20 साल बाद मिला माँ का खत
"रेलवे स्टेशन पर छोड़ा हुआ एक पुराना बैग, जिसने 20 साल बाद एक परिवार को फिर से मिला दिया..."
शाम के लगभग सात बजे थे।
बरसात अभी-अभी रुकी थी।
प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर लोगों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी।
ट्रेन जा चुकी थी।
चाय वाले अपनी दुकानें समेट रहे थे।
कुली दिनभर की थकान के बाद आराम करने की तैयारी कर रहे थे।
उसी समय रेलवे स्टेशन के एक कोने में रखे पुराने लोहे के बेंच के नीचे एक भूरा चमड़े का बैग दिखाई दिया।
स्टेशन मास्टर रमेश तिवारी की नजर उस पर पड़ी।
उन्होंने आसपास देखा।
कोई नहीं था।
उन्होंने लाउडस्पीकर से घोषणा करवाई।
"जिस यात्री का भूरा बैग प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर छूट गया है, कृपया स्टेशन मास्टर कार्यालय में संपर्क करें।"
लेकिन कोई नहीं आया।
रात तक इंतजार किया गया।
फिर बैग स्टेशन के रिकॉर्ड रूम में जमा कर दिया गया।
अगले कुछ दिन भी कोई उसे लेने नहीं आया।
नियम के अनुसार बैग को सील करके रेलवे के पुराने सामान वाले गोदाम में रख दिया गया।
समय बीतता गया।
दिन महीने बने।
महीने साल बन गए।
और फिर देखते-देखते पूरे बीस साल गुजर गए।
उस दौरान स्टेशन भी बदल गया।
पुरानी इमारत की जगह नई बिल्डिंग बन गई।
नए कर्मचारी आ गए।
पुराने लोग रिटायर हो गए।
लेकिन वह बैग उसी गोदाम के एक कोने में पड़ा रहा।
धूल से ढका हुआ।
भूला हुआ।
जैसे किसी अधूरी कहानी का आखिरी पन्ना।
बीस साल बाद...
स्टेशन के नवीनीकरण का काम चल रहा था।
पुराने गोदाम को खाली किया जा रहा था।
रेलवे कर्मचारी आदित्य सामान की सूची बना रहा था।
तभी उसकी नजर उस पुराने बैग पर पड़ी।
बैग पूरी तरह जर्जर हो चुका था।
किनारे फट चुके थे।
ताला जंग खा चुका था।
उसने बैग उठाया।
उस पर फीकी स्याही से एक नाम लिखा था—
"सावित्री देवी"
आदित्य ने बैग खोला।
अंदर कुछ पुराने कपड़े थे।
एक बच्चों का स्वेटर।
कुछ तस्वीरें।
और नीचे दबा हुआ एक पीला लिफाफा।
लिफाफे पर लिखा था—
"मेरे बेटे अमन के लिए"
आदित्य रुक गया।
उसने सावधानी से पत्र खोला।
कागज पुराना हो चुका था।
लेकिन अक्षर अभी भी साफ थे।
पत्र में लिखा था—
"बेटा अमन,
जब तू यह पत्र पढ़ रहा होगा, शायद मैं तेरे पास न रहूँ।
मुझे नहीं पता जिंदगी मुझे कितना समय देगी।
लेकिन एक बात जरूर जान लेना—तेरी माँ ने तुझे कभी छोड़ना नहीं चाहा।
अगर कभी तुझे यह बताया जाए कि मैं तुझे छोड़कर चली गई थी, तो उस बात पर विश्वास मत करना।
मुझे मजबूरी में तुझसे दूर होना पड़ा था।
मैं हर जन्म में तुझे अपना बेटा ही माँगूँगी।
—तेरी माँ, सावित्री"
पत्र पढ़ते-पढ़ते आदित्य की आँखें नम हो गईं।
उसने सोचा—
आखिर इस पत्र की कहानी क्या होगी?
और यह अमन कौन होगा?
जिज्ञासा के कारण उसने बैग में रखी तस्वीरें देखीं।
एक तस्वीर में लगभग पाँच साल का बच्चा अपनी माँ के साथ खड़ा था।
पीछे फोटो स्टूडियो का नाम लिखा था।
साथ में एक पुराना पता भी था।
आदित्य ने फैसला किया कि वह इस कहानी का अंत खोजेगा।
दो दिन बाद वह उस पते पर पहुँचा।
लेकिन वहाँ अब पुराना घर नहीं था।
पूरी कॉलोनी बदल चुकी थी।
काफी पूछताछ के बाद एक बुजुर्ग व्यक्ति मिले।
उन्होंने तस्वीर देखते ही कहा,
"अरे... ये तो सावित्री है।"
आदित्य उत्साहित हो गया।
"आप जानते हैं इन्हें?" आदित्य ने उत्सुकता से तस्वीर आगे बढ़ाते हुए पूछा।
बुजुर्ग ने अपने कांपते हाथों से तस्वीर ली और ध्यान से देखने लगे।
कुछ क्षण बाद उनकी आँखों में पहचान की चमक उभरी।
"अरे... ये तो सावित्री है।"
आदित्य तुरंत आगे झुक गया।
"आप इन्हें जानते थे?"
बुजुर्ग ने गहरी साँस ली।
"हाँ बेटा, बहुत अच्छी तरह जानता था। लगभग बीस-पच्चीस साल पहले यहीं रहती थी। बहुत सीधी-सादी और मेहनती महिला थी। उसका एक छोटा-सा बेटा था—अमन। उसकी दुनिया बस उसी बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती थी।"
"फिर उनके साथ क्या हुआ?" आदित्य ने धीरे से पूछा।
बुजुर्ग कुछ पल चुप रहे।
उनके चेहरे पर उदासी उतर आई।
"बेटा, किस्मत ने उसके साथ बहुत बुरा खेल खेला। अमन के पिता की अचानक बीमारी से मौत हो गई थी। उस हादसे ने सावित्री को अंदर तक तोड़ दिया। लेकिन असली मुश्किल तो उसके बाद शुरू हुई।"
"कैसी मुश्किल?"
"पति के जाने के बाद ससुराल वालों का व्यवहार बदल गया। जो लोग पहले अपने थे, वही उसे बोझ समझने लगे। छोटी-छोटी बातों पर ताने दिए जाते, हर बात के लिए उसे दोषी ठहराया जाता। वह सब कुछ सहती रही, सिर्फ अपने बेटे के लिए।"
आदित्य चुपचाप सुनता रहा।
बुजुर्ग ने आगे कहा,
"फिर एक दिन अचानक खबर मिली कि सावित्री घर छोड़कर चली गई है। किसी ने कहा वह अपनी मर्जी से गई, किसी ने कहा उसे मजबूर किया गया। लेकिन सच क्या था, यह कोई नहीं जान पाया।"
"और अमन?" आदित्य ने बेचैनी से पूछा।
बुजुर्ग की आवाज़ और धीमी हो गई।
"अमन तब बहुत छोटा था। उसकी देखभाल का बहाना बनाकर उसके चाचा उसे अपने साथ ले गए। उसके बाद दोनों अलग हो गए। न सावित्री की कोई खबर मिली, न कभी अमन अपनी माँ से मिल पाया।"
बुजुर्ग ने तस्वीर को एक बार फिर देखा और भर्राई आवाज़ में कहा,
"बस इतना जानता हूँ बेटा... उस औरत की आँखों में अपने बेटे के लिए जितना प्यार मैंने देखा था, वैसा प्यार बहुत कम माँओं की आँखों में देखने को मिलता है।"
काफी खोजबीन के बाद आदित्य को अमन का पता मिल गया।
अब अमन लगभग पच्चीस साल का नहीं, बल्कि पैंतीस साल का सफल व्यवसायी था।
वह दूसरे शहर में रहता था।
आदित्य ने उससे मिलने का समय माँगा।
जब वे मिले तो आदित्य ने बैग उसके सामने रखा।
अमन हैरान था।
"यह क्या है?"
"शायद आपकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण सामान।"
अमन ने बैग खोला।
तस्वीरें देखीं।
और फिर पत्र पढ़ना शुरू किया।
पहली पंक्ति पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।
दूसरी पंक्ति पढ़ते-पढ़ते हाथ काँपने लगे।
और आखिरी पंक्ति तक पहुँचते-पहुँचते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कई मिनट तक वह कुछ बोल नहीं पाया।
फिर धीरे से बोला—
"मुझे बचपन से बताया गया था कि मेरी माँ मुझे छोड़कर भाग गई थी।"
उसकी आवाज भर्रा गई।
"मैंने उनसे नफरत की... सालों तक।"
उसने पत्र सीने से लगा लिया।
"लेकिन वो तो मुझे छोड़ना ही नहीं चाहती थीं।"
उस रात अमन सो नहीं पाया।
बीस साल की गलतफहमी उसकी आँखों के सामने घूम रही थी।
उसे पहली बार अपनी माँ की याद आई।
वह यादें जिन्हें उसने गुस्से में दबा दिया था।
माँ का हाथ पकड़कर बाजार जाना।
माँ का उसे गोद में सुलाना।
माँ का उसके लिए खीर बनाना।
सब कुछ लौट आया।
अगले कई महीनों तक उसने अपनी माँ की तलाश शुरू कर दी।
हर शहर में खोज।
पुराने रिकॉर्ड।
सरकारी दस्तावेज।
अनाथालय।
महिला आश्रम।
वृद्धाश्रम।
जहाँ उम्मीद दिखती, वहाँ पहुँच जाता।
लेकिन कोई खबर नहीं मिली।
एक दिन उसे एक वृद्धाश्रम से फोन आया।
"क्या आप सावित्री देवी को खोज रहे हैं?"
अमन का दिल जोर से धड़कने लगा।
"जी... जी हाँ।"
"यहाँ एक महिला हैं। उनकी उम्र लगभग पचहत्तर वर्ष है। और उनके पास आपके बचपन की एक तस्वीर है।"
अमन उसी शाम वहाँ पहुँचा।
वृद्धाश्रम के छोटे से कमरे में एक कमजोर वृद्ध महिला खिड़की के पास बैठी थीं।
सफेद बाल।
झुर्रियों से भरा चेहरा।
कमजोर आँखें।
लेकिन उन आँखों में वर्षों का इंतजार था।
अमन धीरे-धीरे उनके सामने पहुँचा।
महिला ने उसे देखा।
कुछ पल तक देखती रहीं।
फिर काँपती आवाज में बोलीं—
"अमन...?"
बस इतना सुनना था।
अमन फूट-फूटकर रो पड़ा।
"माँ..."
अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे।
कमरे में मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं।
बीस साल का दर्द आँसुओं में बह रहा था।
बीस साल का इंतजार खत्म हो रहा था।
कुछ देर बाद सावित्री ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में फेरती थीं।
"बेटा, मैंने कभी तुझे छोड़ा नहीं था।"
अमन ने रोते हुए कहा,
"माँ, मुझे माफ कर दो। मैंने बिना सच जाने आपसे नफरत की।"
सावित्री मुस्कुराईं।
"माँ अपने बच्चे से नाराज नहीं होती बेटा।"
उस दिन अमन अपनी माँ को अपने घर ले आया।
पहली बार उसकी पत्नी और बच्चे अपनी दादी से मिले।
घर में फिर से रौनक लौट आई।
और वह पुराना बैग...
जिसे कभी रेलवे स्टेशन के एक कोने में भुला दिया गया था...
आज घर के सबसे सुरक्षित स्थान पर रखा था।
क्योंकि उसमें सिर्फ कुछ कपड़े और तस्वीरें नहीं थीं।
उसमें एक माँ का प्यार बंद था।
वह प्यार जो बीस साल तक रास्ता खोजता रहा...
और आखिरकार अपने बेटे तक पहुँच ही गया।
कहते हैं, समय बहुत कुछ छीन सकता है, लेकिन एक माँ का प्यार कभी खोता नहीं। वह किसी न किसी रास्ते से अपने बच्चे तक पहुँच ही जाता है।

Post a Comment