पत्नी सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, इंसान भी होती है

 

Tired Indian housewife sitting on the kitchen floor while her caring husband supports her in an emotional family moment inside a warm home kitchen.


“कई बार घर की औरत सबसे ज्यादा थक जाती है… लेकिन उसकी थकान किसी को दिखाई नहीं देती। सबको उसका बनाया खाना, साफ घर और मुस्कुराता चेहरा चाहिए होता है… पर उसके दर्द को सुनने वाला शायद ही कोई होता है…”


सुबह के छह बजे थे।


रसोई में गैस पर चाय चढ़ी हुई थी। सिंक में रात के बर्तन पड़े थे। आँगन में सूखने डाले कपड़े हवा में हिल रहे थे और कमरे में बच्चों के स्कूल बैग खुले पड़े थे।


पूजा की आंखें रात से ही भारी थीं। शरीर टूट रहा था। हल्का बुखार भी था, लेकिन उसने हमेशा की तरह खुद को समझा लिया था।


“थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा… पहले घर का काम निपटा लूँ…”


वह धीरे-धीरे रसोई में काम करने लगी।


इतने में पति राकेश कमरे से बाहर आया।


“चाय बनी कि नहीं अभी तक?”


पूजा ने जल्दी से कप में चाय डालते हुए कहा, “बस अभी लाई…”


राकेश ने कप उठाया और बोला, “आज फिर बच्चों की यूनिफॉर्म प्रेस नहीं हुई? तुम्हें एक काम ठीक से नहीं होता क्या?”


पूजा चुप रही।


वह जानती थी, जवाब देने से बात और बढ़ेगी।


उधर बच्चे भी उठ चुके थे।


“मम्मी मेरा टिफिन?”


“मम्मी मेरी कॉपी कहाँ है?”


वह एक हाथ से पराठे सेंक रही थी और दूसरे हाथ से बच्चों का सामान ढूंढ रही थी।


बार-बार चक्कर जैसा महसूस हो रहा था।


लेकिन घर में उसकी तबीयत देखने वाला कोई नहीं था।


थोड़ी देर बाद राकेश फिर बोला, “और सुनो… आज मेरे कुछ दोस्त घर आने वाले हैं। शाम को कुछ अच्छा बना लेना।”


पूजा ने धीमी आवाज में कहा, “आज मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही…”


राकेश तुरंत बोल पड़ा, “तुम्हारी तबीयत तो हर दूसरे दिन खराब रहती है।”


इतना सुनते ही पूजा चुप हो गयी।


उसे समझ आ गया था कि आज भी कोई उसकी हालत समझने वाला नहीं।


पूरा दिन वह काम करती रही।


कभी रसोई… कभी कपड़े… कभी बच्चों का होमवर्क…


दोपहर तक उसका बुखार तेज हो चुका था।


वह चाहती थी कि थोड़ी देर लेट जाये… लेकिन तभी सास की आवाज आ गयी।


“बहू, जरा मेरे लिए भी चाय बना देना।”


वह फिर उठ खड़ी हुई।


शाम तक उसके हाथ काँपने लगे थे।


राकेश अपने दोस्तों के साथ घर आया। सब हँस-बोल रहे थे।


रसोई में पूजा अकेली खड़ी खाना बना रही थी।


गर्म तवे के सामने उसका सिर और घूमने लगा।


एक पल को उसे लगा कि वह गिर जायेगी।


लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।


मेहमानों के सामने वह हमेशा की तरह मुस्कुराती रही।


रात करीब दस बजे सब चले गये।


घर बिखरा पड़ा था।


बर्तन साफ करने बाकी थे।


राकेश सोफे पर बैठते हुए बोला, “यार बहुत थक गया आज…”


यह सुनकर पूजा के होंठों पर हल्की कड़वी मुस्कान आ गयी।


वह सोचने लगी…


“सिर्फ बाहर काम करने वाला ही थकता है क्या?”


लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


वह चुपचाप बर्तन धोने लगी।


अचानक उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया।


उसके हाथ से प्लेट छूटकर नीचे गिर गयी।


आवाज सुनकर राकेश दौड़कर आया।


उसने देखा, पूजा जमीन पर गिरी हुई थी।


उसका शरीर बुखार से तप रहा था।


राकेश घबरा गया।


“पूजा… पूजा आंखें खोलो…”


लेकिन पूजा ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।


बच्चे भी डरकर पास आ गये।


राकेश पहली बार समझ पा रहा था कि जो औरत सुबह से रात तक पूरे घर को संभालती है… वह भी इंसान है।


उसकी भी एक सीमा है।


वह जल्दी से उसे उठाकर कमरे में ले गया।


माथे पर ठंडी पट्टी रखी।


दवा दी।


उसकी आंखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।


कुछ देर बाद पूजा ने धीमी आवाज में कहा, “रसोई के बर्तन अभी बाकी हैं…”


राकेश की आंखें भर आयीं।


उसने पहली बार उसकी बात बीच में रोकते हुए कहा, “अब कुछ नहीं करना तुम्हें… बिल्कुल नहीं…”


पूजा उसे देखने लगी।


शायद वर्षों बाद उसने पति की आवाज में अपने लिए चिंता महसूस की थी।


राकेश धीरे से बोला, “मुझे माफ कर दो… मैंने कभी समझा ही नहीं कि तुम कितना काम करती हो…”


पूजा की आंखों से आँसू निकल पड़े।


वह बोली, “मैंने कभी शिकायत नहीं की… बस कभी-कभी लगता था… कोई एक बार पूछ ले कि तुम ठीक हो या नहीं…”


राकेश का सिर झुक गया।


उस रात पहली बार रसोई के बर्तन राकेश ने धोये।


बच्चों के कपड़े भी उसने ही समेटे।


और पूजा चुपचाप लेटी उसे देखती रही।


उसके चेहरे पर दर्द जरूर था… लेकिन दिल को एक सुकून मिला था।


उसे लगा…


शायद आज इतने सालों बाद किसी ने उसकी थकान को सच में महसूस किया है।


अगली सुबह जब पूजा की आंख खुली, तो रसोई साफ थी।


टेबल पर चाय रखी थी।


और पास में एक पर्ची रखी थी—


“आज तुम आराम करो… घर सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है…”



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