ननद को सबक सिखाने के लिए बहू ने उठाया ऐसा कदम

 

Indian woman packing suitcase emotionally while family discusses relationships inside traditional home


“कभी-कभी इंसान दूसरों की भावनाओं को इतनी हल्के में लेने लगता है… कि उसे एहसास ही नहीं होता कि सामने वाला भी एक दिन वही व्यवहार लौटाना सीख जाएगा…”


पूरे घर में हलचल मची हुई थी।

रसोई में बर्तन चढ़े थे, डाइनिंग टेबल पर मिठाइयों के डिब्बे रखे थे और सीमा तेजी से एक काम खत्म करके दूसरा काम निपटा रही थी।


तभी उसकी सास विमला जी चेहरे पर मुस्कान लिए अंदर आईं और बोलीं,

“बहू सुन… खुशखबरी है। पूजा कल बच्चों के साथ यहां आने वाली है।”


सीमा ने बस हल्का सा सिर हिला दिया और अलमारी खोलकर अपने कपड़े निकालने लगी।


विमला जी ने हैरानी से पूछा,

“अरे ये क्या? तू सामान क्यों निकाल रही है?”


“मैं मायके जा रही हूं मम्मी जी।”

सीमा ने शांत आवाज में कहा।


“क्या मतलब? पूजा आ रही है और तू मायके जा रही है?”


“जी, मम्मी जी।”


“लेकिन क्यों? पूजा इतने दिनों बाद घर आ रही है… और तू ऐसे वक्त पर मायके जा रही है?”


सीमा ने इस बार अलमारी बंद की, उनकी तरफ देखा और शांत आवाज में बोली,

“क्योंकि मम्मी जी… अब मैंने भी थोड़ा अपने बारे में सोचना शुरू कर दिया है।”


“मैं कुछ समझी नहीं बहू।”


सीमा हल्का सा मुस्कुराई,

“अभी नहीं समझेंगी… लेकिन धीरे-धीरे सब समझ आ जाएगा।”


इतना कहकर उसने दोबारा अपना सामान रखना शुरू कर दिया, जबकि विमला जी चुपचाप उसे देखती रह गईं।


उसी समय उसका पति रोहन भी कमरे में आ गया।

कमरे में खुले सूटकेस और फैले कपड़े देखकर वह हैरानी से बोला,


“अरे सीमा, ये सब क्या है? कहीं जाने की तैयारी कर रही हो क्या?”


“हां, मैं दो-चार दिनों के लिए मायके जा रही हूं।”

सीमा ने शांत स्वर में जवाब दिया।


“क्या? लेकिन पूजा दीदी तो कल आने वाली हैं ना!”

रोहन ने चौंकते हुए कहा।


सीमा ने बिना घबराए उसकी तरफ देखा और बोली,

“हां, पता है मुझे… तो आने दीजिए।”


रोहन कुछ समझ नहीं पाया।

उधर विमला जी का चेहरा उतर चुका था।


दरअसल पूजा जब भी मायके आती थी, घर का माहौल पहले जैसा सहज और खुशहाल नहीं रह जाता था।

पूरे घर में एक अजीब सा बोझ और तनाव महसूस होने लगता था।


पूजा खुद तो आराम से बैठी रहती, लेकिन सीमा पूरे दिन उसके बच्चों के पीछे भागती रहती।

कभी चाय, कभी नाश्ता, कभी बच्चों के कपड़े, कभी बाहर से कुछ मंगवाना।


और सबसे बड़ी बात… पूजा को सीमा की कोई परवाह नहीं थी।


अगर सीमा कभी थक जाए तो पूजा तुरंत बोल देती,

“अरे भाभी, इतना भी क्या थकना? घर का ही तो काम है।”


लेकिन जब बात अपने घर की आती तो पूजा किसी को पानी तक पूछना पसंद नहीं करती थी।


एक बार सीमा और रोहन अचानक पूजा के घर गए थे।

रोहन की ऑफिस मीटिंग उसी शहर में थी तो उसने सोचा कि बहन से भी मिल लेंगे।


दरवाजा पूजा ने ही खोला था।

दोनों को देखकर उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।


“अरे… तुम लोग?”


“हां दीदी, सोचा मिलते चलें।”

रोहन ने हंसते हुए कहा।


“अच्छा… पर पहले बता देते तो अच्छा रहता।”


ये सुनकर सीमा को थोड़ा अजीब लगा।


अंदर जाकर देखा तो पूजा आराम से टीवी देख रही थी।

उसने ना पानी पूछा, ना चाय।


थोड़ी देर बाद रोहन ने खुद ही कहा,

“दीदी, एक कप चाय मिल जाए तो मजा आ जाए।”


पूजा तुरंत बोली,

“अरे यार, अभी तो मेड गई है। बहुत थक गई हूं मैं।”


सीमा तुरंत उठ गई।

“कोई बात नहीं दीदी, मैं बना देती हूं।”


उस दिन भी सीमा ने ही रसोई संभाली थी।


घर लौटते वक्त रोहन ने धीरे से कहा,

“यार, दीदी पहले ऐसी नहीं थी।”


सीमा बस चुप रही।


उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की।

ना सास से, ना पति से।


लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा था कि लोग उसकी अच्छाई को मजबूरी समझने लगे हैं।


कुछ दिनों बाद पूजा फिर मायके आई थी।


उस दिन सीमा की तबीयत ठीक नहीं थी।

हल्का बुखार था, शरीर टूट रहा था।


फिर भी वह रसोई में लगी हुई थी।


तभी पूजा अंदर आई और बोली,

“भाभी, बच्चों के लिए पास्ता बना दो ना।”


सीमा ने धीरे से कहा,

“दीदी, आज थोड़ा बुखार है।”


पूजा तुरंत बोली,

“ओहो… इतनी सी तबीयत खराब होने पर कोई काम छोड़ देता है क्या?”


विमला जी वहीं खड़ी थीं, लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं कहा।


सीमा ने उस दिन भी सब किया।

लेकिन उसी रात उसने फैसला कर लिया था कि अब वह खुद को इतना हल्के में नहीं लेने देगी।


और आज जब पूजा के आने की खबर मिली… तो उसने अपना सामान बांध लिया।


अगले दिन पूजा बच्चों के साथ घर पहुंची।


अंदर आते ही बोली,

“मम्मी… भाभी कहां हैं?”


विमला जी ने धीमी आवाज में कहा,


“वो अपने मायके चली गई है बेटा।”


पूजा हैरानी से बोली,

“क्या? भाभी को पता था कि मैं आने वाली हूं?”


“हां, पता था।”


“फिर भी वो चली गई?”


इस बार विमला जी ने गंभीर नजरों से उसकी तरफ देखा और बोलीं,

“हां… क्योंकि अब उसने भी वही व्यवहार करना सीख लिया है, जो लोग उसके साथ करते आए हैं।”


विमला जी की बात सुनते ही पूजा एकदम चुप हो गई।


विमला जी ने पहली बार बेटी को समझाते हुए कहा,

“बेटा, रिश्ते सिर्फ लेने से नहीं चलते। कभी-कभी सामने वाले की थकान और भावनाएं भी समझनी पड़ती हैं।”


पूजा अब तक सब समझ चुकी थी।


उसे याद आने लगा कि कितनी बार उसने सीमा को नजरअंदाज किया था।

कितनी बार उसके काम को मामूली समझा था।

कितनी बार उसे सिर्फ सुविधा की तरह इस्तेमाल किया था।


उस रात पूजा बहुत देर तक सो नहीं पाई।


तीन दिन बाद जब सीमा वापस आई तो पूजा खुद रसोई में खड़ी थी।


सीमा हैरानी से बोली,

“अरे दीदी… आप?”


पूजा ने धीरे से सीमा का हाथ थाम लिया और भर्राई आवाज़ में बोली,


“भाभी… अब से मैं इस घर में मेहमान बनकर नहीं, आपकी अपनी बनकर आया करूंगी। सिर्फ आराम करने नहीं… बल्कि आपका हाथ बंटाने और आपका साथ देने भी।”


सीमा कुछ नहीं बोली।


पूजा ने उसका हाथ पकड़ लिया,

“अब से जब भी मैं यहां आऊंगी… मेहमान बनकर नहीं, तुम्हारी मदद करने आऊंगी।”


इस बार सीमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।


क्योंकि कई बार रिश्ते लड़ाई से नहीं… बस एक एहसास से सुधर जाते हैं।



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