जिस बेटी को ठुकराया, वही सहारा बनी
"तू लड़की है, इतना पढ़-लिखकर क्या करेगी? आखिर में तो घर ही संभालना है।"
सुधा देवी ने अपनी सोलह साल की बेटी नेहा से नाराज़ होकर कहा।
नेहा चुपचाप खड़ी रही।
उसके हाथ में स्कूल की मार्कशीट थी, जिसमें उसने पूरे जिले में दूसरा स्थान हासिल किया था।
वह चाहती थी कि उसकी माँ एक बार उसकी तारीफ कर दे, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
घर में उसके छोटे भाई मोहित को हमेशा ज्यादा महत्व मिलता था।
मोहित पढ़ाई में सामान्य था, लेकिन उसकी हर इच्छा पूरी की जाती थी।
अगर उसे नया मोबाइल चाहिए होता तो तुरंत दिला दिया जाता।
अगर वह दोस्तों के साथ घूमने जाना चाहता तो कोई रोकता नहीं था।
लेकिन नेहा के लिए हर बात पर नियम थे।
"इतनी देर तक पढ़ने की क्या जरूरत है?"
"इतनी बड़ी हो गई हो, अब घर के काम सीखो।"
"कल को ससुराल जाना है, नौकरी थोड़ी करनी है।"
ऐसी बातें नेहा रोज सुनती थी।
उसके पिता रमेश जी सीधे-सादे इंसान थे।
वह बेटी से प्यार तो करते थे, लेकिन पत्नी के सामने ज्यादा कुछ नहीं बोल पाते थे।
नेहा की सबसे बड़ी ताकत उसकी मेहनत थी।
वह जानती थी कि अगर उसे अपनी जिंदगी बदलनी है तो पढ़ाई ही उसका रास्ता है।
इसीलिए वह घर के सारे काम करने के बाद भी देर रात तक पढ़ती रहती।
जब बारहवीं का परिणाम आया तो नेहा ने पूरे राज्य में उत्कृष्ट अंक प्राप्त किए।
उसे शहर के एक अच्छे कॉलेज में छात्रवृत्ति भी मिल गई।
वह खुशी-खुशी घर आई।
"माँ, मेरी कॉलेज की फीस भी नहीं लगेगी। मुझे स्कॉलरशिप मिल गई है।"
नेहा ने उत्साह से कहा।
लेकिन सुधा देवी का चेहरा गंभीर बना रहा।
"कॉलेज जाने की कोई जरूरत नहीं है।"
"अब तुम्हारी शादी की उम्र हो रही है।"
"लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने से कोई फायदा नहीं होता।"
नेहा का दिल टूट गया।
उसने बहुत समझाने की कोशिश की।
लेकिन उसकी माँ नहीं मानी।
कई दिनों तक घर में इसी बात को लेकर बहस होती रही।
आखिरकार रमेश जी ने पहली बार अपनी पत्नी का विरोध किया।
"मैं अपनी बेटी का भविष्य बर्बाद नहीं होने दूँगा।"
"जब वह खुद पढ़ना चाहती है और स्कॉलरशिप भी मिली है, तो उसे जरूर पढ़ाऊँगा।"
रमेश जी ने दृढ़ स्वर में कहा।
पहली बार किसी ने नेहा के लिए आवाज उठाई थी।
नेहा की आँखों में आँसू आ गए।
कॉलेज शुरू हुआ।
नेहा पढ़ाई में और भी अच्छा प्रदर्शन करने लगी।
कुछ वर्षों बाद उसने प्रशासनिक सेवा की परीक्षा देने का फैसला किया।
गाँव के लोग उसका मजाक उड़ाने लगे।
"इतनी बड़ी परीक्षा कोई आसान है क्या?"
"लड़की है, शादी कर लो इसकी।"
लेकिन नेहा ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।
उसने दिन-रात मेहनत की।
कई बार असफल हुई।
कई बार उसका आत्मविश्वास डगमगाया।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
आखिर वह दिन भी आ गया जब परिणाम घोषित हुआ।
नेहा ने प्रशासनिक सेवा परीक्षा पास कर ली थी।
पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।
गाँव में मिठाइयाँ बँटने लगीं।
जो लोग पहले ताने मारते थे, वही अब उसकी तारीफ कर रहे थे।
सुधा देवी भी बहुत खुश थीं।
लेकिन उनके मन में कहीं न कहीं अपराधबोध था।
उन्हें अपनी पुरानी बातें याद आ रही थीं।
समय बीतता गया।
नेहा की नौकरी लग गई।
उसने अपने माता-पिता के लिए नया घर बनवाया।
अपने भाई की पढ़ाई में भी मदद की।
मोहित अब बड़ा हो चुका था।
लेकिन गलत संगत के कारण वह कारोबार में नुकसान कर बैठा।
उस पर काफी कर्ज हो गया।
एक दिन कर्ज देने वाले लोग घर पहुँच गए।
घर का माहौल तनाव से भर गया।
रमेश जी की तबीयत खराब रहने लगी।
सुधा देवी रात-रात भर जागकर रोती थीं।
तब नेहा छुट्टी लेकर घर आई।
उसने पूरे मामले को समझा।
कानूनी सलाह ली।
बैंक और अधिकारियों से बात की।
धीरे-धीरे सारी समस्याएँ सुलझने लगीं।
जिस बेटी को कभी बोझ समझा गया था, वही पूरे परिवार की सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी थी।
एक रात सुधा देवी बरामदे में बैठी थीं।
नेहा उनके पास आकर बैठ गई।
कुछ पल दोनों चुप रहीं।
फिर अचानक सुधा देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।
"बेटा, मैंने तेरे साथ बहुत अन्याय किया।"
"मैं हमेशा बेटे और बेटी में फर्क करती रही।"
"मुझे लगता था कि बेटा ही बुढ़ापे का सहारा होता है।"
"लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि संतान का मूल्य उसके लिंग से नहीं, उसके संस्कार और कर्म से होता है।"
सुधा देवी रोते हुए बोलीं।
नेहा ने तुरंत उनकी हथेलियाँ पकड़ लीं।
"माँ, पुरानी बातें भूल जाइए।"
"आप मेरी माँ हैं।"
"आपसे नाराज़ रहकर मैं कभी खुश नहीं रह सकती।"
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा।
सुधा देवी ने बेटी को गले लगा लिया।
उस दिन उनके मन का वर्षों पुराना बोझ हल्का हो गया।
अब वह हर जगह लोगों से एक ही बात कहती थीं—
"बेटियों को कमजोर मत समझो।"
"उन्हें अवसर दो, विश्वास दो और शिक्षा दो।"
"बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, परिवार की सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं।"
नेहा की कहानी पूरे इलाके में मिसाल बन गई।
और सुधा देवी की सोच भी बदल गई।
क्योंकि उन्होंने अपनी आँखों से देख लिया था कि जिस बेटी को उन्होंने हमेशा पीछे रखा, वही एक दिन पूरे परिवार का सबसे मजबूत सहारा बन गई।

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