जब बहू ने ससुर के पैरों में बैठकर मांगी माफी
“कई बार इंसान अपने ही घर के दरवाज़े पर मेहमान बनकर खड़ा होता है… और उसे सबसे ज्यादा डर गैरों से नहीं, अपनों के बदलते व्यवहार से लगता है… लेकिन वक्त जब इंसान को उसकी गलतियों का आईना दिखाता है, तब टूटते रिश्ते भी फिर से जुड़ने लगते हैं…”
पूरे मोहल्ले में उस दिन हलचल थी।
गली के बाहर बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ खड़ी थीं। पड़ोस की औरतें अपने घरों की छतों से झांक-झांक कर सामने वाले मकान को देख रही थीं। शर्मा जी के घर में उनके छोटे बेटे रोहित की शादी की तैयारियाँ चल रही थीं।
आँगन में टेंट वाले कुर्सियाँ लगा रहे थे। रसोई में हलवाई कढ़ाई में मिठाइयाँ तल रहा था। घर के अंदर रिश्तेदारों की हँसी गूंज रही थी। लेकिन इस शोर के बीच एक कमरा ऐसा भी था जहाँ गहरी खामोशी पसरी हुई थी।
उस कमरे में बैठे थे हरिनारायण जी।
सफेद बाल, झुकी हुई कमर और आँखों पर मोटा चश्मा। उनके हाथ में पुरानी दवाइयों की पर्ची थी लेकिन नजरें कहीं और खोई हुई थीं।
उनकी पत्नी सावित्री जी कपड़े तह कर रही थीं। तभी हरिनारायण जी ने धीमी आवाज में कहा।
“सावित्री… लगता है इस बार भी हम बस मेहमान बनकर रह जाएंगे।”
सावित्री जी रुक गईं।
“ऐसा क्यों बोल रहे हैं?”
हरिनारायण जी हल्का सा हँसे लेकिन उस हँसी में दर्द था।
“क्योंकि बड़े बेटे अमित और बहु नेहा के रहते इस घर में हमारी जगह कब की खत्म हो चुकी है।”
उनकी आँखों के सामने तीन महीने पुराना वो दिन घूम गया…
जब अमित ने सब रिश्तेदारों के सामने गुस्से में कह दिया था—
“पापा, अब हर बात में दखल देना बंद कीजिए। ये घर अब हमारे तरीके से चलेगा।”
उस दिन हरिनारायण जी चुप रह गए थे।
लेकिन उससे भी ज्यादा चोट उन्हें तब लगी थी जब उनकी बहु नेहा ने कहा था—
“और हाँ पापा जी, अगर हर चीज़ में दिक्कत है तो गाँव वापस चले जाइए।”
उस दिन पहली बार हरिनारायण जी को अपने ही घर में पराया महसूस हुआ था।
इसीलिए आज रोहित की शादी की खुशी भी उनके अंदर डर बनकर बैठी थी।
उन्हें लग रहा था कि शादी खत्म होते ही शायद फिर वही अपमान उनका इंतजार कर रहा होगा।
उधर घर के दूसरे कमरे में नेहा अलमारी से कपड़े निकाल रही थी। तभी उसकी नजर पुराने फोटो एलबम पर पड़ी।
उसने एलबम खोला।
पहली तस्वीर में अमित छोटा बच्चा था… और हरिनारायण जी उसे अपने कंधे पर बैठाकर मेले में घुमा रहे थे।
दूसरी तस्वीर में स्कूल की फीस की रसीद थी… पीछे लिखा था—
“इस महीने खुद नई शर्ट नहीं खरीदी, लेकिन बेटे की फीस भर दी।”
नेहा की आँखें कुछ पल के लिए ठहर गईं।
तभी बाहर से आवाज आई—
“भाभी, पापा जी खाना नहीं खा रहे।”
नेहा जल्दी से बाहर आई।
डाइनिंग टेबल पर सब लोग बैठे थे लेकिन हरिनारायण जी चुपचाप पानी पी रहे थे।
नेहा ने पूछा—
“पापा जी खाना क्यों नहीं खा रहे?”
हरिनारायण जी मुस्कुराए।
“भूख नहीं है बेटा।”
लेकिन नेहा समझ गई थी कि बात भूख की नहीं, मन की है।
रात को शादी की रस्में खत्म हुईं।
सारे रिश्तेदार थककर सो गए।
लेकिन नेहा की आँखों में नींद नहीं थी।
वो बालकनी में खड़ी बहुत देर तक सोचती रही।
उसे कुछ दिन पहले मायके की वो घटना याद आ गई…
जब उसकी अपनी माँ सीढ़ियों से गिर गई थीं और उसके भाई की पत्नी ने चिढ़कर कहा था—
“हर वक्त इन्हीं बुजुर्गों की वजह से परेशानी लगी रहती है।”
उस दिन पहली बार नेहा को अपनी सास-ससुर की तकलीफ समझ आई थी।
उसने महसूस किया कि जो दर्द आज उसके माता-पिता झेल रहे हैं… वही दर्द कभी उसने हरिनारायण जी को दिया था।
सुबह शादी का दिन था।
पूरा घर रोशनी से चमक रहा था।
रोहित दूल्हे के कपड़ों में तैयार खड़ा था। तभी पंडित जी ने कहा—
“दूल्हे के पिता को बुलाइए।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
हरिनारायण जी धीरे-धीरे चलकर मंडप की तरफ बढ़े।
लेकिन तभी अमित का फोन बजा।
ऑफिस से जरूरी कॉल थी। वो जल्दी में बाहर चला गया।
उधर मंडप में हरिनारायण जी अकेले खड़े रह गए।
कुछ रिश्तेदार धीरे-धीरे कानाफूसी करने लगे।
“देखो… बेटा अपनी शादी में भी बाप के साथ नहीं खड़ा।”
हरिनारायण जी की आँखें झुक गईं।
उन्हें लगा जैसे एक बार फिर सबके सामने उनका अपमान हो रहा है।
तभी अचानक नेहा आगे आई।
उसने सबके सामने ऊँची आवाज में कहा—
“रुकिए पापा जी।”
सबकी नजरें उसकी तरफ घूम गईं।
नेहा मंडप के बीच पहुँची… और हरिनारायण जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“पापा जी… आज तक मैंने आपको सिर्फ अमित के पिता की तरह देखा… लेकिन कभी ये नहीं समझा कि इस घर की नींव आप हैं।”
पूरा मंडप शांत था।
नेहा रोते हुए बोली—
“जिस इंसान ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए लगा दी… वही इंसान बुढ़ापे में सम्मान के लिए तरस जाए… इससे बड़ा पाप कोई नहीं।”
अमित भी वापस आ चुका था।
वो चुपचाप सब सुन रहा था।
नेहा ने कांपती आवाज में कहा—
“पापा जी, मैंने आपको बहुत दुख दिए हैं। लेकिन आज सबके सामने वादा करती हूँ… अब इस घर में कभी आपको अकेला महसूस नहीं होने दूँगी।”
हरिनारायण जी की आँखें भर आईं।
उन्होंने नेहा के सिर पर हाथ रखा।
“बेटी… गलती इंसान से ही होती है। लेकिन हर किसी में उसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती।”
इतना सुनते ही अमित भी अपने पिता के पैरों में बैठ गया।
“पापा… मुझे माफ कर दीजिए। नौकरी और जिम्मेदारियों के बीच मैं ये भूल गया कि जिस बाप ने चलना सिखाया… उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते।”
सावित्री जी रोते हुए भगवान की तरफ देखने लगीं।
शायद बरसों बाद उनका परिवार फिर से एक हो रहा था।
शादी की रस्में पूरी हुईं।
लेकिन उस दिन घर में सिर्फ एक बेटे की शादी नहीं हुई थी…
उस दिन टूटे हुए रिश्तों का भी फिर से मिलन हुआ था।
रात को जब सारे मेहमान चले गए तो हरिनारायण जी आँगन में कुर्सी पर बैठे थे।
नेहा उनके लिए दूध लेकर आई।
हरिनारायण जी मुस्कुराए।
“बहु…”
नेहा तुरंत बोली—
“बहु नहीं पापा जी… बेटी।”
हरिनारायण जी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कहा—
“शायद यही असली सुख है… जब इंसान बुढ़ापे में सम्मान से जी सके।”
दोस्तों, घर बड़ा होने से परिवार बड़ा नहीं बनता।
परिवार बड़ा तब बनता है… जब उसमें बड़ों की इज्जत और छोटों के दिल में अपनापन बचा रहे।
याद रखिए… बच्चे हमारी बातें नहीं, हमारा व्यवहार सीखते हैं।
अगर आज हम अपने माता-पिता को अकेला छोड़ देंगे… तो कल हमारी औलाद भी वही सीखेगी।
कर्म कभी आवाज नहीं करता… लेकिन लौटकर जरूर आता है।
इसलिए अपने घर के बुजुर्गों को बोझ मत समझिए।
क्योंकि जिस दिन उनके हाथ सिर से उठ जाते हैं… उस दिन जिंदगी की सबसे बड़ी छाँव चली जाती है।

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