जब बूढ़ी माँ ने सहना बंद किया, तब बेटे-बहु की दुनिया हिल गई

 

Elderly Indian woman sitting alone on a bed holding dry bread in a dimly lit room while a messy kitchen appears in the background


“कई बार इंसान अपने ही घर में इतना अकेला पड़ जाता है… कि उसे अपने दर्द से ज्यादा दूसरों की बेरुखी चुभने लगती है…”


पूरे घर में तरह-तरह की खुशबुएँ फैली हुई थीं।

रसोई में गैस पर पनीर की सब्ज़ी चढ़ी थी, ओवन में केक बेक हो रहा था और डाइनिंग टेबल पर रंग-बिरंगे बर्तनों की कतार लगी हुई थी।


लेकिन उसी घर के एक छोटे से कमरे में बैठी कमला देवी के हिस्से में सिर्फ सन्नाटा आया था।


कमला देवी चुपचाप अपने पुराने स्वेटर में हाथ छुपाए बैठी थीं। उम्र सत्तर के पार हो चुकी थी। घुटनों का दर्द अब बढ़ने लगा था और आँखों से भी धुंधला दिखाई देता था। मगर घर में उनकी हालत किसी नौकरानी से कम नहीं थी।


उनकी बहु प्रिया को खाना बनाने का बहुत शौक था।

हर दिन मोबाइल पर नई-नई रेसिपी देखती और फिर घंटों रसोई में लगी रहती। उसके पति विकास और दोनों बच्चों के लिए तरह-तरह के पकवान बनते। कभी पिज़्ज़ा, कभी पास्ता, कभी मिठाइयाँ।


लेकिन कमला देवी के लिए हमेशा वही बची-खुची सूखी रोटियाँ रख दी जातीं।


सबसे बड़ी परेशानी थी बर्तनों की।


प्रिया खाना बनाने के बाद पूरी रसोई फैला देती। सिंक में बर्तनों का पहाड़ जमा हो जाता और फिर आवाज लगाती—


“माँ जी… जरा जल्दी से बर्तन साफ कर दीजिए।”


कमला देवी काँपते हाथों से सारे बर्तन धोती रहतीं।


उस दिन ठंड बहुत ज्यादा थी।

बर्फ जैसी ठंडी पानी में बर्तन धोते-धोते उनके हाथ सुन्न पड़ गए थे। जैसे-तैसे काम खत्म करके वो अपने कमरे में गईं और बिस्तर पर बैठ गईं।


उनकी उंगलियाँ दर्द से काँप रही थीं।


तभी बाहर से प्रिया की आवाज आई—


“माँ जी… कल बच्चों का स्कूल प्रोजेक्ट है, इसलिए सुबह जल्दी उठकर कपड़े भी धो दीजिएगा।”


कमला देवी ने धीमी आवाज में कहा—


“बहु… अब हाथों में ताकत नहीं रही। अगर मशीन में कपड़े धो देती तो…”


इतना सुनते ही प्रिया भड़क गई।


“हर काम मशीन करेगी तो आप क्या करेंगी? दिन भर कमरे में बैठी रहती हैं।”


कमला देवी चुप हो गईं।


उन्हें समझ आ चुका था कि अब इस घर में उनकी कोई इज्जत नहीं बची।


रात को सब लोग गरम-गरम खाना खा रहे थे।

डाइनिंग टेबल पर हँसी-मजाक चल रहा था। मगर कमला देवी के कमरे तक कोई नहीं आया।


कुछ देर बाद प्रिया उनके कमरे में आई और प्लेट उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोली—


“लो… बचा हुआ खा लो।”


प्लेट में दो सूखी रोटियाँ और थोड़ा सा ठंडा आलू पड़ा था।


कमला देवी ने बिना कुछ कहे प्लेट ले ली।


भूख इतनी लगी थी कि आँखों में आँसू आ गए।


उन्होंने रोटी को पानी में भिगोकर नरम किया और धीरे-धीरे खाने लगीं।


रोटी खाते-खाते उन्हें अपने पति श्यामलाल जी याद आ गए।


कैसे वो हमेशा कहते थे—


“कमला… जब तक मैं हूँ, तुम्हें कभी दुख नहीं होने दूँगा।”


लेकिन उनके जाने के बाद सब कुछ बदल गया था।


जिस बेटे को उन्होंने अपना पेट काटकर पढ़ाया था, वही बेटा अब माँ की तरफ ठीक से देखता तक नहीं था।


विकास पूरे दिन पत्नी के इशारों पर चलता रहता।

उसे कभी ये महसूस ही नहीं हुआ कि उसकी माँ अंदर ही अंदर टूट चुकी है।


एक दिन कमला देवी तेज बुखार में थीं।


फिर भी उन्होंने पूरे घर का काम किया।


झाड़ू लगाया, पोछा किया, बर्तन धोए और कपड़े भी साफ किए।


काम खत्म होते-होते उन्हें चक्कर आने लगे।


वो जैसे ही दीवार पकड़कर बैठीं, तभी प्रिया गुस्से में बोली—


“नाटक मत कीजिए माँ जी। काम नहीं करना हो तो साफ बोल दीजिए।”


कमला देवी की आँखें भर आईं।


उन्होंने पहली बार महसूस किया कि अब इस घर में रहना उनके आत्मसम्मान को खत्म कर देगा।


रात को वो देर तक जागती रहीं।


फिर धीरे से उठीं और अलमारी खोली।


उसमें कुछ पुराने कपड़े थे, पति की तस्वीर थी और कुछ जमीन के कागज़।


उन्होंने सब एक बैग में रख लिया।


अगले दिन वो बिना कुछ कहे घर से निकल गईं।


विकास और प्रिया ने उन्हें जाते देखा जरूर… मगर रोकने की कोशिश तक नहीं की।


दोनों मन ही मन सोच रहे थे—


“दो दिन में वापस आ जाएँगी।”


कमला देवी अपने छोटे भाई सुरेश के घर पहुँचीं।


सुरेश जी अपनी बहन को अचानक देखकर घबरा गए।


“दीदी… सब ठीक तो है?”


कमला देवी ने मुस्कुराने की कोशिश की।


“हाँ… बस थोड़ा मन बदलने आई हूँ।”


लेकिन भाई बहन का दर्द समझ गया था।


कुछ दिन तक उसने ज्यादा सवाल नहीं किए।


फिर एक रात जब कमला देवी रोने लगीं तो सुरेश जी ने प्यार से पूछा—


“सच बताओ दीदी… बात क्या है?”


बस फिर क्या था…


कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।


उन्होंने अपने साथ हुई हर बात बता दी।


कैसे उन्हें बासी रोटियाँ दी जाती थीं… कैसे उनसे नौकरों की तरह काम करवाया जाता था… कैसे बेटा सब देखकर भी चुप रहता था।


सुरेश जी की आँखों में गुस्सा भर आया।


उन्होंने तुरंत कहा—


“अब तुम उस घर में वापस नहीं जाओगी।”


कमला देवी डरते हुए बोलीं—


“लेकिन वो घर… जमीन…”


सुरेश जी हल्का सा मुस्कुराए।


“दीदी… कानून अभी जिंदा है।”


कुछ ही दिनों में उन्होंने सारे कागज़ निकलवाए।


पता चला कि घर और जमीन सब कमला देवी के नाम था।


सुरेश जी ने उनकी मर्जी से घर बेच दिया।


उस पैसों से उन्होंने अपनी बहन के लिए छोटा सा सुंदर घर खरीद दिया।


बाकी पैसे बैंक में जमा करवा दिए।


कुछ दिनों बाद विकास के घर कोर्ट का नोटिस पहुँचा।


नोटिस पढ़ते ही उसके हाथ काँपने लगे।


प्रिया के चेहरे का रंग उड़ गया।


दोनों भागते हुए कमला देवी के पास पहुँचे।


विकास माँ के पैरों में गिर पड़ा।


“माँ… हमें माफ कर दो। हमसे गलती हो गई।”


प्रिया भी रोने का नाटक करते हुए बोली—


“माँ जी… अब मैं आपकी सेवा करूँगी।”


कमला देवी शांत खड़ी रहीं।


फिर उन्होंने धीरे से कहा—


“जिस दिन मैं भूखी थी… उस दिन तुम्हें मेरी तकलीफ नहीं दिखाई दी।”


दोनों सिर झुकाए खड़े रहे।


कमला देवी की आवाज भर्रा गई—


“तुम लोगों ने मुझे माँ नहीं… नौकरानी समझा। मैंने सब सहा क्योंकि मुझे अपना परिवार टूटता हुआ नहीं देखना था। लेकिन तुम लोगों ने मेरे आत्मसम्मान को ही तोड़ दिया।”


विकास रोते हुए बोला—


“माँ… एक मौका और दे दो।”


कमला देवी ने दृढ़ आवाज में कहा—


“जिस रिश्ते में सम्मान खत्म हो जाए… वहाँ साथ रहने का कोई मतलब नहीं बचता।”


इतना कहकर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया।


बाहर बेटा और बहु खड़े रह गए।


और अंदर…

कई सालों बाद कमला देवी ने पहली बार चैन की साँस ली।



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