पराया धन नहीं, पिता का सबसे बड़ा सहारा थी वह बेटी
"जिस बेटी को लोग बोझ समझते थे, उसी ने एक दिन अपने पिता की सबसे बड़ी चिंता दूर कर दी..."
"बेटी है... पराया धन है... एक दिन तो इसे अपने घर जाना ही है।"
रिश्तेदारों की यह बात रमेश जी ने अपनी जिंदगी में न जाने कितनी बार सुनी थी।
हर बार वह बस मुस्कुरा देते।
लेकिन दिल के किसी कोने में यह बात उन्हें चुभ जाती थी।
रमेश जी के दो बेटे थे—अमित और विकास।
उनसे छोटी एक बेटी थी—आरती।
तीनों बच्चों से उन्हें बराबर प्यार था।
उन्होंने कभी बेटों और बेटी में फर्क नहीं किया।
बचपन में जब भी बाजार जाते, तीनों के लिए एक जैसी चीजें लेकर आते।
अगर बेटों के लिए नए कपड़े आते, तो बेटी के लिए भी आते।
लेकिन समाज की सोच अलग थी।
लोग हमेशा कहते,
"बेटों पर ध्यान दो। वही बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।"
रमेश जी मुस्कुराकर जवाब देते,
"सहारा इंसान बनता है, बेटा या बेटी नहीं।"
समय गुजरता गया।
तीनों बच्चे बड़े हो गए।
अमित की नौकरी दूसरे शहर में लग गई।
विकास भी पढ़ाई पूरी करके विदेश चला गया।
घर में अब सिर्फ रमेश जी, उनकी पत्नी सुशीला और बेटी आरती रह गए।
आरती पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।
लेकिन उससे भी अच्छी उसकी आदतें थीं।
वह हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखती।
मां की तबीयत खराब होती तो रातभर जागती।
पिता को दवा देनी होती तो समय से पहले याद दिलाती।
रमेश जी कई बार मजाक में कहते,
"तू तो हमारी मां बन गई है।"
और आरती हंस पड़ती।
कुछ वर्षों बाद आरती की शादी तय हो गई।
पूरा घर खुश था।
लेकिन रमेश जी के दिल में एक अजीब सी उदासी थी।
जिस बेटी की हंसी से घर गूंजता था, वह अब विदा होने वाली थी।
शादी का दिन आया।
आरती की विदाई हुई।
जब गाड़ी आगे बढ़ी, तो रमेश जी की आंखों से आंसू बह निकले।
उन्हें लगा जैसे घर की रौनक चली गई हो।
समय आगे बढ़ता रहा।
दोनों बेटे अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए।
फोन कभी-कभार आता।
हालचाल पूछ लेते।
फिर अपने कामों में लग जाते।
आरती भी अपने ससुराल में खुश थी।
लेकिन वह रोज अपने माता-पिता से बात करती।
अगर एक दिन भी फोन न हो, तो उसे बेचैनी होने लगती।
वह पूछती,
"पापा, दवा ली ना?"
"मम्मी, खाना समय पर खाया ना?"
रमेश जी हंसकर कहते,
"तू ससुराल में है या यहीं बैठी है?"
एक दिन अचानक सुशीला जी की तबीयत बहुत खराब हो गई।
उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
रमेश जी घबरा गए।
उन्होंने दोनों बेटों को फोन किया।
अमित ने कहा,
"पापा, ऑफिस में बहुत जरूरी काम है। दो दिन बाद आऊंगा।"
विकास ने कहा,
"पापा, टिकट मिलते ही आने की कोशिश करूंगा।"
दोनों की अपनी मजबूरियां थीं।
रमेश जी समझ रहे थे।
लेकिन उस समय उन्हें किसी अपने की जरूरत थी।
उधर आरती को जैसे ही खबर मिली, उसने बिना एक पल गंवाए अपने पति से बात की।
उसके पति ने तुरंत कहा,
"चलो, अभी चलते हैं।"
कुछ ही घंटों में आरती अस्पताल पहुंच गई।
मां का हाथ पकड़कर बैठ गई।
पिता के लिए खाना लाई।
दवाइयों का इंतजाम किया।
रातभर अस्पताल में जागती रही।
कई दिनों तक वह वहीं रही।
जब तक सुशीला जी पूरी तरह ठीक नहीं हो गईं, तब तक उसने घर लौटने का नाम नहीं लिया।
रमेश जी यह सब देखते रहे।
एक दिन उन्होंने आरती से कहा,
"बेटा, तेरी भी अपनी जिम्मेदारियां हैं। अब घर चली जा।"
आरती मुस्कुराई।
"पापा, जिम्मेदारियां वहां भी हैं और यहां भी।"
"लेकिन आपने और मम्मी ने पूरी जिंदगी मेरा साथ दिया है।"
"आज अगर मैं आपके साथ नहीं खड़ी हुई तो फिर बेटी कहलाने का क्या मतलब?"
रमेश जी की आंखें भर आईं।
उन्होंने बेटी का सिर सहलाया।
कुछ महीनों बाद रमेश जी रिटायर हो गए।
उनकी जमा पूंजी एक गलत निवेश में फंस गई।
काफी पैसा डूब गया।
वह बहुत परेशान रहने लगे।
उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
लेकिन आरती ने पिता की आवाज से उनकी चिंता पहचान ली।
वह तुरंत मिलने आई।
बहुत पूछने पर रमेश जी ने पूरी बात बता दी।
आरती कुछ देर चुप रही।
फिर उसने अपना एक फोल्डर पिता के हाथ में रख दिया।
रमेश जी ने खोला तो हैरान रह गए।
उसमें बैंक की एफडी और बचत के कागजात थे।
"ये क्या है बेटा?"
आरती मुस्कुराई।
"पापा, शादी के बाद से मैंने थोड़ी-थोड़ी बचत की थी।"
"सोचा था किसी जरूरत में काम आएगी।"
"आज जरूरत आपकी है।"
रमेश जी की आंखों से आंसू बह निकले।
उन्होंने कहा,
"नहीं बेटा, मैं तुम्हारे पैसे नहीं ले सकता।"
आरती ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"जब मैं छोटी थी, तब आपने कभी हिसाब नहीं लगाया था कि मुझ पर कितना खर्च हुआ।"
"फिर आज मैं हिसाब क्यों लगाऊं?"
यह सुनकर रमेश जी रो पड़े।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि रिश्ते पैसे से नहीं, प्रेम से चलते हैं।
कुछ दिनों बाद दोनों बेटे भी घर आए।
उन्हें सारी बात पता चली।
उन्होंने देखा कि जिस बहन को लोग 'पराया धन' कहते थे, वही सबसे पहले माता-पिता के साथ खड़ी थी।
अमित ने शर्मिंदा होकर कहा,
"पापा, हम शायद जिम्मेदारियों में इतने उलझ गए कि आपका दर्द समझ ही नहीं पाए।"
विकास ने भी सिर झुका लिया।
रमेश जी ने दोनों बेटों को गले लगा लिया।
फिर मुस्कुराते हुए बोले,
"गलती किसी की नहीं है।"
"बस याद रखो, माता-पिता को सबसे ज्यादा जरूरत पैसे की नहीं, अपनेपन की होती है।"
उस दिन पूरे परिवार ने साथ बैठकर भोजन किया।
घर फिर से हंसी से भर गया।
रमेश जी बार-बार अपनी बेटी को देख रहे थे।
उनके चेहरे पर गर्व साफ दिखाई दे रहा था।
रात को जब सब सो गए, तो सुशीला जी ने पूछा,
"आज इतने खुश क्यों हो?"
रमेश जी मुस्कुराए और बोले,
"लोग कहते थे बेटी पराया धन होती है।"
"लेकिन आज समझ आया कि बेटी कहीं नहीं जाती।"
"वह बस अपना घर बढ़ा लेती है, दिल नहीं बदलती।"
सुशीला जी की आंखें नम हो गईं।
और सच भी यही है—
बेटियां घर छोड़ती हैं, रिश्ते नहीं।
वे दूर जरूर चली जाती हैं, लेकिन माता-पिता के लिए उनका प्यार कभी दूर नहीं जाता।
जब दुनिया साथ छोड़ने लगे, तब अक्सर एक बेटी ही सबसे पहले माता-पिता का हाथ थाम लेती है।

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