मेरे पति का कातिल मेरे ही घर में था
“जिस इंसान के लिए मैंने अपना सब कुछ छोड़ दिया था… उसी के घरवालों ने एक दिन मुझे ऐसी सजा देने की कोशिश की, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस लड़की को वो बेसहारा समझ रहे हैं, उसकी खामोशी के पीछे एक ऐसा तूफान छुपा है जो एक दिन सबकुछ बदल देगा…”
पूरे घर में अगरबत्ती की गंध फैली हुई थी।
दीवार पर टंगी आदित्य की तस्वीर पर ताज़ा फूलों की माला चढ़ी थी। ड्रॉइंग रूम में बैठे रिश्तेदार धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे। कोई मुझे देखकर सहानुभूति जताता, तो कोई फुसफुसाकर कहता—“बेचारी की तो उम्र ही क्या थी…”
लेकिन उस घर में सबसे ज्यादा डर अगर किसी को था, तो वो मैं थी।
मैं, निशा…
सिर्फ 25 साल की उम्र में विधवा हो चुकी थी।
मेरे पति आदित्य की मौत को अभी दस दिन ही हुए थे। सबने कहा था कि उनकी कार खाई में गिर गई थी। पुलिस ने इसे हादसा बताया और मामला बंद हो गया।
लेकिन ना जाने क्यों, मेरे दिल को हमेशा लगता था कि इस कहानी में कुछ अधूरा है।
आदित्य कभी इतने लापरवाह नहीं हो सकते थे।
वो हमेशा सीट बेल्ट लगाते थे। शराब को हाथ तक नहीं लगाते थे। फिर अचानक उनकी गाड़ी का कंट्रोल कैसे बिगड़ गया?
मैं इन्हीं सवालों में उलझी थी कि तभी मेरी सास कमरे में आईं।
उनकी आँखों में आँसू नहीं थे।
बस एक अजीब सी कठोरता थी।
“निशा, नीचे चल,” उन्होंने सख्त आवाज़ में कहा।
मैं धीरे-धीरे उनके पीछे चल दी।
जैसे ही मैं नीचे पहुँची, मेरी सांस अटक गई।
पूरा आंगन सजाया गया था।
बीच में एक चौकी रखी थी। उस पर लाल जोड़ा, चूड़ियाँ और सिंदूर रखा था।
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
“ये सब क्या है?” मैंने डरते हुए पूछा।
मेरे जेठ, महेश, कुर्सी पर बैठे मुस्कुरा रहे थे।
उनकी उम्र लगभग 42 साल थी। दो बच्चे थे। उनकी पत्नी की मौत कई साल पहले हो चुकी थी।
सास ने सबके सामने कहा—
“आज से तू इस घर की बहू नहीं… महेश की पत्नी बनेगी।”
मेरे कान सुन्न पड़ गए।
“क्या…?” मेरे मुँह से बस इतना ही निकला।
“समाज में इज्जत से रहना है तो यही करना होगा,” सास बोलीं। “एक जवान विधवा को घर में खुला नहीं छोड़ सकते।”
मेरे भीतर गुस्से की आग भड़क उठी।
“मैं कोई सामान नहीं हूँ जिसे एक भाई के बाद दूसरे को दे दिया जाए!” मैंने चीखकर कहा।
पूरा आंगन सन्न हो गया।
महेश कुर्सी से उठा और मेरे पास आकर बोला—
“ज्यादा ऊँची आवाज़ में मत बोलो निशा। तुम्हारा भला इसी में है कि चुपचाप हमारी बात मान लो।”
उसकी आँखों में ऐसी गंदी भूख थी कि मेरा पूरा शरीर काँप गया।
मैं पीछे हट गई।
“मुझे ये शादी नहीं करनी!”
सास जोर से चिल्लाईं—
“तो कहाँ जाएगी तू? तेरे माँ-बाप गरीब हैं। समाज तुझे जीने नहीं देगा। यहाँ कम से कम छत और खाना तो मिलेगा!”
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
जिस घर को मैंने अपना माना… वही लोग मुझे बोझ समझने लगे थे।
पूरा दिन मुझे कमरे में बंद रखा गया।
फोन छीन लिया गया।
खिड़की तक बंद कर दी गई।
नीचे आंगन में शादी जैसी तैयारियाँ चल रही थीं। औरतें गाने गा रही थीं। कोई मेरे लिए चूड़ियाँ सजा रहा था, तो कोई लाल साड़ी तह कर रहा था।
लेकिन मेरे भीतर सिर्फ डर था।
रात होने लगी।
अचानक खिड़की पर हल्की दस्तक हुई।
मैं घबराकर पीछे हट गई।
“निशा… दरवाज़ा मत खोलना, मैं हूँ…”
आवाज़ पहचानते ही मैं चौंक गई।
वो अर्जुन था।
आदित्य का सबसे करीबी दोस्त।
मैं जल्दी से खिड़की के पास गई।
“अर्जुन? तुम यहाँ कैसे?”
उसने धीरे से कहा—
“मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है। आदित्य की मौत हादसा नहीं थी।”
मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।
“क्या मतलब?”
अर्जुन ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज़ में बोला—
“आदित्य ने मरने से पहले मुझे एक पेन ड्राइव दी थी। उसमें कुछ रिकॉर्डिंग्स हैं।”
“कैसी रिकॉर्डिंग्स?”
“तुम्हारे जेठ और सास की।”
मेरी सांसें तेज हो गईं।
अर्जुन बोला—
“आदित्य को पता चल गया था कि महेश ने बिजनेस के नाम पर बहुत बड़ा कर्जा लिया है। वो लोग आदित्य के नाम की बीमा पॉलिसी के पैसे चाहते थे।”
मेरे हाथ बुरी तरह काँपने लगे। दिल की धड़कन इतनी तेज हो गई जैसे सीने से बाहर निकल आएगी।
“नहीं… ये झूठ है… ऐसा नहीं हो सकता…” मेरी आवाज़ टूटने लगी।
अर्जुन ने भारी आँखों से मेरी तरफ देखा।
“काश मैं झूठ बोल रहा होता, निशा… लेकिन सच इससे भी ज्यादा डरावना है।”
अर्जुन ने जेब से पेन ड्राइव निकाली।
“इसमें सबूत है कि महेश ने आदित्य की कार के ब्रेक खराब करवाए थे।”
मेरे पैरों से जैसे ताकत खत्म हो गई।
मैं जमीन पर बैठ गई।
मेरे पति की हत्या…
और वो भी उनके अपने भाई ने?
मैं फूट-फूटकर रोने लगी।
अर्जुन की आँखें भी भर आईं।
“आदित्य ने मरने से पहले मुझसे कहा था—अगर उसे कुछ हो जाए तो मैं तुम्हें बचाऊँ।”
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा—
“अब क्या होगा?”
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“तुम्हें यहाँ से निकालना होगा।”
उसी समय नीचे से सास की आवाज़ आई—
“निशा! तैयार हो जा! पंडित आ चुका है!”
मेरे हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए।
अर्जुन ने मेरी डरी हुई आँखों में देखते हुए धीमी लेकिन भरोसे भरी आवाज़ में कहा—
“डरो मत निशा… जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम्हारे साथ कुछ गलत नहीं होने दूँगा।”
इतना कहकर उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई, फिर चुपचाप खिड़की से पीछे हट गया। कुछ ही पलों में उसका साया अंधेरे में कहीं गायब हो चुका था, लेकिन उसकी बातों ने मेरे कांपते दिल को पहली बार थोड़ा सहारा दे दिया था।
कुछ देर बाद दो औरतें कमरे में आईं।
उन्होंने जबरदस्ती मुझे लाल साड़ी पहनानी शुरू कर दी।
मैं रोती रही, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ा।
नीचे आंगन में कुर्सियाँ लग चुकी थीं।
गाँव के लोग तमाशा देखने आए थे।
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई इंसान नहीं… एक वस्तु हूँ।
जब मुझे नीचे लाया गया, तो महेश पहले से मंडप में बैठा था।
उसकी आँखों में जीत का घमंड था।
पंडित मंत्र पढ़ने लगा।
सास ने मेरा हाथ पकड़कर जबरदस्ती महेश के पास बैठाने की कोशिश की।
तभी अचानक बाहर जोरदार आवाज़ आई—
“ये शादी नहीं होगी!”
सबने मुड़कर देखा।
दरवाजे पर अर्जुन खड़ा था।
उसके साथ पुलिस थी।
पूरा आंगन हिल गया।
महेश गुस्से से चिल्लाया—
“तू पागल हो गया है क्या?”
अर्जुन आगे बढ़ा।
उसने सबके सामने टीवी ऑन किया।
फिर पेन ड्राइव लगाई।
अगले ही पल स्क्रीन पर वीडियो चलने लगा।
वीडियो में महेश एक मैकेनिक को पैसे दे रहा था।
“बस इतना करना है कि ब्रेक रास्ते में फेल हो जाए…”
मेरी सास की आवाज़ भी रिकॉर्ड थी—
“आदित्य मर जाएगा तो बीमा के पैसे मिल जाएंगे…”
पूरा आंगन सन्न रह गया।
लोग फुसफुसाने लगे।
महेश के चेहरे का रंग उड़ गया।
“ये झूठ है!” वो चिल्लाया।
लेकिन तभी पुलिस इंस्पेक्टर आगे आया।
“हमारे पास बैंक ट्रांजैक्शन और कॉल रिकॉर्ड भी हैं।”
महेश भागने लगा।
लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
मेरी सास मेरे पैरों में गिर गईं।
“निशा, हमें माफ कर दे…”
मैंने आँसू भरी आँखों से उनकी तरफ देखा।
“जिस दिन आपने अपने बेटे को मरवाया था… उसी दिन आप माँ कहलाने का हक खो चुकी थीं।”
पूरा गाँव खामोश था।
जो लोग मुझे मजबूर कर रहे थे… वही लोग अब शर्म से सिर झुकाए खड़े थे।
पुलिस महेश और सास को लेकर चली गई।
आंगन खाली हो गया।
मैं वहीं जमीन पर बैठ गई।
मेरे भीतर दर्द, गुस्सा और राहत सबकुछ एक साथ उमड़ रहा था।
तभी अर्जुन मेरे पास आया।
“अब तुम सुरक्षित हो,” उसने धीरे से कहा।
मैंने उसकी तरफ देखा।
“तुमने मेरे लिए इतना सब क्यों किया?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया—
“क्योंकि आदित्य मेरा दोस्त ही नहीं… भाई था। और उसने आखिरी बार सिर्फ तुम्हारा नाम लिया था।”
मेरी आँखें भर आईं।
अर्जुन ने जेब से एक चाबी निकाली।
“ये शहर में तुम्हारे नाम का फ्लैट है। आदित्य ने कुछ महीने पहले खरीदा था।”
मैं हैरान रह गई।
“क्या?”
“वो तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था। वो चाहता था कि तुम आगे पढ़ो… अपना बुटीक खोलो।”
मैं फूटकर रो पड़ी।
मरने से पहले भी आदित्य मेरे सपनों के बारे में सोच रहे थे।
कुछ महीने बाद…
मैं शहर में अपने छोटे से बुटीक के बाहर खड़ी थी।
दुकान के बोर्ड पर लिखा था—
“निशा डिजाइन स्टूडियो।”
भीतर लड़कियाँ काम कर रही थीं। मशीनों की आवाज़ गूंज रही थी।
और पहली बार मुझे लगा…
मैं टूटी नहीं हूँ।
मैं बच गई हूँ।
तभी पीछे से अर्जुन की आवाज़ आई—
“मैडम, आपकी पहली बड़ी ऑर्डर पार्टी आ गई।”
मैं मुस्कुरा पड़ी।
शायद जिंदगी ने मुझे दूसरा मौका दिया था।
और इस बार…
मैं खुद अपनी कहानी लिखने वाली थी।
निष्कर्ष:
दुनिया में सबसे खतरनाक वो लोग होते हैं जो रिश्तों के पीछे लालच छुपाकर रखते हैं। लेकिन हर अंधेरे में कोई ना कोई ऐसा इंसान जरूर होता है जो आपका हाथ पकड़कर आपको फिर से जीना सिखा दे। कभी खुद को कमजोर मत समझिए, क्योंकि टूटने के बाद ही इंसान अपनी असली ताकत पहचानता है।

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