18 साल बाद लौटी पत्नी
अनिरुद्ध अपने मोबाइल की स्क्रीन को लगातार देखे जा रहा था। फोन पर एक ही नाम बार-बार चमक रहा था—नेहा।
वह कॉल काट देता, लेकिन कुछ देर बाद फिर वही कॉल आ जाती। पिछले पंद्रह दिनों से यही सिलसिला चल रहा था। हर बार नेहा एक ही बात कहती—
"अनिरुद्ध, बस एक बार मेरी बात सुन लो।"
लेकिन अनिरुद्ध के पास कोई जवाब नहीं था।
उसकी जिंदगी आज ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ एक तरफ उसकी बूढ़ी माँ सरिता देवी थीं और दूसरी तरफ उसकी पहली पत्नी नेहा, जो अठारह साल बाद वापस लौटना चाहती थी।
यह कहानी आज की नहीं थी।
बाईस साल पहले अनिरुद्ध की शादी नेहा से हुई थी। दोनों की जोड़ी देखकर लोग कहा करते थे कि भगवान ने इन्हें एक-दूसरे के लिए ही बनाया है।
अनिरुद्ध का परिवार कानपुर में रहता था। घर में माता-पिता, बड़ा भाई, भाभी और उनकी संतानें थीं। संयुक्त परिवार था लेकिन प्यार बहुत था।
उधर नेहा अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। उसका मायका इलाहाबाद में था।
शादी के बाद नेहा जल्दी ही सबके साथ घुल-मिल गई। घर के हर सदस्य का ख्याल रखती थी। सरिता देवी भी उसे बेटी से कम नहीं मानती थीं।
दो साल बाद उनके घर बेटे आरव का जन्म हुआ।
सब कुछ ठीक चल रहा था।
लेकिन फिर एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।
नेहा के पिता का अचानक निधन हो गया।
उसकी माँ शारदा देवी अकेली रह गईं।
नेहा अक्सर अपनी माँ की चिंता करती रहती।
वह कई बार कहती—
"माँ, आप हमारे पास आ जाइए। अकेले कैसे रहेंगी?"
लेकिन शारदा देवी हर बार मना कर देतीं।
"बेटी, इस उम्र में अपना घर छोड़कर कहीं नहीं जाया जाता।"
समय बीतता गया।
एक दिन शारदा देवी को ब्रेन स्ट्रोक आ गया।
नेहा और अनिरुद्ध तुरंत इलाहाबाद पहुँचे।
कई दिनों तक अस्पताल में इलाज चलता रहा।
आखिरकार डॉक्टर ने उन्हें घर ले जाने की अनुमति दे दी।
शारदा देवी की हालत कमजोर थी।
अनिरुद्ध ने खुद नेहा से कहा—
"तुम कुछ दिन यहीं रुक जाओ। माँ को तुम्हारी जरूरत है।"
नेहा रुक गई।
अनिरुद्ध बेटे को लेकर कानपुर लौट आया।
शुरुआत में सब ठीक था।
फोन पर बातें होती थीं।
वीडियो कॉल पर आरव अपनी माँ से बातें करता था।
लेकिन धीरे-धीरे नेहा का व्यवहार बदलने लगा।
उसके फोन कम आने लगे।
फिर अचानक एक दिन अनिरुद्ध के घर कोर्ट का नोटिस पहुँचा।
तलाक का नोटिस।
पूरा परिवार सन्न रह गया।
अनिरुद्ध को विश्वास ही नहीं हुआ।
उसने लगातार फोन किए लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
आखिर वह अपने माता-पिता और बेटे को लेकर इलाहाबाद पहुँचा।
वहाँ भी नेहा सामने नहीं आई।
सिर्फ शारदा देवी ने बात की।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा—
"मेरी बेटी अब तुम्हारे घर नहीं जाएगी।"
सबने वजह पूछी।
लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
उल्टा उन्हें घर से जाने के लिए कह दिया गया।
कुछ महीनों तक कोर्ट में केस चलता रहा।
हर तारीख पर नेहा एक ही बात दोहराती—
"मुझे तलाक चाहिए।"
आखिरकार अनिरुद्ध ने हार मान ली।
तलाक हो गया।
नेहा को गुजारा भत्ता और एक बड़ी रकम देकर रिश्ता खत्म कर दिया गया।
उस दिन के बाद नेहा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
न बेटे से मिलने की कोशिश की।
न फोन किया।
न कोई खबर ली।
आरव धीरे-धीरे बड़ा होता गया।
जब स्कूल में दूसरे बच्चों की माएँ आती थीं तो वह चुपचाप एक कोने में खड़ा हो जाता।
उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता—
"क्या मेरी मम्मी मुझे प्यार नहीं करती थीं?"
लेकिन किसी के पास जवाब नहीं था।
सरिता देवी ने ही उसे माँ और दादी दोनों का प्यार दिया।
अनिरुद्ध ने भी दूसरी शादी नहीं की।
परिवार ने बहुत समझाया।
लेकिन उसका एक ही जवाब होता—
"मेरा बेटा ही मेरी दुनिया है।"
समय अपनी रफ्तार से चलता रहा।
अठारह साल गुजर गए।
आरव इंजीनियर बन चुका था।
अनिरुद्ध रिटायरमेंट के करीब था।
तभी एक दिन एक अनजान नंबर से फोन आया।
उधर से किसी महिला की आवाज आई।
"क्या आप अनिरुद्ध जी बोल रहे हैं?"
"जी।"
"मैं सिटी अस्पताल से बोल रही हूँ। नेहा जी आपसे मिलना चाहती हैं।"
अनिरुद्ध का दिल धड़क उठा।
उसे पता चला कि कुछ महीने पहले एक सड़क दुर्घटना में शारदा देवी की मौत हो गई थी।
नेहा भी गंभीर रूप से घायल हुई थी।
उसके चेहरे और शरीर का बड़ा हिस्सा जल गया था।
अब वह लगभग अकेली थी।
पहले तो अनिरुद्ध ने जाने से मना कर दिया।
लेकिन आरव ने कहा—
"पापा, एक बार मिल लेने में क्या बुराई है?"
आखिर दोनों अस्पताल पहुँचे।
नेहा को देखकर वे दोनों चौंक गए।
कभी बेहद सुंदर दिखने वाली नेहा अब पहचान में भी नहीं आ रही थी।
उन्हें देखते ही वह फूट-फूट कर रोने लगी।
कंपकंपाती आवाज में बोली—
"मुझे माफ कर दो।"
अनिरुद्ध चुप रहा।
नेहा ने कहा—
"मैं तलाक नहीं चाहती थी। माँ ने मुझे भावनात्मक रूप से इतना बाँध लिया था कि मैं कुछ सोच ही नहीं पाई। उन्होंने कहा था कि अगर मैं चली गई तो वह जी नहीं पाएँगी। मैं डर गई थी।"
आरव पहली बार अपनी माँ की बातें सुन रहा था।
उसकी आँखें भी भर आईं।
नेहा रोते हुए बोली—
"मैंने बहुत बड़ी गलती की। सबसे बड़ा अपराध अपने बेटे के साथ किया।"
फिर उसने आरव की तरफ देखा।
"बेटा, अगर हो सके तो मुझे माफ कर देना।"
आरव कुछ नहीं बोला।
लेकिन उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उस दिन के बाद अनिरुद्ध और आरव कई बार अस्पताल गए।
नेहा धीरे-धीरे ठीक होने लगी।
लेकिन अब एक नई समस्या सामने खड़ी थी।
नेहा वापस उनके साथ रहना चाहती थी।
उधर सरिता देवी इसका नाम सुनते ही नाराज हो जाती थीं।
उन्होंने साफ कह दिया—
"जिस औरत ने अपने बच्चे को छोड़ दिया, उसके लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं है।"
अनिरुद्ध ने बहुत समझाने की कोशिश की।
लेकिन माँ अपने फैसले पर अड़ी रहीं।
अब अनिरुद्ध के सामने सबसे कठिन फैसला था।
एक तरफ वह स्त्री थी जिसने उसे कभी गहरा घाव दिया था, लेकिन आज पूरी तरह अकेली थी।
दूसरी तरफ वह माँ थी जिसने हर मुश्किल समय में उसका साथ दिया था।
आरव भी उलझन में था।
वह अपनी माँ को सजा देना नहीं चाहता था।
लेकिन दादी का दिल भी नहीं दुखाना चाहता था।
दिन बीतते जा रहे थे।
नेहा रोज फोन करके सिर्फ एक सवाल पूछती—
"क्या मुझे वापस आने की अनुमति मिल जाएगी?"
और हर बार अनिरुद्ध के पास कोई जवाब नहीं होता।
आज भी वह खिड़की के पास बैठा उसी सवाल का उत्तर खोज रहा था।
क्या इंसान को उसकी पुरानी गलतियों की सजा जिंदगी भर मिलनी चाहिए?
क्या पश्चाताप करने वाले को दूसरा मौका मिलना चाहिए?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या रिश्ते खून से बनते हैं, जिम्मेदारी से बनते हैं या फिर क्षमा से?
अनिरुद्ध को इन सवालों का जवाब नहीं मिला।
शायद इसलिए यह कहानी आज आपके सामने है।
अगर आप अनिरुद्ध की जगह होते तो क्या फैसला लेते?
क्या नेहा को दूसरा मौका मिलना चाहिए?
या सरिता देवी की नाराजगी बिल्कुल सही है?
अपनी राय जरूर बताइए।

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