मां कभी बोझ नहीं होती

 

Emotional Indian family reunion as a grandmother, daughter-in-law, and grandson embrace each other with love and forgiveness in a warm, beautifully lit home.


"मम्मी, आपने फिर से आरव को मिठाई खिला दी ना?"


कविता की तेज आवाज पूरे घर में गूंज उठी।


उसकी सास शारदा देवी घबराकर खड़ी हो गईं। उनके हाथ में पाँच साल का आरव था, जो अभी-अभी उनके साथ बैठकर हँस रहा था।


"नहीं बहू, मैंने तो बस उसे थोड़ा सा गुड़ दिया था। सुबह से खाने की जिद कर रहा था तो..."


"बस यही तो समस्या है आपकी। आपको लगता है कि बच्चों को पालना बहुत आसान है। डॉक्टर ने साफ मना किया है मीठा देने से, लेकिन आपकी समझ में कुछ आता ही नहीं।"


कविता गुस्से से बोली।


आरव डरकर अपनी दादी से चिपक गया।


शारदा देवी ने कुछ कहना चाहा, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।


उसी समय कविता का पति अमित ऑफिस से लौटकर अंदर आया।


उसने घर का माहौल देखा तो समझ गया कि फिर कोई नया विवाद शुरू हो चुका है।


"क्या हुआ?"


उसने धीरे से पूछा।


"तुम अपनी माँ से पूछो। हर बार मेरी बात को नजरअंदाज कर देती हैं। मैं बच्चे के लिए नियम बनाती हूं और ये सब बिगाड़ देती हैं।"


कविता ने शिकायत करते हुए कहा।


अमित ने अपनी माँ की तरफ देखा।


शारदा देवी चुप थीं।


यह पहली बार नहीं था।


पिछले दो साल से यही सब चल रहा था।


शारदा देवी गाँव की सीधी-सादी महिला थीं।


पति का देहांत कई साल पहले हो चुका था।


उन्होंने खेतों में मजदूरी करके और दूसरों के घरों में काम करके अमित को पढ़ाया था।


कई रातें ऐसी गुजरी थीं जब वह खुद भूखी सो जाती थीं, लेकिन बेटे को कभी भूखा नहीं सोने देती थीं।


अमित पढ़ाई में अच्छा था।


उसने मेहनत की और शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली।


फिर वहीं उसकी मुलाकात कविता से हुई और दोनों ने शादी कर ली।


शुरुआत में सब ठीक था।


लेकिन कविता को हमेशा लगता था कि शारदा देवी पुराने विचारों वाली हैं।


उसे उनकी हर बात में कमी नजर आती थी।


अगर शारदा देवी आरव को कहानी सुनातीं तो कविता कहती,


"आजकल के बच्चे इन पुरानी कहानियों से कुछ नहीं सीखते।"


अगर वे खाना बनातीं तो कविता कहती,


"इतना तेल कौन डालता है?"


अगर वे किसी बात पर सलाह देतीं तो जवाब मिलता,


"आप गाँव की बातें गाँव तक ही रखिए।"


धीरे-धीरे शारदा देवी ने बोलना कम कर दिया।


वे बस अपने कमरे तक सीमित रहने लगीं।


लेकिन उनका प्यार अपने पोते आरव के लिए कभी कम नहीं हुआ।


आरव भी अपनी दादी के बिना एक पल नहीं रहता था।


रात को सोते समय कहानी भी दादी से सुनता और खाना भी दादी के हाथ से खाता।


यही बात कविता को कई बार खटकती थी।


उसे लगता था कि कहीं उसका बेटा उससे ज्यादा अपनी दादी के करीब न हो जाए।


समय बीतता गया।


फिर एक दिन कविता को एक बड़ी कंपनी से नौकरी का ऑफर मिला।


सैलरी बहुत अच्छी थी।


वह यह मौका छोड़ना नहीं चाहती थी।


लेकिन समस्या थी आरव की देखभाल।


अमित ने कहा,


"अगर तुम नौकरी करना चाहती हो तो कर लो। माँ हैं ना, आरव का ध्यान रख लेंगी।"


कविता कुछ देर सोचती रही।


फिर बोली,


"ठीक है, लेकिन अगर कुछ भी गड़बड़ हुई तो मैं जिम्मेदार नहीं हूँ।"


उस दिन पहली बार शारदा देवी के चेहरे पर खुशी दिखाई दी।


उन्हें लगा कि शायद अब बहू उन्हें परिवार का हिस्सा समझने लगी है।


लेकिन उन्हें नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अपमान उनका इंतजार कर रहा था।


कविता नौकरी पर जाने लगी।


आरव पूरे दिन दादी के साथ रहता।


वह पहले से ज्यादा खुश रहने लगा।


उसकी आदतें भी सुधरने लगीं।


स्कूल की टीचर तक उसकी तारीफ करने लगीं।


लेकिन कविता को यह सब दिखाई नहीं देता था।


वह रोज घर लौटकर एक ही काम करती।


आरव के कपड़े चेक करती।


उसका बैग चेक करती।


उसके खाने की प्लेट चेक करती।


और फिर कोई न कोई कमी निकालकर शारदा देवी को सुना देती।


शारदा देवी सब कुछ चुपचाप सहती रहीं।


उन्हें सिर्फ अपने बेटे और पोते की खुशी दिखाई देती थी।


लेकिन एक दिन ऐसा हुआ जिसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी...


आरव के स्कूल में वार्षिक कार्यक्रम होने वाला था।


इस बार उसे मंच पर कविता सुनाने के लिए चुना गया था।


आरव बहुत खुश था।


वह रोज स्कूल से आकर अपनी दादी को कविता सुनाता और शारदा देवी उसकी गलतियाँ सुधारतीं।


उन्हें पढ़ाई ज्यादा नहीं आती थी, लेकिन जीवन का अनुभव बहुत था।


वे प्यार से उसे समझातीं और हौसला बढ़ातीं।


धीरे-धीरे आरव का आत्मविश्वास बढ़ने लगा।


कार्यक्रम से तीन दिन पहले की बात थी।


कविता ऑफिस में एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में व्यस्त थी।


अमित भी काम के सिलसिले में दूसरे शहर गया हुआ था।


घर पर सिर्फ शारदा देवी और आरव थे।


आरव स्कूल से लौटा तो थोड़ा सुस्त लग रहा था।


शारदा देवी ने उसके माथे पर हाथ रखा।


उसे तेज बुखार था।


उन्होंने तुरंत कविता को फोन किया।


लेकिन कविता मीटिंग में थी।


उसने फोन नहीं उठाया।


शारदा देवी घबरा गईं।


उन्होंने दोबारा फोन किया।


फिर भी कोई जवाब नहीं मिला।


आरव की हालत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी।


शारदा देवी ने पड़ोसी की मदद ली और उसे अस्पताल लेकर पहुंच गईं।


डॉक्टर ने जांच के बाद कहा,


"अच्छा हुआ आप समय पर बच्चे को लेकर आ गईं। तेज संक्रमण है। थोड़ी और देर हो जाती तो परेशानी बढ़ सकती थी।"


यह सुनकर शारदा देवी की आंखों में आंसू आ गए।


उन्होंने तुरंत अमित को फोन किया।


अमित रात तक वापस लौट आया।


कविता भी अस्पताल पहुंची।


डॉक्टर की बात सुनकर वह कुछ पल के लिए चुप रह गई।


उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस महिला को वह हमेशा कम समझती रही, उसी ने उसके बेटे की जान बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।


लेकिन उसका अहंकार अभी पूरी तरह टूटा नहीं था।


उसने धन्यवाद तक नहीं कहा।


कुछ दिनों बाद आरव ठीक होकर घर लौट आया।


जीवन फिर सामान्य होने लगा।


लेकिन भगवान शायद कविता को एक और सीख देना चाहते थे।


एक दिन कंपनी में अचानक कर्मचारियों की छंटनी शुरू हो गई।


कई लोगों की नौकरी चली गई।


उनमें कविता भी शामिल थी।


नौकरी छूटने की खबर सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।


घर की आर्थिक स्थिति पूरी तरह खराब नहीं हुई थी क्योंकि अमित की नौकरी थी, लेकिन कविता को बहुत बड़ा झटका लगा था।


वह कई दिनों तक परेशान रहने लगी।


उसे नई नौकरी नहीं मिल रही थी।


इधर घर के खर्च भी बढ़ते जा रहे थे।


ऐसे समय में शारदा देवी ने बिना कुछ कहे अपना पुराना सोने का एक कंगन अमित को दे दिया।


अमित हैरान रह गया।


"मां, इसकी क्या जरूरत है?"


शारदा देवी मुस्कुराईं।


"बेटा, गहने और पैसे तो फिर से आ सकते हैं, लेकिन जब अपने मुश्किल में हों तो उनका साथ देना सबसे बड़ा धर्म होता है।"


"लेकिन मां, यह कंगन तो पिताजी की आखिरी निशानी है। आपने इसे इतने सालों से संभालकर रखा है।"


"बेटा, निशानियां दिल में बसती हैं, अलमारी में नहीं। तुम्हारे पिताजी भी यही चाहते कि उनकी निशानी से अगर परिवार की कोई परेशानी दूर हो सकती है, तो उसे बिना सोचे इस्तेमाल कर लिया जाए। मेरे लिए इस कंगन से ज्यादा कीमती तुम लोग हो।"


अमित की आंखें भर आईं।


उसने कंगन वापस कर दिया।


लेकिन यह बात कविता ने सुन ली थी।


उस रात वह बहुत देर तक सो नहीं सकी।


उसे याद आने लगा कि कैसे उसने हर छोटी बात पर शारदा देवी को अपमानित किया था।


कैसे वह उन्हें मुफ्त की रोटियां खाने वाली कहती थी।


कैसे उसने उन्हें गांव की गंवार कहकर उनका दिल दुखाया था।


और आज वही महिला बिना किसी शिकायत के परिवार के लिए सब कुछ देने को तैयार थी।


पहली बार उसे अपने व्यवहार पर शर्म आई।


अगले दिन आरव स्कूल से लौटा।


उसके हाथ में एक चित्र था।


उसने वह चित्र कविता को दिखाया।


चित्र में पूरा परिवार बना हुआ था।


अमित, कविता, आरव और शारदा देवी।


कविता मुस्कुराई।


लेकिन फिर उसकी नजर चित्र के नीचे लिखे शब्दों पर गई।


आरव ने लिखा था—


"मेरी सबसे अच्छी दोस्त मेरी दादी हैं।"


यह पढ़ते ही कविता की आंखें भर आईं।


उसे एहसास हुआ कि वह जिस रिश्ते को कमजोर करने की कोशिश करती रही, वही रिश्ता उसके बेटे की सबसे बड़ी ताकत था।


उसने उसी समय फैसला कर लिया।


वह शारदा देवी के पास गई।


कई क्षण तक कुछ बोल नहीं पाई।


फिर अचानक उनके पैरों में बैठ गई।


शारदा देवी घबरा गईं।


"अरे बहू, यह क्या कर रही है?"


कविता रोते हुए बोली,


"मां जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने हमेशा आपको गलत समझा। मैंने आपका बहुत अपमान किया। आपने फिर भी मुझे बेटी की तरह अपनाया।"


शारदा देवी की आंखों में भी आंसू आ गए।


उन्होंने तुरंत कविता को उठाकर गले लगा लिया।


"बहू, परिवार में माफी नहीं होती। अपने लोग बस एक-दूसरे को समझ लेते हैं।"


कविता फूट-फूटकर रोने लगी।


वर्षों का बोझ उसके दिल से उतर रहा था।


उसी समय आरव दौड़ता हुआ आया और दोनों से लिपट गया।


अमित भी पास खड़ा यह दृश्य देख रहा था।


उसकी आंखें नम थीं।


उस दिन घर में किसी ने बड़ी-बड़ी बातें नहीं कीं।


लेकिन सबके दिलों में एक सुकून था।


कविता समझ चुकी थी कि आधुनिक शिक्षा इंसान को सफल बना सकती है, लेकिन बड़ों का अनुभव और उनका निस्वार्थ प्रेम ही परिवार को मजबूत बनाता है।


और शारदा देवी को भी यह विश्वास मिल गया था कि देर से ही सही, उनकी बहू ने आखिर उन्हें समझ लिया है।


उस दिन के बाद घर में सम्मान, प्यार और अपनापन पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया।


क्योंकि जिस मां को कभी बोझ समझा गया था, वही पूरे परिवार की सबसे बड़ी ताकत निकली।



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