जिसने पूरे गांव को संभाला, आखिर में वही अकेला रह गया
“कभी-कभी जिंदगी में कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, फिर भी वे हर उस रिश्ते से बड़े साबित हो जाते हैं जिन पर दुनिया सबसे ज्यादा भरोसा करती है। लेकिन ऐसे लोगों की असली कीमत अक्सर तब समझ आती है, जब वे हमारे बीच नहीं रहते...”
गांव के बीचों-बीच एक पुरानी किराने की दुकान थी। उस दुकान के मालिक थे मोहन काका।
पूरे गांव में शायद ही कोई ऐसा घर हो, जो मोहन काका को न जानता हो। उनकी दुकान सिर्फ सामान खरीदने की जगह नहीं थी, बल्कि गांव वालों की छोटी-बड़ी परेशानियों का भी सहारा थी।
जिसके घर में राशन खत्म हो जाता, उसे उधार मिल जाता।
जिसके पास दवाई के पैसे नहीं होते, मोहन काका खुद खरीद कर दे देते।
किसी बेटी की शादी हो तो सबसे पहले मदद के लिए वही पहुंचते।
इसी गांव में रानी नाम की एक लड़की रहती थी।
रानी जब छोटी थी, तब उसके पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। घर में मां और रानी के अलावा कोई नहीं था।
रानी की मां खेतों में मजदूरी करके घर चलाती थी।
जब भी रानी स्कूल जाती, मोहन काका उसे आवाज लगाते।
“अरे बिटिया, पढ़-लिखकर बड़ी अफसर बनना है कि नहीं?”
फिर उसे कभी बिस्कुट तो कभी टॉफी दे देते।
रानी हंसते हुए कहती, “काका, मैं बड़ी होकर मास्टरनी बनूंगी।”
मोहन काका गर्व से कहते, “बिलकुल बनेगी।”
समय बीतता गया।
रानी बड़ी होती गई।
एक साल ऐसा आया जब गांव में भयंकर सूखा पड़ गया।
लोगों की फसलें बर्बाद हो गईं।
कई घरों में खाने तक की समस्या खड़ी हो गई।
लेकिन मोहन काका ने अपनी दुकान का उधार बंद नहीं किया।
लोग कहते, “काका, इतना उधार दोगे तो खुद क्या खाओगे?”
मोहन काका मुस्कुरा देते।
“जब गांव भूखा रहेगा तो मैं पेट भरकर कैसे खा लूंगा?”
धीरे-धीरे उनकी जमा पूंजी खत्म होने लगी।
फिर भी उन्होंने किसी को मना नहीं किया।
रानी की मां भी कई बार उधार सामान ले जाती थीं।
जब पैसे देने की बात करतीं तो मोहन काका कहते,
“पहले बेटी को पढ़ाओ, हिसाब बाद में देखेंगे।”
कुछ साल बाद रानी बारहवीं कक्षा में पहुंच गई।
उसे शहर के कॉलेज में दाखिला मिल गया।
लेकिन फीस भरने के पैसे नहीं थे।
रानी ने रोते हुए मां से कहा,
“मां, रहने दो। मैं आगे नहीं पढ़ूंगी।”
उसकी बात सुनकर मां भी रोने लगी।
अगले दिन मोहन काका उनके घर पहुंचे।
उन्होंने बिना कुछ कहे एक लिफाफा रानी के हाथ में रख दिया।
उसमें कॉलेज की पूरी फीस थी।
रानी हैरान रह गई।
“काका, ये पैसे?”
मोहन काका हंस पड़े।
“जब तू मास्टरनी बन जाएगी, तब लौटा देना।”
रानी रो पड़ी।
उस दिन उसने मन ही मन ठान लिया कि वह कभी मोहन काका का एहसान नहीं भूलेगी।
कॉलेज पूरा हुआ।
रानी को शहर के एक स्कूल में नौकरी मिल गई।
अब उसकी जिंदगी बदलने लगी।
इधर मोहन काका बूढ़े होते जा रहे थे।
उनकी पत्नी का कई साल पहले निधन हो चुका था।
कोई संतान भी नहीं थी।
फिर भी वे अकेले ही दुकान संभालते रहे।
एक दिन गांव में खबर फैली कि मोहन काका की दुकान में रात को चोरी हो गई।
सारा सामान और नकदी गायब थी।
लोगों ने अफसोस जताया, लेकिन मदद के लिए बहुत कम लोग आगे आए।
कुछ लोगों ने तो उल्टा कहना शुरू कर दिया कि शायद मोहन काका खुद झूठ बोल रहे हैं।
यह बात उन्हें भीतर तक तोड़ गई।
जिस गांव के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी लगा दी, वहीं लोग उन पर शक कर रहे थे।
धीरे-धीरे दुकान बंद हो गई।
आमदनी का कोई साधन नहीं बचा।
मोहन काका गांव के बाहर बने छोटे से कमरे में रहने लगे।
रानी को इस बारे में पता नहीं था क्योंकि वह शहर में नौकरी कर रही थी।
कई साल बाद जब वह छुट्टियों में गांव आई, तब उसे सारी बात मालूम हुई।
वह तुरंत मोहन काका के पास पहुंची।
कमरे के भीतर अंधेरा था।
एक पुरानी चारपाई पर मोहन काका लेटे हुए थे।
पहले वाले हंसमुख चेहरे की जगह अब थकान दिखाई देती थी।
रानी को देखते ही उनकी आंखें भर आईं।
“अरे मास्टरनी बिटिया... तू आ गई?”
रानी उनके पैरों में बैठकर रोने लगी।
“काका, आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
मोहन काका मुस्कुराए।
“तुझे परेशान नहीं करना चाहता था।”
रानी ने देखा कि कमरे में खाने तक का ठीक इंतजाम नहीं था।
उसका दिल टूट गया।
वह अगले दिन ही उन्हें अपने साथ ले जाने लगी।
लेकिन मोहन काका नहीं माने।
“बेटी, पूरी जिंदगी किसी पर बोझ नहीं बना। अब भी नहीं बनूंगा।”
रानी ने बहुत समझाया।
लेकिन वे नहीं माने।
इसके बाद रानी ने गांव में एक बैठक बुलाई।
उसने सब गांव वालों को मोहन काका की पुरानी मदद याद दिलाई।
धीरे-धीरे लोगों को अपनी गलती का एहसास होने लगा।
जिन लोगों ने कभी उनसे उधार लिया था, वे आगे आने लगे।
किसी ने पैसे दिए।
किसी ने राशन।
किसी ने कपड़े।
कुछ युवाओं ने मिलकर उनकी दुकान फिर से शुरू करवा दी।
जब मोहन काका ने नई दुकान का उद्घाटन देखा तो उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
उन्होंने कहा,
“आज मुझे लग रहा है कि मेरी जिंदगी बेकार नहीं गई।”
पूरा गांव तालियां बजाने लगा।
लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था।
कुछ महीनों बाद मोहन काका की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
आखिरी समय में उन्होंने रानी का हाथ पकड़ लिया।
धीरे से बोले,
“बेटी... मुझे खुशी है कि तू अपने सपने पूरे कर पाई।”
रानी रोते हुए बोली,
“काका, ये सब आपकी वजह से हुआ है।”
मोहन काका मुस्कुराए।
“बस इतना याद रखना... इंसान की सबसे बड़ी कमाई पैसा नहीं, लोगों की दुआएं होती हैं...”
इतना कहकर उन्होंने आंखें बंद कर लीं।
पूरा गांव रो पड़ा।
उनकी अंतिम यात्रा में शायद ही कोई घर ऐसा था, जहां से कोई शामिल न हुआ हो।
कुछ महीनों बाद गांव के स्कूल के सामने उनकी एक प्रतिमा लगाई गई।
उस पर लिखा था—
“जिसने अपना जीवन दूसरों के लिए जीया, वह कभी मरता नहीं।”
जब भी रानी उस प्रतिमा के सामने से गुजरती, उसे लगता जैसे मोहन काका आज भी मुस्कुराकर कह रहे हों—
“मेरी बेटी पढ़-लिखकर सचमुच बड़ी इंसान बन गई...”

Post a Comment