जब माँ ने इंतज़ार करना छोड़ दिया…

 

Elderly Indian woman teaching children at a community center with warm smiles and emotional atmosphere


“कभी-कभी इंसान अपने ही घर में इतना चुप हो जाता है… कि उसकी खामोशी धीरे-धीरे रिश्तों की असली आवाज़ बन जाती है…”


डाइनिंग टेबल पर रखा खाना ठंडा हो चुका था। स्टील की कटोरियों में दाल जमने लगी थी और रसोई से आती हल्दी और घी की खुशबू अब फीकी पड़ चुकी थी। लेकिन साठ वर्षीय विमला देवी अब भी कुर्सी पर बैठी दरवाज़े की तरफ देख रही थीं।


घड़ी में रात के साढ़े नौ बज रहे थे।


उन्होंने एक बार फिर बेटे रोहित को फोन लगाया।


“हाँ माँ?” उधर से जल्दी में आवाज़ आई।


“बेटा, खाना रख दूँ क्या? तूने कहा था जल्दी आ जाएगा…”


“माँ प्लीज़! मैं क्लाइंट मीटिंग में हूँ। हर आधे घंटे में फोन मत किया करो न। बच्चा नहीं हूँ मैं।”


“मैं तो बस…”


“आप खाना खा लो। मेरा इंतज़ार मत किया करो।”


फोन कट गया।


विमला देवी कुछ पल मोबाइल को देखती रहीं। फिर धीरे से उठीं और रोटी वापस डब्बे में रख दी। खुद के लिए आधी रोटी प्लेट में डाली, लेकिन पहला निवाला तोड़ते ही आँखें भर आईं।


उन्हें याद आया—यही रोहित बचपन में बिना उनके हाथ से खिलाए खाना नहीं खाता था।


“माँ, हवाई जहाज बनाओ न…” कहकर रोटी मुँह में लेता और फिर खिलखिलाकर हँसता था।


विमला देवी मुस्कुरा दीं… फिर वही मुस्कान धीरे-धीरे बुझ गई।


अगले दिन उन्होंने बेटी निधि को वीडियो कॉल किया। स्क्रीन पर निधि मेकअप करती दिखाई दी।


“अरे माँ, जल्दी बोलो न। मुझे पार्टी में जाना है।”


“कुछ नहीं बेटा… बस तेरा चेहरा देखने का मन था।”


“माँ, आप भी न! दिनभर अकेली रहती हो इसलिए इमोशनल हो जाती हो। टीवी देखा करो, मंदिर चली जाया करो।”


“हूँ…”


“चलो बाद में बात करती हूँ।”


कॉल खत्म हो गई।


कमरे में फिर वही सन्नाटा फैल गया।


दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पति की तस्वीर को देखकर विमला देवी धीरे से बोलीं, “देख रहे हो न? बच्चे बड़े हो गए हैं… बस शायद हम छोटे पड़ गए।”


उस रात उन्होंने अलमारी से पुराना संदूक निकाला। उसमें बच्चों की छोटी-छोटी चीज़ें रखी थीं—रोहित की पहली स्कूल टाई, निधि की टूटी हुई गुड़िया, पुराने रिपोर्ट कार्ड, और कुछ तस्वीरें।


एक तस्वीर हाथ में लेकर वे देर तक देखती रहीं।


तस्वीर में चारों लोग छत पर बैठे थे। बिजली गई हुई थी। सब हाथ से पंखा झल रहे थे और हँस रहे थे।


विमला देवी की आँखों से आँसू टपक पड़े।


“तब हमारे पास पैसा कम था… लेकिन समय बहुत था।”


तीन दिन बाद मोहल्ले में रहने वाली सरला चाची उससे मिलने घर आ पहुँचीं।

दरवाज़ा खुलते ही उन्होंने विमला देवी को ध्यान से देखा। चेहरे पर थकान थी और मुस्कान कहीं खो सी गई थी।


“अरी विमला, क्या बात है? आजकल तू कहीं दिखती ही नहीं।”


विमला देवी ने हल्की मुस्कान ओढ़ ली।

“बस… ऐसे ही, मन नहीं करता बाहर निकलने का।”


सरला चाची अंदर आकर उनके पास बैठ गईं। उन्होंने गौर से विमला देवी की आँखों की नमी देखी और धीमे स्वर में पूछा,

“सच बता, सब ठीक तो है न?”


विमला देवी ने तुरंत नज़रें झुका लीं।

“हाँ… सब ठीक है।”


लेकिन उनकी आवाज़ की उदासी बता रही थी कि दिल के भीतर बहुत कुछ दबा हुआ है।


लेकिन आँखों की नमी सच बता रही थी।


सरला चाची बोलीं, “चल मेरे साथ।”


“कहाँ?”


“बस चल।”


वे उन्हें पास के सामुदायिक केंद्र ले गईं। वहाँ कई बुज़ुर्ग बैठे थे। कोई भजन गा रहा था, कोई शतरंज खेल रहा था, कोई बच्चों को कहानी सुना रहा था।


एक कोने में कुछ गरीब बच्चे कॉपियाँ लेकर बैठे थे।


“ये क्या है?” विमला देवी ने पूछा।


“हम लोग यहाँ झुग्गी के बच्चों को पढ़ाते हैं,” सरला चाची बोलीं। “घर में अकेले बैठकर दुख गिनने से अच्छा है किसी के काम आओ।”


विमला देवी चुप रहीं।


तभी एक छोटी बच्ची उनके पास आई।


“दादी, आपको हिंदी आती है?”


विमला देवी हल्का सा हँसीं, “हाँ बेटा, बहुत अच्छी आती है।”


“तो मुझे कविता याद करा दो न।”


उस दिन बरसों बाद किसी ने उनसे इतनी अपनापन भरी आवाज़ में कुछ माँगा था।


उन्होंने बच्ची को पास बैठाया और कविता समझाने लगीं।


धीरे-धीरे उनका रोज वहाँ जाना शुरू हो गया।


अब सुबह उठते ही वे जल्दी तैयार हो जातीं। बच्चों के लिए टिफिन बनातीं, कहानियाँ लिखतीं, कविताएँ याद करवातीं।


उनकी जिंदगी फिर से चलने लगी।


उधर रोहित और निधि अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त थे।


एक दिन रोहित ऑफिस से लौटा तो देखा कि माँ ने फोन नहीं किया।


“अजीब है…” उसने सोचा।


फिर अगले दिन भी कोई फोन नहीं आया।


तीसरे दिन उसने खुद कॉल लगाया।


“जिस नंबर पर आप कॉल कर रहे हैं, वह इस समय व्यस्त है।”


रोहित चौंक गया।


पहली बार माँ का फोन उससे ज्यादा किसी और के लिए व्यस्त था।


शाम को उसने घर जाकर देखा तो दरवाज़ा बंद था।


पड़ोसन बोलीं, “अरे बेटा, तुम्हारी माँ तो बच्चों को पढ़ाने जाती हैं आजकल। बहुत खुश रहने लगी हैं।”


“बच्चों को पढ़ाने?”


रोहित हैरान रह गया।


रात को जब विमला देवी घर लौटीं, तो उनके चेहरे पर एक अलग ही सुकून और चमक थी। हाथ में बच्चों की बनाई रंग-बिरंगी ड्रॉइंग्स थीं, जिन्हें वे बड़े संभालकर पकड़े हुए थीं।


दरवाज़ा खुलते ही रोहित ने आश्चर्य से पूछा,

“माँ, आप कहाँ थीं?”


विमला देवी ने हल्की मुस्कान के साथ चप्पल उतारते हुए कहा,

“बस बेटा… थोड़ा काम था।”


“कैसा काम?” रोहित ने उत्सुकता से पूछा।


उन्होंने हाथ में पकड़ी ड्रॉइंग्स उसकी तरफ बढ़ाईं और बोलीं,

“कुछ बच्चे हैं… उन्हें पढ़ाने जाती हूँ। आज उन्होंने ये चित्र बनाए थे।”


रोहित कुछ पल चुपचाप माँ को देखता रह गया।

बरसों बाद उसने उनके चेहरे पर ऐसी सच्ची खुशी देखी थी।


इतने सालों में पहली बार उसने महसूस किया कि माँ की भी अपनी एक दुनिया हो सकती है।


उसी रात निधि का फोन आया।


“माँ! अगले हफ्ते मेरी किटी पार्टी है, आप आ जाओ न बच्चों को संभालने।”


विमला देवी शांत स्वर में बोलीं, “निधि, अगले हफ्ते हमारे बच्चों का कविता प्रतियोगिता है। मैं नहीं आ पाऊँगी।”


“हमारे बच्चे?”


“हाँ… जिन्हें मैं पढ़ाती हूँ।”


निधि कुछ पल चुप रह गई।


धीरे-धीरे दोनों भाई-बहन को एहसास होने लगा कि जिस माँ को वे हमेशा खाली और अकेला समझते थे, उसने खुद को फिर से जीना सीख लिया है।


एक रविवार रोहित सामुदायिक केंद्र पहुँचा।


अंदर का दृश्य देखकर उसकी आँखें नम हो गईं।


विमला देवी फर्श पर बैठी थीं। चारों तरफ बच्चे थे। कोई कविता सुना रहा था, कोई कहानी सुन रहा था।


और उनकी माँ… हँस रही थीं।


वैसी खुलकर हँसती हुई माँ उसने शायद वर्षों बाद देखी थी।


एक बच्चा मासूमियत से बोला, “दादी, आप कल नहीं आई थीं न… इसलिए बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।”


दूसरा तुरंत मुस्कुराते हुए बोला, “हाँ दादी, आपकी कहानी सुने बिना तो मज़ा ही नहीं आता।”


बच्चों की बातें सुनकर रोहित की नज़रें झुक गईं। उसके भीतर अचानक एक गहरा अपराधबोध उमड़ पड़ा।


जिस माँ के पास बैठने का समय उसके पास नहीं था… वही माँ कई बच्चों की दुनिया बन चुकी थीं।


घर लौटते समय उसने धीरे से पूछा, “माँ… आप हमसे नाराज़ हैं क्या?”


विमला देवी मुस्कुराईं।


“नहीं बेटा। बस अब मैंने इंतज़ार करना छोड़ दिया है।”


ये सुनकर रोहित की आँखें भर आईं।


उस रात उसने और निधि ने बहुत देर तक बात की।


दोनों को एहसास हुआ कि उन्होंने माँ को सिर्फ एक ज़िम्मेदारी समझ लिया था—एक ऐसी मौजूदगी, जो हमेशा घर में रहेगी, हमेशा उपलब्ध रहेगी।


लेकिन वे भूल गए थे कि माँ भी इंसान होती है। उसे भी बात करने का मन करता है, उसे भी इंतज़ार होता है, उसे भी अपनेपन की भूख होती है।


अगले रविवार दोनों भाई-बहन सामुदायिक केंद्र पहुँचे।


निधि माँ के गले लगकर रो पड़ी।


“माँ, हम बहुत गलत थे।”


रोहित बोला, “आप हमेशा हमारे लिए खड़ी रहीं… और जब आपकी बारी आई, हम व्यस्त हो गए।”


विमला देवी ने दोनों के सिर पर हाथ फेर दिया।


“बच्चों, जिंदगी बहुत तेज़ हो गई है। मैं समझती हूँ। लेकिन याद रखना… बूढ़े माँ-बाप को पैसों से ज्यादा समय चाहिए होता है।”


“अब देंगे माँ,” निधि बोली। “पूरा समय देंगे।”


रोहित मुस्कुराया, “और हम भी यहाँ बच्चों को पढ़ाने आया करेंगे।”


विमला देवी की आँखें चमक उठीं।


उस दिन सामुदायिक केंद्र के छोटे से आँगन में बच्चों की हँसी, चाय की खुशबू और रिश्तों की गर्माहट एक साथ घुल गई थी।


कई टूटे हुए रिश्ते उस शाम बिना शोर किए फिर से जुड़ गए।


दोस्तों, कई बार हमारे घरों में मौजूद सबसे अकेला इंसान वही होता है… जो पूरी जिंदगी हमारे लिए सबसे ज्यादा मौजूद रहा। अगर आपके माँ-पापा या घर के कोई बुज़ुर्ग आज भी आपका इंतज़ार करते हैं, तो यकीन मानिए—वे सिर्फ आपका थोड़ा सा समय चाहते हैं। अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो आज ही एक फोन ज़रूर कीजिए… और बस इतना पूछिए—“आप कैसे हैं?”



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