रिश्तों की असली कीमत
"बहू बोली – 'मम्मी जी, हर बार आपके छोटे बेटे के आने से घर का खर्च बढ़ जाता है...' लेकिन जो सच सामने आया, उसने सबकी आंखें नम कर दीं"
"मम्मी जी, इस बार दीपावली पर छोटे भैया को मत बुलाइए..."
यह कहते हुए बहू रचना ने रसोई में सब्जी काट रही कमला देवी की ओर देखा।
कमला देवी के हाथ अचानक रुक गए।
उन्होंने धीरे से पूछा,
"क्यों बहू?"
रचना ने बिना झिझक जवाब दिया,
"हर साल आते हैं तो पूरे परिवार के साथ आते हैं। बच्चों की फरमाइशें अलग, खाने-पीने का खर्च अलग। ऊपर से आते समय कुछ लेकर भी नहीं आते। महंगाई कितनी बढ़ गई है, आप भी जानती हैं।"
कमला देवी कुछ नहीं बोलीं।
बस चुपचाप सब्जी काटती रहीं।
लेकिन उनके दिल में जैसे किसी ने चुभन पैदा कर दी थी।
जिस बेटे अमित को उन्होंने अपने हाथों से बड़ा किया था, आज उसके घर आने का हिसाब लगाया जा रहा था।
उन्हें याद आया कि अमित बचपन में कितना सीधा था।
घर की हालत खराब थी।
कई बार खुद भूखा रहकर वह अपने बड़े भाई विकास के लिए मिठाई बचाकर रख देता था।
पिता के गुजर जाने के बाद दोनों भाइयों ने मिलकर संघर्ष किया था।
फिर नौकरी मिलने के बाद अमित दूसरे शहर चला गया।
शादी हुई।
बच्चे हुए।
लेकिन हर त्योहार पर वह मां से मिलने जरूर आता था।
कमला देवी की आंखें भर आईं।
उसी समय दरवाजे के बाहर खड़ा विकास सब कुछ सुन चुका था।
उसने भी कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसका मन बेचैन हो गया।
उधर अमित को इन बातों की कोई खबर नहीं थी।
वह दूसरे शहर में अपनी नौकरी और परिवार में व्यस्त था।
दीपावली आने में अभी पंद्रह दिन बाकी थे।
हर साल की तरह उसने मां को फोन किया।
"मां, इस बार बच्चों ने कह दिया है कि दादी के घर ही दीपावली मनाएंगे।"
कमला देवी ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"देखते हैं बेटा।"
अमित समझ गया कि मां की आवाज पहले जैसी खुश नहीं है।
उसने पूछा भी,
"सब ठीक है ना?"
कमला देवी ने हमेशा की तरह बात टाल दी।
"सब ठीक है बेटा।"
लेकिन मां का दिल भारी था।
फोन रखने के बाद उनकी आंखों से आंसू निकल आए।
उन्होंने भगवान के सामने दीपक जलाया और धीरे से बोलीं,
"हे प्रभु, रिश्तों में दूरी मत आने देना।"
दिन बीतते गए।
घर में दीपावली की तैयारियां शुरू हो गईं।
रचना बाजार से सजावट का सामान ला रही थी।
बच्चे पटाखों की सूची बना रहे थे।
लेकिन कमला देवी पहले जैसी उत्साहित नहीं थीं।
विकास यह सब देख रहा था।
आखिर एक रात उसने मां से पूछा,
"मां, क्या बात है?"
कमला देवी ने पहले मना किया।
लेकिन बेटे के बार-बार पूछने पर उन्होंने सारी बात बता दी।
विकास सुनकर स्तब्ध रह गया।
उसे अपनी पत्नी की बात पर शर्म महसूस हुई।
लेकिन उसने घर में झगड़ा नहीं किया।
वह चुप रहा।
दीपावली से दो दिन पहले अचानक अमित का फोन आया।
"भैया, इस बार मैं शायद नहीं आ पाऊंगा।"
विकास चौंक गया।
"क्यों?"
अमित हंसने की कोशिश करते हुए बोला,
"बस कुछ काम है।"
लेकिन उसकी आवाज में छिपा दर्द विकास समझ गया।
उसे एहसास हो गया कि शायद किसी तरह अमित तक भी यह बात पहुंच चुकी है।
दीपावली का दिन आ गया।
सुबह से घर में पूजा की तैयारी चल रही थी।
लेकिन कमला देवी का मन बुझा-बुझा था।
उन्हें लग रहा था जैसे इस बार घर का एक हिस्सा खाली है।
शाम को लक्ष्मी पूजन की तैयारी हो रही थी।
तभी घर के बाहर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी।
सब लोग चौंक गए।
गाड़ी से कई बड़े-बड़े डिब्बे उतारे जाने लगे।
रचना हैरानी से देखने लगी।
तभी गाड़ी का दरवाजा खुला।
अमित, उसकी पत्नी नेहा और दोनों बच्चे बाहर उतरे।
"दादीiiii..."
दोनों बच्चे दौड़कर कमला देवी से लिपट गए।
कमला देवी की आंखों से आंसू बह निकले।
उन्होंने अमित को गले लगा लिया।
"तू आ गया बेटा..."
अमित मुस्कुरा दिया।
"मां, दीपावली आपके बिना कैसी?"
सब लोग अंदर आए।
फिर अमित ने एक-एक करके डिब्बे खोलने शुरू किए।
एक डिब्बे में मिठाइयां थीं।
दूसरे में कमला देवी के लिए गर्म शॉल।
तीसरे में विकास और रचना के लिए कपड़े।
चौथे में बच्चों के लिए खिलौने।
फिर उसने एक फाइल निकालकर मां के हाथ में रख दी।
कमला देवी ने खोला तो हैरान रह गईं।
वह उनके नाम की एक फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीद थी।
राशि थी — पाँच लाख रुपये।
कमला देवी घबरा गईं।
"बेटा, ये क्या है?"
अमित मुस्कुराया।
"मां, पिछले कई सालों से थोड़ा-थोड़ा बचा रहा था। सोचा था आपके बुढ़ापे के लिए कुछ करूं।"
पूरा कमरा शांत हो गया।
रचना का चेहरा उतर चुका था।
अमित आगे बोला,
"मां, आपने हमेशा दिया है। इस बार बेटे की बारी थी।"
कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
उन्होंने बेटे का चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।
"मुझे पैसों की जरूरत नहीं थी बेटा। मुझे तो बस तुम्हारी जरूरत थी।"
अमित भी भावुक हो गया।
"मां, इसलिए तो आया हूं।"
तभी विकास आगे बढ़ा।
उसने छोटे भाई को गले लगा लिया।
दोनों भाइयों की आंखें नम थीं।
कुछ पल बाद रचना धीरे-धीरे अमित के पास आई।
उसकी आंखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
उसने हाथ जोड़ लिए।
"अमित, मुझे माफ कर दीजिए।"
अमित चौंक गया।
"अरे, किस बात के लिए?"
रचना रो पड़ी।
"मैंने रिश्तों को खर्च के तराजू में तौल लिया था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
रचना ने सिर झुका लिया।
"आज समझ आया कि परिवार का साथ किसी भी पैसे से ज्यादा कीमती होता है।"
अमित मुस्कुराया।
"भाभी, घर तो अपनों से ही बनता है।"
यह सुनते ही रचना की आंखों से आंसू बह निकले।
उसने अमित और नेहा दोनों से माफी मांगी।
सबने उसे गले लगा लिया।
रात को पूजा के बाद पूरा परिवार एक साथ बैठा।
हंसी-मजाक हुआ।
बच्चे पटाखे चलाने लगे।
घर फिर से रोशनी से भर गया।
तभी कमला देवी ने एक बात कही।
जिसे सुनकर सब चुप हो गए।
उन्होंने कहा,
"जो अपने घर आने वालों का हिसाब रखने लगते हैं, उनके घरों से बरकत चली जाती है। और जो अपनों का स्वागत करते हैं, उनके घर खुशियां खुद रास्ता ढूंढ़कर आ जाती हैं।"
सबकी आंखें नम हो गईं।
रचना ने सिर झुका लिया।
लेकिन इस बार वह शर्म से नहीं, सीख से झुका था।
उस दीपावली के बाद घर का माहौल बदल गया।
अब हर त्योहार पर सबसे पहले रचना ही अमित को फोन करती।
बच्चों की पसंद का खाना बनाती।
और कमला देवी को हमेशा यही कहती,
"मम्मी जी, त्योहार तो तभी पूरा लगता है जब पूरा परिवार साथ हो।"
कमला देवी मुस्कुरा देतीं।
उन्हें लगता जैसे भगवान ने उनके परिवार को फिर से जोड़ दिया हो।
और उस दिन पूरे परिवार ने एक बात हमेशा के लिए सीख ली—
अपने लोग कभी खर्च नहीं होते, वे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

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