदलते हुए कहा, “बेटी, बच्चों का ध्यान रखना।”


सीमा की आंखें भर आईं। वो जानती थी कि मां अपनी तकलीफ छिपा रही हैं।


शांति देवी का पति कई साल पहले गुजर चुका था। उनके पास पति की थोड़ी पेंशन आती थी जिससे घर का खर्च भी चलता और वो अपनी बेटी सीमा को भी प्यार से कुछ न कुछ दे देतीं। यही बात सुनीता को सबसे ज्यादा चुभती थी।


उसे लगता था कि सीमा धीरे-धीरे सब कुछ अपने नाम करवा लेगी।


सीमा का पति रवि एक साधारण नौकरी करता था। उनका घर बहुत अमीर नहीं था लेकिन दोनों खुश रहते थे। सीमा जब भी मायके आती, मां के लिए फल, दवा या उनकी पसंद की मिठाई जरूर लाती।


लेकिन हर बार सुनीता उसे ऐसे देखती जैसे वो कोई दुश्मन हो।


एक दिन तीज का त्योहार आया।


घर में पूजा की तैयारी चल रही थी। सीमा भी कई महीनों बाद मायके आई थी क्योंकि मां की तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी थी।


शांति देवी ने प्यार से कहा, “बेटी, अलमारी में मेरी लाल बनारसी साड़ी रखी है, वो पहन ले। तुझ पर बहुत अच्छी लगेगी।”


सीमा मुस्कुराई, “नहीं मां, रहने दो।”


“अरे पहन ले ना,” शांति देवी बोलीं।


सीमा ने मां की बात मान ली।


उसे क्या पता था कि वही साड़ी सुनीता अपने मायके से लाई थी।


जैसे ही सीमा साड़ी पहनकर बाहर आई, सुनीता का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।


“वाह! अब अलमारी भी खोलने लगी तुम?” वह चिल्लाई।


सीमा घबरा गई, “भाभी, मां ने कहा था…”


“मां ने कहा था तो सब पहन लोगी? तुम्हारी नजर तो शुरू से ही इस घर पर है।”


सीमा की आंखों में आँसू आ गए।


“भाभी, आप गलत समझ रही हैं।”


सुनीता बोली, “गलत? मुझे सब समझ आता है। सेवा का नाटक करके मां जी का दिल जीतना चाहती हो।”


इतने में शांति देवी बाहर आ गईं।


उन्होंने गुस्से में कहा, “बस करो बहू! एक साड़ी के लिए इतना तमाशा?”


सुनीता बोली, “तमाशा मैं नहीं कर रही। मैं पहले से समझ रही हूँ इसकी चाल।”


शांति देवी की आवाज भर्रा गई।


“मेरी चीजों पर मेरी बेटी का भी हक है।”


सुनीता तुनककर बोली, “हक? शादी के बाद बेटी का कौन सा हक रहता है मायके पर?”


ये सुनकर शांति देवी का दिल टूट गया।


उसी समय अजय घर आ गया।


उसने माहौल देखा तो समझ गया कि फिर झगड़ा हुआ है।


सीमा रोते हुए बोली, “भैया, मैं कल चली जाऊंगी।”


अजय बोला, “तुम कहीं नहीं जाओगी।”


लेकिन सीमा मुस्कुराकर बोली, “जहां सम्मान ना हो वहां ज्यादा दिन रुकना ठीक नहीं।”


उस रात शांति देवी बहुत रोईं।


उन्हें पहली बार लगा कि बेटी सच में पराई हो गई है।


समय बीतता गया।


अब सीमा कम ही मायके आती। बस फोन पर मां का हाल पूछती।


कई बार सुनीता जानबूझकर फोन नहीं उठाती।


कभी कह देती, “मां सो रही हैं।”


कभी कहती, “अभी बात नहीं कर सकतीं।”


जबकि सच ये होता कि शांति देवी फोन के इंतजार में बैठी रहतीं।


धीरे-धीरे उनकी तबीयत और बिगड़ने लगी।


अब उन्हें चलने में भी सहारा लगने लगा था।


एक दिन वो लाठी लेकर आँगन में जा रही थीं कि अचानक पैर फिसल गया।


वो जोर से जमीन पर गिर पड़ीं।


उनकी चीख सुनकर पड़ोस की औरतें दौड़ीं।


सुनीता भी बाहर आई लेकिन मदद करने के बजाय बोली, “हे भगवान! अब अगर हाथ पैर टूट गए तो सेवा कौन करेगा?”


पड़ोस वाली कमला चाची ने घूरकर कहा, “बहू, पहले उन्हें उठाओ।”


शांति देवी दर्द से कराह रही थीं।


अजय उन्हें अस्पताल ले गया।


डॉक्टर ने बताया कि कमर की हड्डी में चोट आई है।


अब उन्हें ज्यादा आराम की जरूरत थी।


उस दिन सीमा खबर सुनते ही भागी चली आई।


वो मां के पास बैठी रही।


दवा दी, खाना खिलाया, रातभर जागी।


लेकिन सुनीता का व्यवहार नहीं बदला।


एक दिन उसने अजय से कहा, “तुम्हारी बहन यहां आकर जम गई है।”


अजय गुस्से में बोला, “मां की हालत देख रही हो ना?”


“हाँ, और मैं ये भी देख रही हूँ कि तुम्हारी बहन मौका ढूंढ रही है।”


सीमा ने सब सुन लिया।


उसका दिल टूट गया।


उस रात उसने मां से कहा, “मां, मैं कल चली जाऊंगी।”


शांति देवी रो पड़ीं।


“मत जा बेटी।”


“मां, मैं नहीं चाहती मेरी वजह से आपके घर में रोज लड़ाई हो।”


शांति देवी चाहकर भी बेटी को रोक ना सकीं।


सीमा चली गई।


अब शांति देवी और अकेली हो गईं।


कई-कई घंटे वो कमरे में अकेली पड़ी रहतीं।


कभी पानी खुद लेकर पीतीं, कभी बिना खाए ही सो जातीं।


एक रात उन्हें बहुत घबराहट हुई।


उन्होंने आवाज लगाई, “बहू… बहू…”


लेकिन सुनीता ने सुनकर भी अनसुना कर दिया।


सुबह अजय ऑफिस चला गया।


शांति देवी ने कांपती आवाज में कहा, “बहू… एक बार सीमा को बुला दे… मन बहुत बेचैन है…”


सुनीता ने ठंडे स्वर में कहा, “इतनी याद आ रही है बेटी की तो उसी के घर चली जाइए।”


शांति देवी की आंखों से आँसू बह निकले।


उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “बस एक बार उससे मिलवा दे…”


लेकिन सुनीता के मन में ज़रा भी दया नहीं आई।


कुछ देर बाद शांति देवी चुप हो गईं।


बहुत देर तक कमरे से कोई आवाज नहीं आई।


जब सुनीता अंदर गई तो देखा शांति देवी बिल्कुल शांत पड़ी थीं।


उनकी आंखें आधी खुली थीं जैसे किसी का इंतजार करते-करते थक गई हों।


सुनीता घबरा गई।


उसने तुरंत अजय को फोन किया।


अजय आया तो मां को देखकर फूट पड़ा।


“मां…!”


लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।


खबर सुनते ही सीमा दौड़ी हुई आई।


मां के पैर पकड़कर जोर-जोर से रोने लगी।


“मां… एक बार बुला लेती…”


पूरा घर रो रहा था।


लेकिन उसी बीच सुनीता की नजर शांति देवी के गहनों पर थी।


जैसे ही लोग बाहर गए, वो धीरे-धीरे उनके हाथों से कंगन उतारने लगी।


तभी अजय अंदर आ गया।


उसने ये देखा तो उसकी आंखों में गुस्सा भर गया।


“तुम्हें शर्म नहीं आती?” वह चिल्लाया।


सुनीता बोली, “अरे अब क्या करेंगी गहनों का?”


अजय का दिल टूट गया।


उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी पत्नी कितनी बदल चुकी है।


क्रिया कर्म के बाद सीमा वापस जाने लगी।


उसकी आंखें सूजी हुई थीं।


वो बोली, “भैया, अब मेरा मायका खत्म हो गया।”


अजय रो पड़ा।


“ऐसा मत कहो।”


फिर वो अंदर गया और एक छोटी सी पोटली लेकर आया।


उसने सीमा के हाथ में रखते हुए कहा, “ये मां तुम्हारे लिए छोड़ गई हैं।”


सीमा चौंकी, “ये क्या है?”


“मां के गहने… उन्होंने कहा था ये मेरी बेटी को दे देना।”


सीमा पीछे हट गई।


“नहीं भैया, मुझे कुछ नहीं चाहिए।”


अजय बोला, “ये तुम्हारा हक है।”


तभी सुनीता गुस्से में बोली, “वाह! सब कुछ बहन को दे दो।”


अजय पहली बार पत्नी पर जोर से चिल्लाया।


“चुप रहो तुम! मां आखिरी समय तक बेटी को देखने के लिए तड़पती रहीं और तुमने उन्हें मिलने नहीं दिया।”


पूरा घर शांत हो गया।


अजय की आंखों में आँसू थे।


“तुमने सिर्फ मां का दिल नहीं तोड़ा… इस घर की खुशियाँ भी खत्म कर दीं।”


सुनीता चुप रह गई।


उस दिन पहली बार उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।


लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।


उसके बाद सीमा कभी पहले जैसी मायके नहीं आई।


हाँ, राखी पर अजय जरूर बहन के घर जाता।


और हर बार मां की तस्वीर के सामने खड़े होकर बस यही सोचता—


“जिस घर में बेटी का सम्मान खत्म हो जाए… वहां बरकत भी ज्यादा दिन नहीं टिकती…”



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