जब परिवार ने बहू का दर्द समझा

 

Emotional Indian family gathering where a father-in-law supports his daughter-in-law during a festive celebration at home


“कई बार इंसान घर में सबसे ज्यादा दर्द उन लोगों से पाता है… जिन्हें वह अपना समझकर दिल से सम्मान देता है, लेकिन जब वही रिश्ते समझदारी से जुड़ते हैं, तो टूटता हुआ घर भी फिर से परिवार बन जाता है…”


पूरे घर में मेहमानों की आवाज़ें गूंज रही थीं।


ड्रॉइंग रूम में रिश्तेदार बैठे बातें कर रहे थे। रसोई में पकवानों की खुशबू फैली हुई थी। आँगन में बच्चे खेल रहे थे और घर की दीवारों पर रंग-बिरंगी झालरें लगी थीं। घर में खुशी का माहौल था क्योंकि उस दिन विनोद जी के छोटे बेटे करण की नौकरी लगने की खुशी में एक छोटी-सी पार्टी रखी गई थी।


घर की सारी जिम्मेदारी हमेशा की तरह नेहा के कंधों पर थी।


नेहा इस घर की बहू थी। शादी को अभी एक साल ही हुआ था, लेकिन उसने पूरे घर को अपनेपन से संभाल लिया था। वह बिना कहे हर काम कर देती। किसे क्या पसंद है, किसकी कौन-सी आदत है, किस समय किसे दवाई चाहिए—उसे सब याद रहता था।


सास कमला देवी अक्सर कहतीं—“नेहा के आने के बाद घर संभल गया है।”


लेकिन घर में एक इंसान ऐसा भी था जिसे नेहा की तारीफ बिल्कुल पसंद नहीं आती थी।


वह थी उसकी ननद सिमरन।


सिमरन अपने मायके से बहुत जुड़ी हुई थी। शादी के बाद भी वह हर दूसरे-तीसरे हफ्ते मायके आ जाती। शुरू में नेहा ने उसे अपनी बड़ी बहन जैसा मानने की कोशिश की। उसके आने पर उसकी पसंद का खाना बनाती, उसके साथ बैठकर बातें करती, लेकिन सिमरन का व्यवहार हमेशा ठंडा ही रहता।


उसे लगता था कि नेहा धीरे-धीरे घर में उसकी जगह ले रही है।


जब भी रिश्तेदार नेहा की तारीफ करते, सिमरन के चेहरे का रंग बदल जाता।


वह कभी कहती—“भाभी को तो बस दिखावा करना आता है।”


कभी बोलती—“इतना सीधा बनने की जरूरत नहीं है, हम सब समझते हैं।”


नेहा हर बार मुस्कुराकर बात टाल देती।


वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से घर में तनाव हो।


कई बार करण अपनी बहन को समझाने की कोशिश करता, लेकिन सिमरन तुरंत नाराज हो जाती—“अब तुम्हें अपनी बहन गलत और पत्नी सही लगने लगी है।”


इसी डर से घर वाले कई बार चुप रह जाते।


उस दिन पार्टी की तैयारियों में नेहा सुबह से लगी हुई थी। उसने अकेले ही पूरे घर को सजाया था। रसोई में खड़े-खड़े उसके पैरों में दर्द होने लगा था, लेकिन उसने किसी से कुछ नहीं कहा।


वह चाहती थी कि करण की खुशी में कोई कमी न रह जाए।


मेहमान धीरे-धीरे आने लगे। सभी लोग खाने और सजावट की तारीफ कर रहे थे। कमला देवी भी खुश थीं कि सब कुछ अच्छे से हो गया।


लेकिन तभी सिमरन की नजर खाने की टेबल पर रखे पुलाव पर गई।


उसने एक चम्मच चखा और अचानक ऊँची आवाज़ में बोली—“मम्मी, ये पुलाव इतना फीका किसने बनाया? सच में, भाभी को खाना बनाना आता भी है या बस तारीफें बटोरनी आती हैं?”


इतना सुनते ही आसपास बैठे लोग चुप हो गए।


कुछ रिश्तेदार असहज होकर इधर-उधर देखने लगे।


नेहा के हाथ रुक गए।


वह पानी के गिलास ट्रे में रख रही थी। उसकी आँखें झुक गईं। उसने महसूस किया जैसे सबके सामने उसकी मेहनत का मजाक बना दिया गया हो।


उसने खुद को संभालने की कोशिश की और चुपचाप वापस मुड़ने लगी।


तभी अचानक विनोद जी अपनी जगह से उठे।


घर में सब उन्हें शांत स्वभाव वाला इंसान मानते थे। उन्होंने कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं की थी, लेकिन उस दिन उनके चेहरे पर नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी।


उन्होंने सख्त आवाज़ में कहा—“बस बहुत हो गया सिमरन।”


पूरा घर शांत हो गया।


सिमरन हैरानी से अपने पिता को देखने लगी।


विनोद जी बोले—“जिस बहू ने इस घर को अपना घर समझकर हर रिश्ता निभाया, तुम हर बार उसी को नीचा दिखाने की कोशिश करती हो। कभी सोचा है कि सुबह से बिना रुके काम कौन कर रहा है? मेहमानों का ध्यान कौन रख रहा है? तुम्हारी माँ की तबीयत खराब होने पर रात-रातभर कौन जागता है?”


सिमरन चुप खड़ी रही।


विनोद जी की आवाज और भारी हो गई—“बेटी होने का मतलब यह नहीं कि तुम किसी का सम्मान छीन लो। नेहा इस घर की बहू ही नहीं, इस परिवार का हिस्सा है।”


कमला देवी की आँखें भी भर आईं।


उन्होंने आगे बढ़कर नेहा का हाथ पकड़ लिया और बोलीं—“इसने कभी बदले में कुछ नहीं माँगा। सिर्फ अपनापन दिया है।”


नेहा अब खुद को रोक नहीं पाई। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।


उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसकी चुप्पी और मेहनत किसी ने सच में समझी है।


रिश्तेदार भी विनोद जी की बात से सहमत दिखाई दिए।


एक बुजुर्ग महिला बोलीं—“जिस घर में बहू की इज्जत होती है, वही घर खुश रहता है।”


सिमरन अब पूरी तरह शांत हो चुकी थी।


पहली बार उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था।


पार्टी खत्म होने के बाद घर में सन्नाटा था।


नेहा रसोई में बर्तन समेट रही थी। तभी पीछे से सिमरन धीरे-धीेरे उसके पास आई।


उसकी आवाज भर्रा गई थी।


वह बोली—“भाभी… मैं आपसे जलने लगी थी। मुझे लगता था कि मम्मी-पापा अब आपसे ज्यादा प्यार करने लगे हैं। इसलिए मैं हर बात पर आपको गलत साबित करना चाहती थी।”


नेहा ने उसकी तरफ देखा।


सिमरन की आँखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।


नेहा हल्का-सा मुस्कुराई और बोली—“रिश्तों में प्यार बाँटने से कम नहीं होता। परिवार में जितना अपनापन बढ़ता है, घर उतना ही खुश रहता है।”


यह सुनते ही सिमरन रो पड़ी।


उसने पहली बार दिल से नेहा को गले लगा लिया।


दरवाजे पर खड़ी कमला देवी और विनोद जी यह सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर संतोष था।


उन्हें समझ आ गया था कि घर को टूटने से बचाने के लिए सिर्फ चुप रहना काफी नहीं होता, सही समय पर सही बात कहना भी जरूरी होता है।


उस दिन के बाद घर का माहौल बदलने लगा।


सिमरन अब नेहा के साथ रसोई में काम करती, उसके लिए कपड़े लाती, उससे सलाह लेती और हर जगह उसकी तारीफ करती।


करण भी अब पहले से ज्यादा खुश रहने लगा था क्योंकि घर में तनाव की जगह अपनापन आ गया था।


नेहा भी अब खुलकर हँसने लगी थी।


कमला देवी हर रिश्तेदार से गर्व से कहतीं—“बहू अगर बेटी जैसा साथ दे, तो घर स्वर्ग बन जाता है।”


धीरे-धीरे उस घर से ताने खत्म हो गए।


अब वहाँ सिर्फ हँसी सुनाई देती थी।


क्योंकि जिस परिवार में सम्मान और समझदारी साथ रहती है… वहाँ रिश्ते कभी टूटते नहीं, और घर हमेशा घर बना रहता है।



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