जब शक ने रिश्ते की साँसें रोक दीं

 

Emotional Indian couple reconciling after relationship misunderstanding in a modern apartment with shattered glass on the floor


डाइनिंग टेबल पर रखा पानी का गिलास मेरी उंगलियों से टकराकर गिर गया। काँच टूटने की आवाज़ पूरे घर में गूँज गई, लेकिन उससे भी ज़्यादा तेज़ आवाज़ मेरे अंदर चल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरे सीने में पत्थर रख दिया हो।


मैं फर्श पर गिरे काँच के टुकड़ों को देखती रही। तभी पीछे से राघव की आवाज़ आई—


“सावधान, हाथ कट जाएगा।”


उसने झुककर काँच उठाना शुरू किया, लेकिन मैंने उसका हाथ रोक दिया।


“छोड़िए… मैं कर लूँगी।”


उसने मेरी तरफ़ देखा। शायद उसे मेरी आवाज़ की ठंडक महसूस हुई थी। पर उसने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप पीछे हट गया।


मैंने टूटे हुए काँच समेटे, डस्टबिन में फेंके और सीधे अपने कमरे में आ गई। दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गई।


अब मुझसे और नहीं हो रहा था।


पिछले छह महीनों से मैं खुद को समझा रही थी कि सब ठीक है… सब सामान्य है… लेकिन सच्चाई ये थी कि मेरे अपने ही घर में मैं धीरे-धीरे अकेली पड़ती जा रही थी।


और इसकी वजह थी—रिया।


रिया, राघव की कॉलेज फ्रेंड।


जिसका नाम मैंने शादी के चार साल में कभी नहीं सुना था।


और अब वही लड़की हर दूसरे दिन हमारे घर में दिखाई देने लगी थी।


पहले मुझे लगा था कि बस कोई पुरानी दोस्त होगी। लेकिन धीरे-धीरे उसकी मौजूदगी मेरे और राघव के बीच दीवार बनती चली गई।


मुझे आज भी वो दिन याद है जब पहली बार राघव उसे घर लाया था।


मैं किचन में रोटियाँ बना रही थी। दरवाज़ा खुला और राघव की हँसती हुई आवाज़ आई—


“नेहा, ज़रा देखो कौन आया है!”


मैं बाहर आई तो उसके साथ खड़ी लड़की को देखकर हल्का-सा चौंक गई।


लंबे खुले बाल, चेहरे पर आत्मविश्वास, हाथ में महँगा बैग और आँखों में अजीब-सी चमक।


“हाय,” उसने मुस्कुराकर कहा, “मैं रिया हूँ… राघव की कॉलेज फ्रेंड।”


मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की, “आइए।”


उस दिन सब सामान्य लगा। हमने साथ खाना खाया, पुरानी कॉलेज की बातें सुनीं, फोटो देखे। राघव बहुत खुश दिख रहा था।


इतना खुश… जितना वो पिछले कई महीनों से मेरे साथ नहीं दिखा था।


रिया के जाने के बाद मैंने हल्के अंदाज़ में पूछा—


“अच्छा, ये वही रिया है जिसके साथ तुम्हारी इतनी तस्वीरें थीं कॉलेज वाली?”


राघव हँस पड़ा, “हाँ, वही पागल लड़की।”


“काफ़ी क्लोज़ थे तुम दोनों?”


“अरे यार, पूरा ग्रुप था हमारा। तुम भी ना…”


उसने बात हँसी में उड़ा दी।


लेकिन मेरे मन में एक छोटा-सा काँटा चुभ गया।


फिर धीरे-धीरे रिया का आना बढ़ने लगा।


कभी कॉफी के लिए, कभी किसी प्रोजेक्ट के बहाने, कभी यूँ ही।


और हर बार राघव का चेहरा खिल जाता।


मैं कई बार उनके बीच बैठती, लेकिन उनकी बातें समझ ही नहीं पाती। कॉलेज के किस्से, पुराने दोस्त, अंदर की बातें… मैं वहाँ होते हुए भी बाहर जैसी महसूस करती।


एक दिन मैंने देखा कि राघव फोन पर मुस्कुरा रहा है।


मैंने पूछा, “किससे बात हो रही है?”


“रिया है,” उसने सहजता से कहा।


“इतनी रात को?”


“अरे उसका मूड खराब था।”


बस इतना।


लेकिन उस रात मेरी नींद उड़ गई।


मैं खुद को समझाती रही—दोस्ती है… सिर्फ़ दोस्ती…


पर दिल मानने को तैयार नहीं था।


धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि राघव मुझसे दूर होता जा रहा है।


पहले वो ऑफिस से आते ही मुझे ढूँढता था।


“नेहा, चाय पिलाओगी?”


“आज क्या बनाया है?”


“चलो कहीं घूमकर आते हैं।”


अब वो आते ही फोन उठाता और बालकनी में चला जाता।


कई बार मैं पास जाती तो बात अचानक बदल जाती।


एक दिन तो मैंने साफ सुन लिया—


“रिया, तुम बेवजह टेंशन ले रही हो… मैं हूँ ना।”


मेरे कदम वहीं रुक गए।


मैंने खुद से पूछा—


“और मैं? मैं कौन हूँ?”


उस रात मैं देर तक जागती रही।


राघव मेरे बगल में सो रहा था, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे हमारे बीच मीलों की दूरी हो।


धीरे-धीरे मैं चिड़चिड़ी होने लगी।


उसकी हर बात पर शक होने लगा।


रिया का नाम सुनते ही भीतर आग जलने लगती।


लेकिन सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की थी कि मैं उससे खुलकर लड़ भी नहीं पा रही थी।


क्योंकि राघव कभी ऐसा आदमी नहीं रहा था जिस पर आसानी से उंगली उठाई जा सके।


उसने हमेशा मेरा सम्मान किया था।


हमारी शादी लव मैरिज नहीं थी, लेकिन शादी के बाद उसने मुझे कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि मैं उसकी पसंद नहीं थी।


उल्टा वही था जिसने मुझे नौकरी करने के लिए प्रेरित किया, मेरे डर खत्म किए, मेरी हर छोटी बात याद रखी।


जब मेरी पहली सैलरी आई थी, तो मुझसे ज्यादा खुश वही था।


जब मैं बीमार पड़ी थी, तो उसने तीन रातें जागकर काटी थीं।


फिर अब ऐसा क्या बदल गया था?


या शायद…


किसी पुराने रिश्ते की चमक फिर लौट आई थी?


इसी उधेड़बुन में एक दिन मैंने उसका फोन देख लिया।


मैं ऐसा कभी नहीं करना चाहती थी।


लेकिन उस दिन खुद को रोक नहीं पाई।


व्हाट्सऐप खोला।


रिया का चैट सबसे ऊपर था।


दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि हाथ काँपने लगे।


मैंने चैट खोली।


लेकिन अगले ही पल मैं रुक गई।


क्योंकि वहाँ वैसी बातें नहीं थीं जैसी मैं सोच रही थी।


ज़्यादातर मैसेज रिया के थे।


“तुम बदल गए हो।”


“तुम पहले जैसे नहीं रहे।”


“काश मैंने उस समय तुम्हें छोड़ा ना होता…”


और राघव के जवाब छोटे-छोटे थे।


“पुरानी बातें मत करो।”


“रिया, अब मेरी शादी हो चुकी है।”


“नेहा को लेकर मैं सीरियस हूँ।”


मेरी साँस अटक गई।


आगे पढ़ा—


“तुम्हें लगता है मैं खुश हूँ?” रिया ने लिखा था।


“हाँ,” राघव का जवाब था, “क्योंकि मेरी पत्नी मुझे घर जैसा सुकून देती है।”


मेरी आँखों में आँसू आ गए।


लेकिन उसी पल अंदर एक और सवाल उठा—


अगर ऐसा है… तो फिर वो मुझसे दूर क्यों हो गया?


उसी शाम रिया हमारे घर आई।


मैंने पहली बार उसे ध्यान से देखा।


उसकी मुस्कान बनावटी लग रही थी।


आँखों के नीचे काले घेरे थे।


और वो बार-बार राघव को ऐसे देख रही थी जैसे कुछ खो देने का डर हो।


रात को जब वो चली गई, मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया—


“क्या तुम उससे कभी प्यार करते थे?”


राघव कुछ सेकंड चुप रहा।


फिर बोला—


“हाँ।”


मेरे भीतर जैसे कुछ टूट गया।


उसने आगे कहा—


“बहुत करता था।”


कमरे में खामोशी छा गई।


मैंने धीमे से पूछा—


“और अब?”


उसने मेरी तरफ़ देखा, “अब मैं उससे नहीं… तुमसे प्यार करता हूँ।”


मेरे होंठ काँपे, “लेकिन तुम्हारा व्यवहार तो कुछ और कहता है।”


राघव ने गहरी साँस ली।


“क्योंकि मैं उलझ गया था। मुझे लगा था मैं सिर्फ़ एक दोस्त की मदद कर रहा हूँ। लेकिन मुझे समझ नहीं आया कि इस चक्कर में मैं तुम्हें अकेला छोड़ता जा रहा हूँ।”


मैं चुप रही।


वो पहली बार मेरे सामने इतना कमजोर दिख रहा था।


“रिया की शादी टूट चुकी है,” उसने धीरे से कहा, “वो डिप्रेशन में थी। उसने मुझसे संपर्क किया। मुझे लगा पुरानी दोस्त है, मदद कर दूँ। लेकिन शायद उसे कुछ और उम्मीद होने लगी थी।”


“और तुम्हें?”


उसने बिना नजरें हटाए कहा—


“मुझे सिर्फ़ तुम्हें खोने का डर होने लगा था।”


मेरी आँखों से आँसू बह निकले।


“तो पहले बताया क्यों नहीं?”


“क्योंकि मैं बेवकूफ था,” वो हल्का-सा हँसा, “और शायद खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि कब मदद और भावनाओं की सीमा धुंधली होने लगी।”


कुछ दिन बाद सब साफ हो गया।


रिया ने खुद राघव से अपने दिल की बात कह दी।


और इस बार राघव ने उसे बहुत साफ जवाब दिया।


“कुछ रिश्ते यादों में अच्छे लगते हैं, रिया। उन्हें वापस लाने की कोशिश सिर्फ़ सबकुछ तोड़ देती है।”


उस दिन के बाद रिया चली गई।


हमारी जिंदगी से भी।


लेकिन उसके जाने के बाद भी मेरे और राघव के बीच आई दूरी तुरंत खत्म नहीं हुई।


क्योंकि शक एक बार दिल में घर बना ले, तो जाते-जाते समय लेता है।


हमने कोशिश शुरू की।


फिर से साथ बैठकर चाय पीने की।


फोन अलग रखकर बातें करने की।


बिना वजह ड्राइव पर जाने की।


और सबसे ज़रूरी—


मन की बात छुपाना बंद करने की।


एक रात मैं बालकनी में खड़ी थी। हल्की हवा चल रही थी। राघव मेरे पास आकर खड़ा हो गया।


धीरे से बोला—


“तुम जानती हो, सबसे डरावनी चीज़ क्या होती है?”


“क्या?”


“ये एहसास कि इंसान अपनी सबसे कीमती चीज़ को खुद अपनी गलती से खो सकता है।”


मैंने उसकी तरफ़ देखा।


उसकी आँखों में पछतावा भी था और प्यार भी।


मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।


“अब नहीं खोओगे।”


उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा—


“इतना भरोसा है मुझ पर?”


मैंने कुछ सेकंड उसे देखा।


फिर कहा—


“भरोसा टूट सकता है… लेकिन अगर प्यार सच्चा हो, तो उसे फिर से बनाया जा सकता है।”


उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।


और उस पल मुझे महसूस हुआ—


हर रिश्ते में प्यार खत्म नहीं होता।


कई बार वो बस डर, चुप्पी और गलतफ़हमी के नीचे दब जाता है।


और जब दो लोग सच में एक-दूसरे को खोना नहीं चाहते…


तो वो प्यार फिर रास्ता ढूँढ ही लेता है।



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