मैं सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, किसी की बेटी भी हूँ

 

Emotional Indian woman leaving her in-laws’ house with luggage after standing up for her parents’ rights and responsibilities.


“कई बार लोग शादी के बाद लड़की से यह उम्मीद करने लगते हैं कि वह अपने पुराने रिश्तों को भूल जाए… लेकिन एक बेटी का अपने माता-पिता से रिश्ता कभी खत्म नहीं होता…”


पूरे घर में मेहमानों की आवाज़ें गूंज रही थीं।


ड्रॉइंग रूम में रिश्तेदार बैठे हँस-बोल रहे थे। रसोई में बर्तनों की खनखनाहट लगातार सुनाई दे रही थी। आँगन में बच्चे खेल रहे थे और पूजा की तैयारी चल रही थी। लेकिन इस चहल-पहल के बीच नैना का मन बिल्कुल शांत नहीं था।


वह रसोई में खड़ी सबके लिए चाय बना रही थी, तभी उसका फोन बार-बार वाइब्रेट होने लगा। हाथ व्यस्त होने की वजह से उसने फोन नहीं उठाया। कुछ देर बाद जब वह अपने कमरे में गयी तो देखा उसकी छोटी बहन रिया के छह मिस्ड कॉल थे।


नैना का दिल घबरा गया।


उसने तुरंत रिया को फोन लगाया।


उधर से रोती हुई आवाज़ आयी —

“दीदी… मम्मी सीढ़ियों से गिर गयी हैं। उनके पैर में बहुत चोट लगी है। डॉक्टर ने कहा है कुछ दिन पूरा आराम करना होगा। पापा अकेले सब नहीं संभाल पा रहे… आप आ जाओ न दीदी…”


नैना कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गयी।


उसे समझ नहीं आया क्या बोले।


उसकी माँ कभी एक जगह बैठने वाली औरत नहीं थीं। पूरा घर अकेले संभालती थीं। हमेशा सबकी चिंता करती थीं। और आज वही बिस्तर पर थीं।


नैना ने खुद को संभालते हुए पूछा —

“रिया… ज्यादा चोट तो नहीं लगी न?”


रिया फिर रोने लगी —

“दीदी… मम्मी आपको बहुत याद कर रही हैं…”


इतना सुनते ही नैना की आँखें भर आयीं।


उसने तुरंत कहा —

“तू चिंता मत कर। मैं आती हूँ।”


फोन रखने के बाद वह कुछ देर बिस्तर पर बैठी रही।


उसके मन में एक ही डर था।


घर वाले उसे जाने देंगे या नहीं?


नैना की शादी को तीन साल हो चुके थे। इन तीन सालों में वह मुश्किल से दो बार मायके गयी थी। हर बार जाने को लेकर घर में झगड़ा हो जाता था।


उसकी सास कमला देवी हमेशा कहती थीं —

“शादी के बाद लड़की का असली घर ससुराल होता है।”


और उसका पति अमन हर बार यही कहता —

“तुम्हें अपने मायके की बहुत चिंता रहती है।”


धीरे-धीरे नैना ने बोलना ही कम कर दिया था। उसने हर बात चुपचाप माननी शुरू कर दी थी। लेकिन आज बात अलग थी।


आज उसकी माँ को उसकी जरूरत थी।


नैना ने हिम्मत करके अपना बैग निकाला और कपड़े रखने लगी।


तभी कमरे में अमन आ गया।


उसने पूछा —

“ये सब क्या हो रहा है?”


नैना ने शांत आवाज़ में कहा —

“मम्मी गिर गयी हैं। मुझे कुछ दिनों के लिए मायके जाना होगा।”


अमन का चेहरा तुरंत बदल गया।


उसने कहा —

“तुम कहीं नहीं जाओगी।”


नैना ने पहली बार उसकी आँखों में देखकर पूछा —

“क्यों?”


अमन बोला —

“घर में इतने मेहमान हैं। मम्मी अकेली कैसे संभालेंगी सब?”


नैना ने धीरे से कहा —

“मेरी माँ भी तो अभी अकेली हैं।”


इतना सुनते ही अमन चिढ़ गया।


उसने ऊँची आवाज़ में कहा —

“हर बात में मायका बीच में मत लाया करो। शादी हो चुकी है तुम्हारी।”


नैना की आँखों में दर्द उतर आया।


वह बोली —

“शादी होने से क्या बेटी होना खत्म हो जाता है?”


अमन चुप रहा।


नैना आगे बोली —

“आज तक मैंने आपकी हर बात मानी। कभी किसी चीज़ के लिए मना नहीं किया। आपकी माँ की सेवा की, इस घर को अपना घर माना। लेकिन क्या मुझे अपनी माँ के पास जाने का भी हक नहीं है?”


कमला देवी भी कमरे में आ गयी थीं।


उन्होंने आते ही कहा —

“इतना ही मन करता है मायके जाने का तो वहीं रहो।”


नैना कुछ पल शांत रही।


फिर उसने धीरे लेकिन मजबूती से कहा —

“अगर एक बेटा अपने माता-पिता की चिंता कर सकता है… तो एक बेटी क्यों नहीं?”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


नैना की आवाज़ भर्रा गयी थी लेकिन शब्द बिल्कुल साफ थे।


“जब मैं बीमार पड़ती हूँ तो मेरी माँ रात-रात भर जागती हैं। जब मुझे दर्द होता है तो उन्हें तकलीफ होती है। क्या शादी के बाद उनका मुझ पर कोई हक नहीं बचता?”


अमन कुछ बोल नहीं पा रहा था।


नैना ने आगे कहा —

“मैं इस घर की बहू हूँ, जिम्मेदारी समझती हूँ। लेकिन उससे पहले मैं अपनी माँ की बेटी हूँ। और आज उन्हें मेरी जरूरत है।”


कमला देवी गुस्से में बोलीं —

“बहुत जवाब देने लगी हो।”


नैना ने पहली बार बिना डरे कहा —

“अगर अपने माता-पिता के लिए खड़ा होना जवाब देना है… तो हाँ, आज मैं जवाब दे रही हूँ।”


इतना कहकर उसने अपना बैग उठाया।


अमन ने गुस्से में कहा —

“अगर इस घर से गयी तो वापस मत आना।”


नैना कुछ पल रुकी।


उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन चेहरे पर डर नहीं था।


वह बोली —

“जिस रिश्ते में मुझे अपने माता-पिता के लिए खड़ा होने की इजाज़त नहीं… उस रिश्ते को बचाकर भी क्या मिलेगा?”


इतना कहकर वह बाहर निकल गयी।


पूरा घर उसे जाता हुआ देखता रह गया।


नैना सीधे अपने मायके पहुँची।


दरवाज़ा खोलते ही उसकी माँ व्हीलचेयर पर बैठी दिखाई दीं।


उन्हें उस हालत में देखकर नैना खुद को रोक नहीं पायी और उनकी गोद में सिर रखकर रो पड़ी।


उसकी माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा —

“तू आ गयी बेटा…”


नैना बस इतना कह पायी —

“आपको मेरी जरूरत थी न माँ…”


अगले कई दिनों तक नैना ने अपनी माँ की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा।


उन्हें दवा देना, खाना बनाना, रात में उठकर देखना, डॉक्टर के पास ले जाना… उसने सब कुछ अकेले संभाल लिया।


उसके पिता कई बार उसे देखते और भावुक हो जाते।


एक दिन उन्होंने कहा —

“बेटा… तेरे ससुराल वालों ने कुछ कहा नहीं?”


नैना हल्का सा मुस्कुराई।


वह बोली —

“पापा… अभी ये बातें रहने दीजिए।”


लेकिन सच तो यह था कि इन दिनों अमन का एक भी फोन नहीं आया था।


नैना समझ चुकी थी कि शायद उसका रिश्ता अब खत्म हो चुका है।


लेकिन उसे इस बात का दुख नहीं था।


उसे सुकून था कि वह अपनी माँ के साथ थी।


इधर एक दिन कमला देवी अपनी पड़ोसन के घर गयीं।


वहाँ उनकी पड़ोसन रो रही थीं।


उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की डिलीवरी होने वाली है लेकिन ससुराल वाले उसे मायके नहीं भेज रहे।


वह बार-बार बस एक ही बात कह रही थीं —

“क्या शादी के बाद बेटी पर माँ-बाप का हक खत्म हो जाता है?”


यह बात सुनकर कमला देवी एकदम चुप हो गयीं।


उन्हें पहली बार अपनी गलती समझ आने लगी।


उन्हें याद आया कैसे उन्होंने हर बार नैना को रोका था।


कैसे एक बेटी को उसके अपने माता-पिता से दूर रखा था।


उधर अमन भी धीरे-धीरे अकेलापन महसूस करने लगा था।


उसे एहसास हुआ कि नैना ने कभी इस घर की जिम्मेदारियों से भागने की कोशिश नहीं की।


वह सिर्फ अपने माता-पिता के लिए थोड़ा समय चाहती थी।


उस रात अमन बहुत देर तक सो नहीं पाया।


आखिर उसने नैना को फोन लगाया।


नैना ने स्क्रीन पर अमन का नाम देखा तो उसका दिल धड़कने लगा।


कुछ पल बाद उसने कॉल उठाया।


उधर से धीमी आवाज़ आयी —

“नैना… मुझे माफ कर दो।”


नैना बिल्कुल चुप रह गयी।


अमन की आवाज़ भर्रा गयी थी।


“मैं गलत था। मैंने कभी तुम्हारे दिल को समझने की कोशिश ही नहीं की। तुमने इस घर के लिए इतना कुछ किया… और मैंने तुम्हें तुम्हारे अपने माता-पिता से ही दूर कर दिया।”


नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।


अमन फिर बोला —

“तुम जितने दिन चाहो वहीं रहो। अपनी माँ का पूरा ध्यान रखो। और… अगर हो सके तो वापस आ जाना। इस बार तुम्हें लेने मैं खुद आऊँगा।”


नैना कुछ पल कुछ बोल ही नहीं पायी।


फिर उसने धीरे से कहा —

“मैं नाराज़ आपसे थी… लेकिन रिश्ता तोड़ना नहीं चाहती थी।”


अमन की आँखें भी भर गयीं।


उस दिन पहली बार दोनों ने रिश्ते की असली जिम्मेदारी समझी।


कुछ रिश्ते अधिकार से नहीं… समझ और सम्मान से चलते हैं।


क्योंकि एक लड़की सिर्फ किसी की पत्नी नहीं होती…

वह हमेशा किसी की बेटी भी रहती है।



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