सास के जाते ही बहू ने ननद का मायका खत्म कर दिया, फिर ससुर ने दिया ऐसा जवाब…
“कई बार इंसान अपने अधिकारों को इतना बड़ा समझने लगता है… कि उसे रिश्तों की कीमत छोटी लगने लगती है, लेकिन वक्त उसे बहुत जल्दी आईना दिखा देता है…”
पूरे घर में बिखरा सामान अभी तक अपनी जगह पर नहीं रखा गया था।
आँगन में पड़ी कुर्सियाँ एक तरफ जमा थीं। रसोई में इस्तेमाल हुए बर्तनों का ढेर लगा था और दीवार पर लगी तस्वीर के सामने रखा फूलों का हार अभी ताज़ा ही था।
घर में पिछले कई दिनों से दुख का माहौल था।
लेकिन उस दुख के बीच निधि के मन में एक अलग ही खुशी पल रही थी।
वो अपने कमरे में बैठी मोबाइल चला रही थी। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। अचानक उसने धीरे से खुद से कहा—
“अब कोई मुझे हर बात पर सीख देने वाला नहीं रहा… अब मैं अपने हिसाब से जीऊँगी।”
उसकी सास कमला जी को गए हुए सिर्फ अठारह दिन हुए थे।
कमला जी बहुत सीधी और शांत स्वभाव की महिला थीं। बीमारी के बावजूद उन्होंने कभी घर की जिम्मेदारियों से खुद को अलग नहीं किया था। वो हमेशा सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करती थीं।
लेकिन बहू निधि को उनकी हर बात बोझ लगती थी।
अगर कमला जी कहतीं—
“बहू, खाना थोड़ा समय पर बना लिया करो…”
तो निधि को लगता जैसे उस पर हुकूमत की जा रही हो।
अगर वो बोलतीं—
“बहू, पापा जी की दवाई रख देना…”
तो निधि मन ही मन चिढ़ जाती।
धीरे-धीरे उसने अपने मन में यह धारणा बना ली कि इस घर में उसकी सबसे ज्यादा अहमियत है क्योंकि उसका पति रोहन कमाता है।
हालांकि असली स्थिति कुछ और थी।
ससुर देवेंद्र जी की किराए की दो दुकानें थीं जिनसे घर का अच्छा खर्च निकल आता था। ऊपर से उनकी पेंशन भी थी। रोहन जरूर नौकरी करता था लेकिन पूरा घर उसी की कमाई पर नहीं चल रहा था।
फिर भी निधि हमेशा यही सोचती—
“अगर रोहन ना हो तो ये लोग कुछ नहीं कर पाएँगे।”
सास के जाने के बाद उसका व्यवहार और बदल गया।
अब वो खुलकर अपनी मनमर्जी करने लगी थी। कभी देर तक सोती रहती, कभी खाना बाहर से मँगवा लेती। घर की साफ-सफाई भी पहले जैसी नहीं रही।
देवेंद्र जी कई बार सब देखकर चुप रह जाते।
पत्नी के जाने के बाद वैसे ही उनका मन टूट चुका था।
उधर रोहन ऑफिस के काम में व्यस्त रहता था। उसे घर की छोटी-छोटी बातें समझ ही नहीं आती थीं।
उस दिन रोहन की छोटी बहन रचना अपने ससुराल वापस जाने की तैयारी कर रही थी।
उसने अपने बैग बंद किए और जाते-जाते निधि के पास आकर बोली—
“भाभी… पापा अकेले हो गए हैं। उनका ध्यान रखिएगा।”
निधि ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
“हूँ…”
रचना ने फिर कहा—
“और कभी जरूरत पड़े तो मुझे बता दीजिएगा। मैं आती-जाती रहूँगी।”
इस बार निधि ने मोबाइल नीचे रखा और सीधे उसकी तरफ देखकर बोली—
“इतना बार-बार आने की जरूरत नहीं है।”
रचना चौंक गई।
“क्या मतलब भाभी?”
“मतलब साफ है। अब आपका अपना घर है। वहीं ध्यान दीजिए।”
“लेकिन ये भी तो मेरा घर है…”
रचना ने धीमी आवाज में कहा।
निधि तुरंत बोली—
“था। अब नहीं है।”
रचना अवाक उसे देखने लगी।
निधि ने आगे कहा—
“शादी के बाद लड़की का असली घर उसका ससुराल होता है। और वैसे भी… माँ के बिना मायका कैसा?”
उसकी बात सुनकर रचना की आँखें भर आईं।
तभी पीछे से आवाज आई—
“बस बहुत हो गया बहू।”
दोनों ने मुड़कर देखा।
देवेंद्र जी दरवाजे पर खड़े थे।
उनका चेहरा गुस्से से लाल था।
वो धीरे-धीरे अंदर आए और बोले—
“जिस माँ ने तुम्हें बेटी मानकर रखा… उसके जाते ही तुमने उसकी बेटी का घर छीन लिया?”
निधि भी अब खुद को घर की मालकिन समझने लगी थी।
वो तुरंत बोली—
“मैंने कुछ गलत नहीं कहा पापा जी।”
“अब इस घर को संभालना मुझे है, इसलिए फैसला भी मेरा होगा।”
देवेंद्र जी ने गहरी सांस ली।
फिर शांत आवाज में बोले—
“फैसले लेने का हक जिम्मेदारी निभाने वालों को होता है बहू… सिर्फ अधिकार जताने वालों को नहीं।”
निधि ने भी तुनककर कहा—
“घर का खर्च रोहन उठाता है।”
देवेंद्र जी हल्का-सा मुस्कुराए।
“सच में?”
उन्होंने सामने रखी अलमारी की तरफ इशारा किया।
“उस अलमारी में इस घर के सारे कागज हैं। बिजली के बिल से लेकर राशन तक… आज तक किसने भरा है, सब लिखा है।”
“जिस घर को तुम अपने पति की कमाई से चलता समझ रही हो… उसकी नींव मेरी और कमला की मेहनत पर खड़ी है।”
निधि का चेहरा उतर गया।
लेकिन देवेंद्र जी यहीं नहीं रुके।
उन्होंने रचना का हाथ पकड़कर अपने पास बैठाया और बोले—
“बेटी का मायका माँ से नहीं… माँ-बाप के प्यार से होता है।”
“और जब तक मैं जिंदा हूँ, इस घर का दरवाजा मेरी बेटी के लिए हमेशा खुला रहेगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसी समय रोहन भी ऑफिस से वापस आ गया।
उसे माहौल कुछ ठीक नहीं लगा।
देवेंद्र जी ने पहली बार बेटे के सामने साफ शब्दों में कहा—
“रोहन, रिश्ते निभाने पड़ते हैं। अगर घर में सिर्फ अधिकार बचेंगे… तो एक दिन अपनापन खत्म हो जाएगा।”
रोहन चुप हो गया।
उधर निधि पहली बार खुद को अकेला महसूस कर रही थी।
उसे लग रहा था कि सास के जाने के बाद घर पूरी तरह उसका हो जाएगा।
लेकिन उस दिन उसे समझ आया कि घर पर कब्जा किया जा सकता है… रिश्तों पर नहीं।
और जिस इंसान को वो कमजोर समझ रही थी… वही इस घर की असली ताकत था।

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