एक माँ ने जन्म दिया… दूसरी ने जिंदगी दी

 

Emotional Indian woman holding a pink baby dress beside an old memory box filled with photographs and diary pages inside a softly lit room


“जिस इंसान को मैं हमेशा अपनी सबसे बड़ी ताकत समझती रही… उसी ने एक दिन मुझे ऐसा सच बताया, जिसने मेरी पूरी जिंदगी की नींव हिला दी। लेकिन कुछ सच इंसान को तोड़ने नहीं आते… वे उसे उसकी असली पहचान लौटाने आते हैं…”


फोन की घंटी लगातार बज रही थी।


मैंने तीसरी बार स्क्रीन देखी। वही नंबर। वाराणसी से।


मैंने कॉल उठाई। दूसरी तरफ किसी बुज़ुर्ग औरत की आवाज़ थी।


“क्या आप मीरा बोल रही हैं?”


“जी।”


“मैं शारदा आश्रम से बोल रही हूँ। यहाँ एक महिला थीं… सरोज जी। उनका आज निधन हो गया। जाने से पहले उन्होंने आपका नंबर दिया था।”


मेरे हाथ सुन्न पड़ गए।


“कौन सरोज जी?”


कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर आवाज़ आई—


“उन्होंने कहा था… आप उनकी बेटी हैं।”


मेरी साँस अटक गई।


“आपको शायद गलतफहमी हुई है। मेरी माँ का नाम कविता है। और वो बिल्कुल ठीक हैं।”


उधर से धीमी आवाज़ आई—


“मरने से पहले लोग झूठ नहीं बोलते, बेटी।”


कॉल कट गई।


मैं काफी देर तक फोन हाथ में पकड़े बैठी रही।


मेरी उम्र बत्तीस साल थी। मैं जयपुर में स्कूल काउंसलर थी। शादी नहीं हुई थी। मेरी दुनिया बहुत छोटी थी—माँ, पापा, मेरी छोटी बहन रुचि और मेरी नौकरी।


और अभी किसी अजनबी ने फोन करके कहा था कि मेरी असली माँ मर गई।


मैंने काँपते हाथों से तुरंत माँ का नंबर मिलाया।


कुछ सेकंड बाद उनकी आवाज़ सुनाई दी—


“हैलो, मीरा?”


मेरी साँसें तेज चल रही थीं।


“माँ… आप कहाँ हैं?”


“घर पर हूँ बेटा। क्या हुआ? सब ठीक तो है?”


मैंने होंठ भींच लिए। गला अचानक भारी हो गया था।


“आप… ठीक हैं ना?”


माँ हल्का सा हँसीं।


“अरे, मुझे क्या होगा। लेकिन तू रो क्यों रही है?”


मैंने जवाब देने की कोशिश की, पर आवाज़ गले में ही अटक गई।


उधर माँ बार-बार मेरा नाम पुकार रही थीं… और इधर मेरी आँखों से चुपचाप आँसू बहने लगे।


उस रात मैं सो नहीं सकी। बार-बार वही शब्द कानों में घूमते रहे—


“उन्होंने कहा था… आप उनकी बेटी हैं।”


अगले दिन मैंने छुट्टी ली और सीधा घर पहुँच गई।


माँ रसोई में थीं। बिल्कुल सामान्य। जैसे कुछ हुआ ही नहीं।


मैंने बिना घुमाए पूछा—


“माँ… सरोज कौन हैं?”


उनके हाथ से चम्मच गिर गया।


कमरे में अचानक सन्नाटा भर गया।


पापा अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने धीरे से चश्मा उतारा।


माँ कुर्सी पर बैठ गईं।


और पहली बार मुझे लगा… मेरी माँ बूढ़ी हो गई हैं।


उन्होंने बहुत देर बाद कहा—


“फोन आया था?”


मैंने सिर हिलाया।


माँ की आँखें भर आईं।


“मैं सोच रही थी… ये सच मेरे साथ चला जाएगा।”


मेरे अंदर गुस्सा, डर, बेचैनी सब एक साथ उमड़ पड़ा।


“कौन थीं वो?”


माँ ने काँपती आवाज़ में कहा—


“तुम्हारी जन्म देने वाली माँ।”


मुझे लगा किसी ने मेरे कानों में विस्फोट कर दिया हो।


“क्या?”


पापा उठकर बाहर चले गए।


माँ रोने लगीं।


“तुम सिर्फ छह महीने की थीं। सरोज मेरी बड़ी बहन थी।”


मैं पत्थर बनकर बैठी रही।


माँ धीरे-धीरे बोलती रहीं।


“उसकी शादी बहुत खराब घर में हुई थी। पति शराबी था। रोज मारता था। जब तू पैदा हुई, उसने बच्ची को बोझ कहा। सरोज तुझे लेकर मायके भाग आई।”


मैंने महसूस किया मेरा दिल बहुत तेज धड़क रहा है।


“फिर?”


“कुछ महीनों बाद उसके पति ने दूसरी शादी कर ली। सरोज टूट गई थी। उसके पास ना पैसा था, ना घर। मैं तब नई-नई शादी करके इस घर में आई थी।”


माँ की आवाज़ टूट गई।


“एक रात उसने तुम्हें मेरी गोद में रख दिया। उसकी आँखों में आँसू थे। वह काँपती हुई आवाज़ में बोली — ‘मीरा को अपने पास रख ले, कविता… तेरे पास उसे सुरक्षित रखने के लिए घर है। मेरे पास तो सिर्फ डर और असुरक्षा बची है…।’”


मैंने फुसफुसाकर पूछा—


“और आपने रख लिया?”


माँ रो पड़ीं।


“मुझे लगा था… कुछ समय बाद वह वापस आकर तुझे अपने साथ ले जाएगी। लेकिन एक रात वह घर से निकली… और फिर कभी लौटकर नहीं आई।”


“कहाँ गई?”


“मुझे नहीं पता, मीरा। हमने बहुत ढूँढा… रिश्तेदारों से पूछा, पुराने पते देखे… लेकिन उसकी कोई खबर नहीं मिली। साल गुजरते गए, और धीरे-धीरे सबको लगने लगा कि वह कहीं खो गई है।”


मेरे भीतर कुछ बिखर रहा था।


“तो आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”


माँ ने मेरी तरफ देखा।


“क्योंकि मुझे डर था… तू मुझसे दूर हो जाएगी।”


मैं उठकर कमरे में टहलने लगी।


पूरी जिंदगी… झूठ?


मेरा बचपन, मेरी तस्वीरें, स्कूल का पहला दिन, बुखार में माँ का रात भर बैठना… क्या सब नकली था?


मैंने गुस्से में कहा—


“आपको सच बताने का हक था।”


माँ ने सिर झुका लिया।


“हाँ… लेकिन तब तक मैं तुम्हारी माँ बन चुकी थी, मीरा। और जब एक औरत माँ बन जाती है, तो कई बार उसका सबसे बड़ा डर अपने बच्चे को खो देना होता है।”


मैं घर से बाहर निकल गई।


बारिश हो रही थी। मैं सड़क पर चलती रही।


मेरे दिमाग में बचपन की बातें घूमने लगीं।


रिश्तेदार अक्सर मुझे देखकर कहते थे—


“मीरा का चेहरा घर में किसी से नहीं मिलता।”


मैं हर बार हँसकर बात टाल देती थी, लेकिन अंदर ही अंदर सोचती थी… शायद सच में मैं सबसे थोड़ी अलग दिखती हूँ।


अब समझ आया।


तीन दिन तक मैंने माँ से बात नहीं की।


फिर एक पार्सल आया।


भेजने वाला—शारदा आश्रम, वाराणसी।


अंदर एक कपड़े की पोटली, एक पुरानी फोटो और एक डायरी थी।


फोटो में एक दुबली औरत मुझे गोद में लिए मुस्कुरा रही थी।


मेरी आँखें उसी जैसी थीं।


पीछे लिखा था—

“मेरी मीरा, छह महीने।”


मेरे हाथ काँपने लगे।


मैंने डायरी खोली।


पहला पन्ना—


“अगर यह डायरी कभी मीरा तक पहुँचे… तो शायद तब तक मैं उससे मिलने की हिम्मत हार चुकी होऊँगी।”


मेरी उंगलियाँ काँपने लगीं। साँस जैसे सीने में अटक गई।


मैंने अगली पंक्ति पढ़ी—


“मीरा, मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं था… मैंने सिर्फ तुम्हें उस जिंदगी से दूर किया था, जो धीरे-धीरे मुझे खत्म कर रही थी। तुम्हें खोया नहीं, बचाया था।”


मेरी आँखों से आँसू बह निकले। डायरी के शब्द धुंधले पड़ने लगे।


सरोज ने लिखा था कैसे उसका पति उसे जलती लकड़ी से मारता था। कैसे उसने मुझे कई रात भूखा सुलाया क्योंकि घर में दूध नहीं था। कैसे वह मुझे गोद में लेकर मंदिर के पीछे बैठकर रोती थी।


फिर एक जगह लिखा था—


“जिस दिन मीरा ने कविता की गोद में पहली बार पेट भरकर दूध पिया, उसी दिन मुझे समझ आ गया था कि माँ होना सिर्फ बच्चे को जन्म देना नहीं… बल्कि उसे सुरक्षित, प्यार भरी जिंदगी देना भी होता है।”


मेरी आँखों से आँसू लगातार गिरते रहे।


डायरी के आखिरी हिस्से में लिखा था—


“मैं हर साल दूर से मीरा को देखने जाती थी। उसके स्कूल के बाहर खड़ी रहती। उसके जन्मदिन पर मंदिर में दिया जलाती। एक बार उसने सड़क पार करते हुए गिरकर रोया, तो मेरा मन हुआ भागकर उठा लूँ। लेकिन फिर सोचा, उसका हाथ पकड़ने का हक अब कविता का है।”


मैं टूट गई।


इतने साल… वह मुझे दूर से देखती रही?


डायरी के आखिरी पन्ने पर एक चिट्ठी थी।


“मीरा, अगर तू यह पढ़ रही है, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं हूँ। कविता से कभी नाराज़ मत होना। उसने तुझे सिर्फ अपने घर में जगह नहीं दी, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी तुझ पर लगा दी। और अगर कभी तुझे लगे कि मैं बुरी माँ थी, तो बस इतना याद रखना—कुछ औरतें अपने बच्चों को छोड़ती नहीं हैं… वे खुद टूट जाती हैं, ताकि उनके बच्चों की जिंदगी सुरक्षित और बेहतर बन सके।”


मैं फूट-फूटकर रोने लगी।


उस रात पहली बार मैं माँ के कमरे में गई।


वो जाग रही थीं।


मैं उनके पास बैठ गई।


बहुत देर तक हम दोनों चुप रहे।


फिर मैंने धीमी आवाज़ में पूछा—


“आप इतनी डरी हुई क्यों रहती थीं?”


उन्होंने मेरी तरफ देखा, फिर नजरें झुका लीं।


बहुत देर बाद हल्के से बोलीं—


“क्योंकि मुझे हमेशा डर लगता था… कहीं एक दिन तू मुझसे दूर न हो जाए।”


मैंने भर्राई आवाज़ में पूछा—


“आपको सच में लगता था कि मैं आपको छोड़ दूँगी?”


इतना सुनते ही उनकी आँखों से आँसू बह निकले।


उन्होंने काँपते हुए सिर हिलाया—


“हर दिन…”


मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।


“माँ, जन्म सिर्फ खून से मिलता है… लेकिन पूरी जिंदगी किसी के प्यार, त्याग और अपनापन से बनती है।”


मेरी बात सुनते ही माँ फूट-फूटकर रो पड़ीं।


मैंने उन्हें पहली बार उस तरह टूटते देखा।


कुछ दिनों बाद मैं वाराणसी गई।


शारदा आश्रम छोटा सा था। दीवारों पर पुराना पेंट उखड़ा हुआ।


वहाँ की एक वृद्ध महिला मुझे एक कमरे में ले गईं।


“यहीं रहती थीं सरोज।”


कमरे में एक लोहे का बक्सा था।


उसमें मेरी बचपन की तस्वीरों की कॉपियाँ थीं। मेरे स्कूल का रिज़ल्ट अखबार से काटकर रखा हुआ। मेरी कॉलेज की फोटो।


मैं हैरान रह गई।


उन्होंने मेरी पूरी जिंदगी दूर से जी थी।


बक्से के नीचे एक छोटी गुलाबी फ्रॉक थी।


महिला बोलीं—


“सरोज जी इसे बहुत संभालकर रखती थीं। कहती थीं, यह मीरा की पहली फ्रॉक है।”


मैंने फ्रॉक सीने से लगा ली।


मुझे लगा जैसे कोई अधूरा रिश्ता धीरे-धीरे पूरा हो रहा हो।


आश्रम की महिला ने कहा—


“मरने से पहले वो बस एक बात कह रही थीं—मीरा को सच बता देना। और कहना, मैंने उसे कभी छोड़ा नहीं।”


मैंने आँखें बंद कर लीं।


वापस लौटकर मैंने घर की सबसे बड़ी दीवार पर दो तस्वीरें लगाईं।


एक माँ कविता की।


एक सरोज की।


रुचि ने पूछा—

“दोनों क्यों?”


मैंने कहा—

“क्योंकि कुछ लोग हमें जन्म देते हैं… और कुछ लोग हमें जीना सिखाते हैं। मैं दोनों से बनी हूँ।”


कुछ महीनों बाद मैंने स्कूल में एक नया प्रोग्राम शुरू किया।


उन बच्चों के लिए, जिन्हें गोद लिया गया था या जो टूटे परिवारों से आते थे।


पहले दिन मैंने बच्चों से कहा—


“रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते। कई बार सबसे गहरा रिश्ता वही होता है, जिसे कोई इंसान रोज अपने डर से लड़कर निभाता है।”


आज भी मेरे कमरे में वह पुरानी गुलाबी फ्रॉक रखी है।


और माँ कविता हर रविवार मेरे स्टूडियो में आकर बच्चों के लिए खाना बनाती हैं।


कभी-कभी मैं उन्हें चुपके से देखती हूँ।


फिर मन में एक ही बात आती है—


एक औरत ने मुझे जन्म दिया था।


दूसरी ने मुझे कभी टूटने नहीं दिया।


और शायद माँ का मतलब यही होता है—

जो आपको दुनिया से नहीं, आपके अकेलेपन से बचाए।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.