एक मदद जिसने किसी की दुनिया बदल दी
“कई बार इंसान अपने रिश्तों में इतना सच्चा होता है… कि लोग उसकी अच्छाई को कमजोरी समझने लगते हैं। लेकिन वही इंसान किसी टूटे हुए दिल का सहारा बन जाए, तो उसकी एक छोटी सी मदद भी किसी की पूरी जिंदगी बदल देती है…”
घर के बाहर हल्की बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी।
बालकनी में खड़ी मैं कपड़े समेट रही थी कि तभी नीचे गेट पर खड़ी रश्मि दिखाई दी। हाथ में मिठाई का डिब्बा था और चेहरे पर ऐसी चमक, जैसे बरसों बाद कोई बड़ी खुशी मिली हो। मैं जल्दी से नीचे उतरी।
“अरे रश्मि, अचानक? सब ठीक तो है?”
उसने मुस्कुराते हुए मिठाई मेरी ओर बढ़ा दी, “दीदी… आरव की नौकरी लग गई।”
“सच?” मैं खुशी से लगभग चिल्ला पड़ी। “यह तो बहुत बड़ी खुशखबरी है।”
उसकी आंखें भर आईं, “आपकी दुआ और मदद के बिना कुछ भी संभव नहीं था।”
मैं उसे भीतर ले आई। चाय बनाते हुए मेरा मन पुरानी बातों में उलझ गया। आज आरव की सफलता देख कर जितनी खुशी मुझे हो रही थी, शायद उतनी उसके अपने घर वालों को भी न हो रही हो।
करीब तीन साल पहले की बात थी।
रश्मि हमारे सामने वाले मकान में किराए पर रहने आई थी। पति का छोटा सा बिजनेस था और एक बेटा—आरव। देखने में शांत, पढ़ाई में तेज और व्यवहार में बेहद विनम्र लड़का।
धीरे-धीरे हमारा आना-जाना बढ़ गया। रश्मि मुझे बड़ी बहन की तरह मानने लगी थी। मैं भी उसे छोटी बहन जैसा स्नेह देने लगी।
आरव इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। अक्सर मेरे पास आ कर अपने प्रोजेक्ट दिखाता, सलाह लेता। मैं हमेशा उसे प्रोत्साहित करती।
लेकिन उसी दौरान मेरे पति नरेश और बेटा करण मुझे समझाते रहते, “मम्मी, आप जरूरत से ज्यादा लोगों से जुड़ जाती हो।”
मैं हंस कर टाल देती।
एक दिन शाम को रश्मि रोती हुई मेरे घर आई। उसका चेहरा सूजा हुआ था।
“क्या हुआ?” मैंने घबरा कर पूछा।
वह फूट पड़ी, “दीदी, बिजनेस में बहुत नुकसान हो गया। घर गिरवी रखना पड़ गया है। आरव की फीस भरने के पैसे भी नहीं बचे।”
मैं सन्न रह गई।
“फिर आरव के पापा क्या कह रहे हैं?”
“वे चाहते हैं आरव पढ़ाई छोड़ कर नौकरी कर ले।”
उसी वक्त आरव भी अंदर आया। उसकी आंखों में अजीब सी बेबसी थी।
“आंटी, मैं पढ़ाई छोड़ दूंगा। पापा सही कह रहे हैं।”
“बिलकुल नहीं,” मेरे मुंह से तुरंत निकला।
मैंने उसी रात नरेश से बात की।
“मैं चाहती हूं आरव की फीस भर दी जाए।”
उन्होंने अखबार मोड़कर मेरी तरफ देखा और धीमे स्वर में बोले,
“इंदु, तुम हर किसी की जिम्मेदारी अपने सिर पर नहीं ले सकती।”
मैंने शांत आवाज़ में कहा,
“लेकिन लड़का बहुत होनहार है। इतनी मेहनत से पढ़ रहा है… अगर अभी उसकी पढ़ाई छूट गई तो उसका भविष्य बर्बाद हो जाएगा।”
उन्होंने हल्की सांस भरते हुए कहा,
“दुनिया में ऐसे हजारों बच्चे हैं। क्या तुम सबकी मदद कर पाओगी?”
उनकी बात सुनकर मैं चुप तो हो गई, लेकिन मन के भीतर अजीब सी बेचैनी उठने लगी। बार-बार आरव का उदास चेहरा आंखों के सामने घूम रहा था।
अगले दिन मैंने अपने कुछ गहने निकाल लिए।
नरेश को पता चला तो नाराज हो उठे, “तुम्हें समझ क्यों नहीं आता? लोग फायदा उठाते हैं तुम्हारी भावुकता का।”
“अगर मेरी वजह से किसी की पढ़ाई बच जाए तो मुझे नुकसान नहीं लगेगा,” मैंने धीमे स्वर में कहा।
आखिरकार फीस भर दी गई।
आरव की पढ़ाई जारी रही। वह पहले से भी ज्यादा मेहनत करने लगा। हर परीक्षा में अच्छे अंक लाता।
लेकिन जिंदगी शायद अभी और इम्तिहान लेना चाहती थी।
एक रात अचानक खबर मिली कि रश्मि के पति को हार्ट अटैक आया है। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।
पूरा घर जैसे बिखर गया।
रश्मि बेसुध सी हो गई थी। रिश्तेदार दो दिन तक सहानुभूति जताते रहे, फिर धीरे-धीरे सब अपने रास्ते चल दिए।
कुछ लोगों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया, “इतनी बड़ी पढ़ाई करवाने का क्या फायदा? कोई छोटी-मोटी नौकरी कर ले।”
मैं अंदर ही अंदर जल उठती।
आरव अब और भी खामोश रहने लगा था। कई बार देर रात तक छत पर अकेला बैठा रहता।
एक दिन मैंने पूछा, “क्या सोच रहे हो?”
उसकी आंखें भर आईं, “आंटी, पापा चले गए… अब मम्मी की जिम्मेदारी भी है। समझ नहीं आता क्या करूं।”
“बस इतना याद रखो,” मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, “मुश्किल वक्त हमेशा नहीं रहता।”
धीरे-धीरे उसने कॉलेज पूरा किया। कैंपस प्लेसमेंट की तैयारी शुरू कर दी।
मैं रोज भगवान से उसके लिए प्रार्थना करती।
करण और नरेश आज भी मेरा मजाक उड़ाते।
“मम्मी को दुनिया भर के बच्चों की चिंता रहती है,” करण हंसता।
मैं भी मुस्कुरा देती, लेकिन दिल से चाहती थी कि आरव सफल हो जाए।
फिर एक दिन इंटरव्यू के लिए उसे दूसरे शहर जाना था।
पैसों की दिक्कत फिर सामने खड़ी थी।
रश्मि ने झिझकते हुए कहा, “दीदी, रहने दीजिए… शायद किस्मत में नहीं है।”
लेकिन मैं कैसे मान जाती?
मैंने करण से कहा, “तुम अपनी बाइक कुछ दिनों के लिए आरव को दे दो।”
करण पहले तो मुंह बनाने लगा, फिर बोला, “आप के आगे किसकी चलती है।”
आरव इंटरव्यू देने चला गया।
उसके जाने के बाद मैं पूरे दिन बेचैन रही। बार-बार फोन देखती।
रात करीब नौ बजे फोन आया।
“आंटी…”
“हां बेटा?”
उधर से रोने की आवाज आई।
मेरा दिल बैठ गया, “क्या हुआ?”
“सेलेक्ट हो गया आंटी…”
मेरी आंखों से भी आंसू बह निकले।
मैंने तुरंत रश्मि को गले लगा लिया। वह लगातार रोए जा रही थी।
उस दिन पहली बार नरेश भी चुप थे। शायद उन्हें भी मेरी खुशी समझ आ रही थी।
धीरे-धीरे आरव की नौकरी शुरू हो गई। उसने सबसे पहले गिरवी रखा घर छुड़वाया।
फिर एक दिन वह अपनी मां के साथ मेरे घर आया।
उसके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा था।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
“आपके लिए,” उसने मुस्कुरा कर कहा।
मैंने खोला तो उसमें वही डिजाइन की चूड़ियां थीं, जैसी मैंने उसकी फीस भरने के लिए बेची थीं।
मेरी आंखें भर आईं।
“यह सब क्यों बेटा?”
उसने धीरे से कहा, “क्योंकि उस दिन अगर आपने मेरा हाथ न पकड़ा होता… तो शायद मैं जिंदगी से हार जाता।”
मैं कुछ बोल ही नहीं पाई।
उसी वक्त पीछे खड़े नरेश बोले, “अब समझ आया… तुम्हारी यही आदत क्यों अलग है।”
मैंने पलट कर उन्हें देखा।
वे हल्का सा मुस्कुराए, “हर रिश्ता खून से नहीं बनता… कुछ रिश्ते इंसानियत से भी बन जाते हैं।”
उनकी बात सुन कर मेरा मन भर आया।
सच… दुनिया चाहे जितनी व्यावहारिक हो जाए, लेकिन किसी टूटे हुए इंसान का सहारा बनना आज भी सबसे बड़ा रिश्ता होता है।

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